शिमला/शैल। प्रदेश के सूचना आयोग और शिक्षा के रैगुलेटरी आयोग को अभी तक अध्यक्ष नहीं मिल पाये हैं। दोनों संस्थाओं के यह पद एक वर्ष से अधिक समय से खाली चले आ रहे हैं। जबकि राज्य लोक सेवा आयोग में खाली हुए अध्यक्ष और सदस्य के पदों को तुरन्त भर दिया गया है। बल्कि सदस्य का पद तो उसी दिन भर दिया गया जिस दिन वह खाली हुआ। इस पद पर मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव सुभाष आहलूवालिया की पत्नी मीरा वालिया की ताजपोशी हुई है। मीरा वालिया पहले शिक्षा के रैगुलेटरी कमीशन में सदस्य थी वहां से त्यागपत्र देकर वह लोक सेवा आयोग में आयी है और अब रैगुलेटरी कमीशन में न कोई अध्यक्ष है और न ही सदस्य। यही स्थिति सूचना आयोग की भी होने जा रही है क्योंकि वहां भी कार्यरत एकमात्र सदस्य इसी माह में सेवानिवृत होने जा रहे हैं। इसी तरह प्रदेश के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में भी हरीन्द्र हीरा की सेवानिवृति के बाद से सदस्य का पद खाली चला आ रहा है। सूचना आयोग और रैगुलेटरी आयोग में अध्यक्ष पद एक वर्ष से भी अधिक समय से खाली चले आ रहे हैं और अध्यक्ष का पद ही खाली हो तो अनुमान लगाया जा सकता है कि इन पदो और संस्थाओं की हमारे राजनेताओं की दृष्टि में क्या अहमियत है। जबकि शिक्षा के क्षेत्र में तो अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक एसआईटी तक का गठन करके उसे काम पर लगा दिया है और यह एसआईटी भी हिमाचल के ही एक मामलंे के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद गठित की गयी है।
इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह महत्वपूर्ण पद क्यों खाली चल आ रहे हैं और इनको भरने के लिये किसकी क्या भूमिका रहती है। इन पदों को भरने की जिम्मेदारी मुख्यमन्त्री की होती है और इसमें उनके कार्यालय तथा मुख्य सचिव की विशेष भूमिका रहती है। क्योंकि यह इन लोगों की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसी चीजों को तुरन्त मुख्यमन्त्री के संज्ञान मे लाये तथा संवद्ध प्रशासन से इनकों भरने की प्रक्रिया शुरू करवायें। इन पदों पर प्रायः सेवानिवृत बड़े अधिकारियों की ही तैनातीयां की जाती है। कई बार जिन अधिकारियों का कार्याकाल थोड़ा ही बचा होता है उन्हें सेवानिवृति देकर इन पदों पर बिठा दिया जाता है। ऐसे में यही सवाल उठता है कि जब सुभाष आहलूवालिया की पत्नी को काॅलिज के प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत होने से पूर्व ही रैगुलेटरी कमीशन में सदस्य लगा दिया गया था और फिर वहां से एक दिन भी खोये बिना लोक सेवा आयोग में लगा दिया गया तो फिर ऐसी ही तत्परता और सजगता इन पदों को भरने में क्यों नहीं दिखायी गयी?
