Saturday, 23 May 2026
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क्या सिर्फ कागजों तक सीमित है रेरा की सख्ती?

  • 38 लाख की पेनल्टी वसूली पर उठे गंभीर सवाल

शिमला/शैल।  हिमाचल प्रदेश में रियल एस्टेट सेक्टर को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिये गठित हिमाचल प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (HP RERA) अब खुद सवालों के घेरे में आ गयी है। आरटीआई के जरिए सामने आये दस्तावेजों और ऑडिट आपत्तियों ने विभाग की कार्यप्रणाली, वित्तीय अनुशासन और नियामक क्षमता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। मामला केवल प्रशासनिक पत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संस्था की विश्वसनीयता से जुड़ गया है, जिसे प्रदेश में घर खरीदारों के हितों की रक्षा और बिल्डरों पर निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है।
आरटीआई दस्तावेजों से यह सामने आया है कि हिमाचल प्रदेश रेरा ने वर्ष 2023 में ऑल इंडिया फोरम ऑफ रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटीज (AIFORERA) को लगभग 2.36 लाख रुपये की सदस्यता राशि आर.टी.जी.एस.(RTGS) के माध्यम से जमा करवाई थी। इस भुगतान के लिए भारतीय स्टेट बैंक की सचिवालय शाखा को अधिकृत पत्र भी जारी किया गया था। दस्तावेज बताते हैं कि विभाग ने राष्ट्रीय संस्था की सदस्यता और औपचारिकताओं को पूरा करने में तत्परता दिखाई। लेकिन इसी दौरान नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) कार्यालय से जुड़े पत्राचार में यह तथ्य सामने आया कि हिमाचल प्रदेश रेरा द्वारा प्रमोटरों पर लगाये गये लगभग 38.61 लाख रुपये के जुर्माने की वसूली लंबित है।
यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। सवाल उठ रहा है कि यदि रियल एस्टेट नियामक संस्था खुद अपने आदेशों को लागू नहीं करवा पा रही, तो फिर बिल्डरों और प्रमोटरों पर नियंत्रण किस हद तक प्रभावी है।  रेरा कानून को देशभर में रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता लाने वाला बड़ा सुधार माना गया था। इसका उद्देश्य था कि बिल्डर परियोजनाओं में देरी, गलत जानकारी, उपभोक्ताओं से धोखाधड़ी और अनुबंध उल्लंघन जैसी गतिविधियों पर लगाम लगे। लेकिन जब जुर्माने की वसूली ही अधूरी रह जाए, तो कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।
दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट होता है कि ऑडिट टीम ने इस मुद्दे पर विभाग से जवाब और रिकॉर्ड मांगा था। यानी यह केवल सामान्य प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि वित्तीय जवाबदेही से जुड़ा मामला है। सरकारी संस्थाओं में CAG ऑडिट को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह सार्वजनिक धन और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की निगरानी का प्रमुख माध्यम है। ऐसे में लाखों रुपये की पेनल्टी वसूली लंबित होना एक साधारण त्रुटि नहीं माना जा सकता है।
रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नियामक संस्था की असली ताकत उसके आदेशों के क्रियान्वयन में होती है। यदि संस्था केवल आदेश जारी करे लेकिन उनकी वसूली और अनुपालन सुनिश्चित न कर पाये, तो उसका डर और प्रभाव दोनों कम होने लगते हैं। हिमाचल प्रदेश रेरा के मामले में भी यही सवाल खड़ा हो रहा है। प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में रियल एस्टेट गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। शिमला, सोलन, धर्मशाला और बद्दी जैसे क्षेत्रों में निजी हाउसिंग परियोजनाओं का विस्तार हुआ है। हजारों लोग फ्लैट, प्लॉट और निवेश योजनाओं में पैसा लगा रहे हैं। ऐसे में  रेरा को उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा कवच माना जाता है।