इस संद्धर्भ में सचिवालय के गलियारों से लेकर सड़क तक फैली चर्चाओं के मुताबिक इस समय सरकार चलाने में सबसे बड़ी भूमिका टीजी नेगी और सुभाष आहलूवालिया अदा कर रहे हैं । यह दोनों ही सेवानिवृत हैं बल्कि विपक्ष तो इन्हीं लोगों को इंगित करके मुख्यमन्त्री पर रिटायर्ड और टायरड अधिकारियों पर आश्रित होने का आरोप तक लग चुका है। इनके बाद मुख्य सचिव वीसी फारखा का नाम चर्चा में आता है। इन अधिकारियों के साथ ही मन्त्रीयों सुधीर शर्मा तथा मुकेश अग्निहोत्री का नाम आता है। इन्ही के साथ हर्ष महाजन और अमितपाल शर्मा चर्चा में आते हैं अब इन सबके साथ राज्यपाल के सलाहकार डा. शशी कान्त का नाम भी जुड़ गया है। इस चर्चा में यह माना जा रहा था कि जो अधिकारी इस समय सरकार चला रहे हैं कल सरकार बदलने पर उनका क्या होगा क्योंकि वीसी फारखा की बतौर मुख्य सचिव ताजपोशी को विनित चौधरी ने कनिष्ठता के आधार पर कैट में चुनौती दे रखी है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार बदलने की सूरत में फारखा का मुख्य सचिव बने रहना कठिन होगा। फारखा भी इस हकीकत से वाकिफ हैं और इसीलिये यह बड़े पद खाली जा रहे थे। इनमें लोक सेवा आयेाग के अध्यक्ष पद पर फारखा का जाना तय माना जा रहा था क्योंकि यही एक पद ऐसा है जहां पर ‘‘पुण्य भी फल भी’’की कहावत चरितार्थ होती है। फिर के. एस. तोमर लोक सेवा आयोग के बाद मुख्य सूचना आयुक्त होना चाहते हैं। वीरभद्र पर उनके कुछ ऐसे एहसान है जिनके चलते वह उन्हे इनकार नहीं कर सकते हैं। धूमल के लिये भी तोमर को न कहना कठिन है बल्कि चर्चा तो यहां तक है कि वह बैठक में भी डा. शशीकांत और टीजी नेगी द्वारा तोमर का नाम आश्वस्त हो जाने पर ही आये थे। लेकिन आखिरी वक्त पर लोक सेवा आयोग के लिये मेजर जनरल का नाम आ जाने से सारा गणित बिगड़ गया। इस नियुक्ति को चर्चाओं के मुताबिक कार्यवाहक मुख्य सचिव ने फारखा के छुटटी से आने तक रोकने का पूरा प्रयास किया लेकिन इसमें वह शायद अकेले पड़ गये। लेकिन फिर उन्होने मुख्य सूचना आयुक्त के लिये पोस्ट को पुनः विज्ञाप्ति करने का ऐसा सूत्र सामने रखा जिसे कोई काट नही पाया। बल्कि पुलिस अधिकारियों के स्थानान्तर की जो फाईल आर्डर के लिये तैयार पड़ी थी उसे भी फारखा के आने तक रोक दिया गया। ऐसे में अब सीआईसी प्रशासनिक ट्रिब्यूनल और रैगुलेटरी कमीशन में कौन जाता है इस पर रहस्य ज्यादा बढ़ गया है। लेकिन इस प्रकरण में शीर्ष प्रशासन में बनने वाले नये समीकरणों का संकेत भी साफ उभरता देखा जा सकता है।
शिमला/शैल। वीरभद्र के आय से अधिक संपति मामलें में सीबीआई द्वारा दायर चालान का संज्ञान लेने के बाद अदालत ने 22 मई को सभी नामजद अभियुक्तों को तलब किया है। यदि यह लोग उस दिन अदालत में हाजिर हो जाते हैं तो इन्हें पहले नियमित जमानत का आग्रह करना होगा। जमानत मिलने के बाद चालान की कापी मिलेगी फिर चालान का निरीक्षण करने के लिये समय मिलेगा। इसके बाद आरोप तय होने की प्रक्रिया शुरू होगी। जमानत के समय सीबीआई इसका विरोध करती है या नही और अदालत इस विरोध को कितना अधिमान देती है। यह चालान की गंभीरता पर निर्भर करता है। सीबीआई सामान्यतः गावाहांे और साक्ष्यों को प्रभावित किये जाने की संभावना के आधार पर जमानत का विरोध करती है। यदि अदालत जमानत न दे तो फिर इसमें गिरफ्तारी की संभावना भी बन जाती है इस मामलें में एक नामजद अभियुक्त आनन्द चौहान पहले ही न्यायिक हिरासत में चल रहे हैं। आनन्द चौहान को ईडी ने गिरफ्तार किया था। लेकिन वह सीबीआई में भी अभियुक्त है और इसके लिये इस मामलें में भी उन्हे अलग से जमानत लेनी पडे़गी। सीबीआई कोर्ट आनन्द को जमानत देता है तो अन्य को भी जमानत मिलना आसान हो जायेगी। यदि कोर्ट इस मामले में भी आनन्द को जमानत नही देता हैं तो उसका प्रभाव अन्य पर भी पडे़गा और इस दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण स्थिति होगी। इसमें जेल या जमानत की ंसभावनाएं एक बराबर बनी हुई है।
दूसरी ओर ईडी द्वारा फाॅर्म हाऊस की अटैचमैन्ट किये जाने के बाद वीरभद्र सिंह एक बार ईडी में पेश हो चुके हंै। सूत्रों के मुताबिक दूसरी बार स्वास्थ्य कारणों से पेश नही हुए है। इसी बीच उन्होनें अदालत उनकी लम्बित याचिका 856/16 जब 19-4-16 को अदालत में आयी तो उनके वकील दयान कृष्णन ने आग्रह किया था कि जब ईडी ने उन्हे पहले तलब किया था तब ईडी ने अदालत को भरोसा दिया था कि उन्हें गिरफ्तार नही किया जायेगा। अब वैसा ही भरोसा पुनः दिया जाये। यह याचिका अभी लंबित चल रही है। इसमें वीरभद्र सिंह पक्ष के तर्क पूरे होने के बाद ईडी की ओर से संजय जैन तर्क रख रहे हैं। अब यह तर्क पूरा होने के मुकाम पर है। इस अटैचमैन्ट के साथ ईडी ने जो मनीट्रेल का चार्ट लगा रखा है उसके मुताबिक पहले कुछ फर्जी कंपनीयों से वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर के खाते में पैसा आया। फिर वक्कामुल्ला से वीरभद्र के खाते में पैसा गया। वीरभद्र से विक्रमादित्य के खाते मंे और फिर वहां से पिचेश्वर गड्डे और उनकी पत्नी के खातें में पैसा गया।
ईडी ने इस तरह के लेने देन के 18 क्रम अपने चार्ट में दिखाये हैं जिनमें 10,93,50,000 का ट्रांजैक्श्न हुआ है। ईडी ने इन कंपनीयों से जुडे़ लोगों के ब्यान ले रखे हैं। यह फार्म हाऊस विक्रमादित्य और अपराजिता की कंपनी के नाम है। 1.20 करोड में हुई फाॅर्म की रजिस्ट्री में 90 लाख वीरभद्र ने विक्रमादित्य को दिये है। तीस लाख विक्रमादित्य ने अपने साधनों से दिये हैं लेकिन आयकर में उनकी रिर्टन केवल करीब तीन लाख की है। ऐसे में यदि ईडी के इस मामले में वीरभद्र सिंह को उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलती है तो उनकी दिक्कतें बढ़ सकती हंै। सूत्रों के मुताबिक ईडी इस याचिका के लंबित होने के कारण अपनी कारवाई को आगे नहीं बढ़ा रही है।
शिमला/शैल। सरकार के कई विभागों और विभिन्न निगमों/बोर्डो में कनिष्ठ लेखाकार कार्यरत है। कनिष्ठ लेखाकार के लिये वाणिज्य विषय में स्नातक होना अनिवार्य है। जबकि लिपिक के लिये दस जमा दो की योग्यता रखी गयी है। इस लिपिकों को 10300-34800 के स्केल में 3200 के ग्रेड पे के साथ 13500 रूपये वेतन दिया जा रहा है। इनके मुकाबले में वाणिज्य स्नातक रखे गये कनिष्ठ लेखाकारों को प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड में 5910-20200 के स्केल में 2800 की ग्रेड पे के साथ 11170 रूपये वेतन दिया जा रहा है। जबकि एचपीएमसी में इन्ही कनिष्ठ लेखाकारों को इसी योग्यता के साथ 10300-34800 के स्केल में 3800 ग्रेड पे के साथ 14590 रूपये का वेतन दिया जा रहा है।