लेकिन अब सामने आये रिकॉर्ड यह संकेत दे रहे हैं कि कागजों में सख्ती दिखाने और वास्तविक कारवाई के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। यदि प्रमोटरों पर जुर्माना लगाया गया था तो उसकी वसूली क्यों नहीं हुई? क्या विभाग के पास पर्याप्त अधिकार नहीं हैं? क्या मामले अदालतों में लंबित हैं? क्या प्रशासनिक स्तर पर कारवाई कमजोर रही? या फिर यह केवल प्रक्रिया संबंधी देरी है? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं, क्योंकि विभाग की ओर से अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
आरटीआई के माध्यम से सामने आये दस्तावेजों ने यह भी दिखाया कि विभाग से वित्तीय और प्रशासनिक सूचनाएं प्राप्त करने के लिए कई आवेदन दायर किए गए थे। अलग-अलग पत्रों के माध्यम से कई पन्नों की सूचनाएं उपलब्ध करवाई गईं। इससे यह संकेत मिलता है कि मामला लंबे समय से सूचनाओं और जवाबदेही की मांग से जुड़ा हुआ था।
सार्वजनिक संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल हिस्सा है और यदि कोई नियामक संस्था सवालों के घेरे में आती है तो उसकी जांच और जवाबदेही जरूरी हो जाती है।
इस पूरे मामले का एक बड़ा पहलू यह भी है कि  रेरा जैसी संस्थाएं केवल प्रशासनिक कार्यालय नहीं होतीं, बल्कि वे निवेशकों और आम नागरिकों के भरोसे का आधार होती हैं। कोई व्यक्ति अपनी जीवनभर की कमाई घर खरीदने में लगाता है। ऐसे में यदि परियोजना में देरी हो, बिल्डर नियमों का उल्लंघन करे या उपभोक्ता को न्याय न मिले, तो RERA ही अंतिम उम्मीद बनती है। लेकिन यदि उसी संस्था के आदेश लागू न हों, तो उपभोक्ताओं का विश्वास कमजोर हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि देश के कई राज्यों में रेरा संस्थाओं को इस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कई मामलों में बिल्डर अदालतों में चले जाते हैं, जिससे वसूली प्रक्रिया लंबी हो जाती है। कुछ मामलों में प्रशासनिक सहयोग की कमी भी सामने आती है। यदि करोड़ों रुपये की परियोजनाओं को नियंत्रित करने वाली संस्था अपनी पेनल्टी तक वसूल नहीं कर पा रही हो तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत भी माना जाएगा।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला आने वाले समय में तूल पकड़ सकता है। सरकार और विभाग की ओर से यह तर्क दिया जा सकता है कि वसूली प्रक्रिया कानूनी विवादों के कारण लंबित है और सभी कारवाई नियमों के तहत की जा रही है। लेकिन जब तक विभाग आधिकारिक रूप से विस्तृत स्थिति स्पष्ट नहीं करता, तब तक सवाल बने रहेंगे।
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हिमाचल प्रदेश रेरा ने राष्ट्रीय संस्था AIFORERA की सदस्यता राशि समय पर जमा करवाई। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक और औपचारिक प्रक्रियाओं को लेकर विभाग सक्रिय था। यदि बाहरी सदस्यताओं और औपचारिकताओं में तत्परता दिखाई जा सकती है, तो उपभोक्ता हितों से जुड़े मामलों में भी वही सक्रियता अपेक्षित है। यही तुलना अब बहस का केंद्र बनती जा रही है।
रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता केवल कानून बनाने से नहीं आती, बल्कि उसके सख्त क्रियान्वयन से आती है। रेरा कानून लागू होने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि बिल्डरों की मनमानी कम होगी और उपभोक्ताओं को समय पर न्याय मिलेगा। लेकिन अब हिमाचल प्रदेश रेरा से जुड़े दस्तावेजों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नियामक व्यवस्था वास्तव में उतनी प्रभावी है जितनी दिखाई जाती है।
आने वाले समय में यह मामला केवल एक ऑडिट आपत्ति या आरटीआई खुलासे तक सीमित नहीं रहेगा। यदि पेनल्टी वसूली, कारवाई प्रक्रिया और लंबित मामलों को लेकर विस्तृत जवाब सामने नहीं आते, तो यह मुद्दा प्रशासनिक सुधार, नियामक जवाबदेही और उपभोक्ता अधिकारों की बड़ी बहस में बदल सकता है। फिलहाल इतना जरूर है कि हिमाचल प्रदेश रेरा पर उठे इन सवालों ने प्रदेश के रियल एस्टेट नियमन तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है और अब सबकी नजर इस बात पर है कि विभाग इन आरोपों और सवालों का जवाब किस तरह देता है।

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