प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड और एचपीएमसी इसी सरकार के दो बराबर संस्थान हैं। दोनों में एक ही योग्यता के आधार पर एक ही पदनाम से कार्य कर रहे कनिष्ठ लेखाकारों के वेतन में अन्तर क्यों है इसका जबाव देने के लिये कोई तैयार नही है। लिपिक के लिये योग्यता केवल दस जमा दो है जबकि कनिष्ठ लेखाकार के लिये वाणिज्य स्नातक की आवश्यक योग्यता है। लेकिन वेतन में अन्तर है कनिष्ठ लेखाकारों के साथ प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड और एचपीएमसी में अलग-अलग वेतन दिया जा रहा है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों की भी यह सीधी अवमानना है। समान कार्य के लिये समान वेतन के नियम के अनुसार इस तरह के अलग-अगल मापदण्ड नही हो सकते। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश का वित विभाग के पास दोहरेपन को दूर करने के लिये संबधित संस्थान की ओर से कोई आग्रह ही नहीं आया है माना जा रहा है कि पीडित कर्मचारी इसके लिये अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनावों की अधिसूचना अभी तक जारी नहीं हुई है। इस नाते यह चुनाव तय समय पर हो पायेंगे या नहीं इसको लेकर संशय बना हुआ है। निगम के नये हाऊस का गठन पांच जून को होना आवश्यक है। लेकिन इन चुनावों को लेकर जो मतदाता सूचियां अब तक सामने आयी हैं उनको लेकर सारे राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी आपत्तियां राज्य चुनाव आयोग के पास दायर कर रखी हैं। सीपीएम जिसके पास मौजूदा हाऊस के मेयर और डिप्टी
मेयर के दोनों पद हैं उसने तो मतदाता सूचियां को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय में भी दस्तक दी थी। उच्च न्यायालय ने इसका गंभीर संज्ञान लेते हुए उन्हें दो दिनों के भीतर ठीक करने के निर्देश दिये थे। उच्च न्यायालय के इन निर्देशों के बाद आयोग और जिला प्रशासन ने इनको ठीक करने का प्रयास भी किया लेकिन इस प्रयास के बाद भी जो सूची जारी हुई है उसको लेकर कांग्रेस, भाजपा और सीपीएम तीनों दलों ने फिर से आपत्तियां उठाई हैं। इस तरह कुल मिलाकर मतदाता सूचियों को लेकर जो आरोप लगाये गये हैं उनका निराकरण करने में काफी समय लग सकता है। ऐसे में यदि मतदाता सूचियों को पूरी तरह दुरूस्त करने के बाद चुनाव की अधिसूचना जारी की जाती है तो चार जून की तय समय सीमा को पूरा कर पाना संभव नहीं होगा।
मतदाता सूचियों का एक गंभीर पक्ष यह भी है कि इस बार नगर निगम के वार्डो की संख्या 25 से बढ़ाकर 34 की दी गयी है। यह संख्या बढ़ने के साथ ही निगम में कुछ एरिया पंचायतों का भी जोड़ा गया है। जो एरिया पंचायतों से निगम में शामिल हुआ है वहां के मतदाताओं का नाम संभवतः अब तक पंचायतों की मतदाता सूचियों में भी चल रहा है। अब नगर निगम में शामिल होने के साथ ही इनका नाम निगम की सूचीयों में भी आ गया है और इस तरह बहुत संभव है कि इनका नाम इस समय दोनों जगह मतदाताओं के रूप में चल रहा हो। कानून की दृष्टि से दोनों स्थानों पर एक ही समय में बतौर मतदाता नाम होना अपराध है। कायदे से संबधित प्रशासन को अपने स्तर पर ही पंचायत क्षेत्र से इन नामों को हटाकर इसकी सूचना चुनाव आयोग को दे दी जानी चाहिये थी। परन्तु संभवतः ऐसा नहीं हो सका है। माना जा रहा है कि राज्य चुनाव आयोग को यह जिम्मेदारी भी निगम चुनावों की अधिसूचना जारी करने से पहले पूरी करनी होगी।
दूसरी ओर इस समय जो राजनीतिक वातावरण बना हुआ है उसको सामने रखते हुए कांग्रेस, भाजपा और वामदल सभी यह चाहते हैं कि यह चुनाव चार छः माह के लिये आगे टाल दिये जायें। बल्कि कांग्रेस विधायक दल की जो बैठक अभी हुई है उसमें भी इन चुनावों को टालने के लिये आग्रह किया गया। क्योंकि इसी वर्ष प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं और इस समय यदि कांगे्रस यह निगम चुनाव हार जाती है तो इसका विधानसभा चुनावों के लिये सही सन्देश नहीं जायेगा। इसलिये कांग्रेस चुनावों के पक्ष में नही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुक्खु ने तो मतदाता सूचीयों को लेकर रिकार्ड पर आयेाग में शिकायत दायर कर रखी है। जब से नगर निगम बना है तब से लेकर आज तक भाजपा का इस पर कब्जा नही हो सका है। भाजपा की सरकार होते हुए भी कब्जा नही हो सका है। इस समय भले ही भाजपा के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर पर हवा चल रही है। लेकिन नगर निगम के इन चुनावों में सीपीएम भी एक बडे़ दावेदार के रूप में सामने है। मेयर और डिप्टी मेयर के दोनों पदों पर उसका कब्जा है। इस परिदृश्य में भाजपा भी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। ऐसे में वह भी विधानसभा चुनावों से पहले ऐसा कोई खतरा मोल नही लेना चाहती है। इसलिये कांग्रेस और भाजपा दोनों ही बडे़ दल अपरोक्ष में इस चुनाव के लिये तैयार नही हैं।
ऐसे में राज्य चुनाव आयोग इन चुनावों को कैसे तय समय पर करवा पाता है यह उसके लिये एक बड़ा सवाल है। चुनाव में मतदाता सूचियों का सही होना ही सबसे बड़ी अनिवार्यता है और इन सूचीयों को लेकर ही सभी दलों ने आपत्तियां उठा रखी हैं। ऐसे में आयोग को यह चुनाव टालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। फिर एक्ट की धारा 2434(1) में यह है कि Every Municipality unless sooner dissolved under any law -और इसी धारा के क्लाज 3(b) में है किbefore the expiration of a period of six months from the date of its dissolution, एक्ट में आये dissolution के जिक्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि चयनित हाऊस को किन्ही कारणों से भंग किया जा सकता है और इस समय मतदाता सूचीयों में बार-बार आ रही गलतीयों के निराकरण के लिये चुनावों को आगे टालना आवश्यक हो जायेगा।
बाली सहित राजेश धर्माणी, राकेश कालिया, रवि ठाकुर रहे गैर हाजिर निर्दलीय मनोहर धीमान भी नही आये
शिमला/शैल। प्रदेश कांगे्रस के कुछ मन्त्रियों/विधायकों एवम् अन्य नेताओं को कांग्रेस से निकाल कर भाजपा में शामिल करवाने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले दिनों यह आरोप लगाया है प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष और मुख्यमन्त्री के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने। विक्रमादित्य के मुताबिक यह खेल केन्द्रिय मन्त्री चैाधरी विरेन्द्र सिंह रच रहे हैं। स्मरणीय है
कि विरेन्द्र सिंह जब प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी थे तब उनके रिश्ते वीरभद्र सिंह से कोई ज्यादा अच्छे नहीं थे। विक्रमादित्य के इस आरोप के साथ ही प्रदेश के कुछ मन्त्रियों/विधायकों के नाम इस संद्धर्भ में अखबारों में भी उछले थे। जिसका किसी ने भी खण्डन नहीं किया था।
इसके अतिरिक्त जब सीबीआई ने आय से अधिक संपत्ति मामलें में ट्रायल कोर्ट में चालान दायर किया और ईडी ने महरौली स्थित फार्म हाऊस को लेकर दूसरा अटैचमैन्ट आदेश जारी किया तथा वीरभद्र सिंह को पूछताछ के लिये बुलाया उस दौरान अचानक एक राजनीतिक अनिश्चितता का वातावरण बढ़ गया था। उस समय वीरभद्र सिंह ने कांग्रेस हाईकमान से भी बैठक की थी। इस बैठक में राजनीतिक परिथितियों पर चर्चा होने के साथ ही हाईकमान ने वीरभद्र सिंह को सारे हालात का स्वयं आकलन करने का परामर्श दिया था। इस दौरान वीरभद्र सिंह के अतिरिक्त बृज बुटेल, जीएस बाली, कौल सिंह ठाकुर और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह ने भी अलग-अलग हाईकमान से भेंट की थी। सूत्रों के मुताबिक इन बैठकों में हुए विचार-विमर्श के परिणाम स्वरूप ही वीरभद्र सिंह ने कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाने का फैसला लिया था। वीरभद्र सिंह के खिलाफ चल रहें सीबीआई और ईडी मामलों की गंभीरता/अनिश्चितता आज भी यथास्थिति बनी हुई है। इस परिदृश्य में हुई कांग्रेस विधायक दल की बैठक का आकलन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस बैठक में जीएस बाली, राजेश धर्माणी, राकेश कालिया और रवि ठाकुर का गैर हाजिर रहना महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह सभी लोग कभी न कभी अपने विरोध को मुखर कर चुके हैं। संभवतः इस पृष्ठभूमि को समाने रखते हुए इस बैठक में बाली को लेकर सीधी चर्चा हुई। बाली को लेकर यह आरोप लगा कि उनका एक पैर कांग्रेस और एक पैर भाजपा में है और उन्हे स्पष्ट करना चाहिए कि वह कांग्रेस में है या भाजपा में। बाली के अतिरिक्त और किसी नेता के खिलाफ यह आरोप लगने का अर्थ है कि अब बाली को इस संबध में सर्वाजनिक तौर पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। यदि बाली के खिलाफ लगने वाला यह आरोप सही नही है तो फिर बाली को अपने विरोधियों के साथ खुलकर लड़ाई लड़नी होगी। बाली के साथ ही सुक्खु को लेकर भी इस बैठक में सवाल उठे है और संगठन पर अकर्मण्यता के गंभीर आरोप लगे हैं। वैसे सुक्खु और वीरभद्र में संगठन को लेकर पिछले कुछ असरे से रिश्ते अच्छे नहीं रहे हैं। संगठन के विभिन्न पदाधिकारियों को लेकर वीरभद्र कई बार खुला हमला कर चुके हैं। वीरभद्र का हर समय यह प्रयास चल रहा है कि सुक्खु के स्थान पर कोई नया ही व्यक्ति प्रदेश का अध्यक्ष बने। इसी कारण संगठन के अभी घोषित हुए चुनावों को भी टालने के लिये विधायक दल की बैठक में कुछ लोगों ने आवाज उठायी जबकि संगठन के यह चुनाव अब चुनाव आयोग के निर्देशों पर करवाने पड़ रहे हैं जिन्हें टालना संभव नही हो सकता।
इस परिदृश्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है, जो लोग इस बैठक से गैर हाजिर रहे हैं यदि वह कल को वास्तव में ही पार्टी से बाहर जाने का मन बना लेते हैं तो तुरन्त प्रभाव से सरकार संकट में आ जाती है। बाली पर जिस तरह से सीधा हमला किया गया है उससे यह संकेत भी उभरता है कि पार्टी के भीतर बैठा एक वर्ग बाली को कांग्रेस से बाहर निकालने की रणनीति पर चल रहा है भले ही इसकी कीमत सरकार के नुकसान के रूप में ही क्यों न चुकानी पड़े। यह तय है कि इस बैठक मे जो कुछ घटा है उसके परिणामस्वरूप अब एक जुटता के सारे दावे अर्थहीन हो जाते हैं और यह स्थिति अन्ततः विधानसभा भंग होने तक पहुंच जायेगी।