शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय, हमीरपुर ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 76.07 करोड़ रुपये का बजट पारित कर तकनीकी शिक्षा, शोध और नवाचार को नई दिशा देने का दावा किया है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू और विश्वविद्यालय प्रशासन इसे तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा कदम बता रहे हैं। बजट में शोध, पीएचडी कार्यक्रम, आधुनिक प्रयोगशालाओं, ई-लाइब्रेरी, उद्यमिता विकास और छात्र गतिविधियों के लिए बड़े प्रावधान किए गए हैं। लेकिन इन घोषणाओं के बीच बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रदेश के तकनीकी कॉलेजों की जमीनी स्थिति वास्तव में इतनी मजबूत है कि इन योजनाओं का लाभ छात्रों तक पहुंच सके।
प्रदेश में हिमाचल प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय से संबद्ध सरकारी और निजी इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्निक, फार्मेसी, मैनेजमेंट और तकनीकी संस्थान संचालित हो रहे हैं। इनमें सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों के अलावा कई निजी तकनीकी संस्थान भी शामिल हैं। वर्षों से इन संस्थानों में फैकल्टी की कमी, कमजोर प्रयोगशालाएं, सीमित प्लेसमेंट, पुराने उपकरण और छात्र संख्या जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय का नया बजट उम्मीद जरूर पैदा करता है, लेकिन यह भी जरूरी है कि पहले मौजूदा ढांचे की वास्तविक स्थिति को समझा जाए।
हमीरपुर स्थित तकनीकी विश्वविद्यालय प्रदेश का प्रमुख तकनीकी संस्थान है, लेकिन यहां भी कई विभागों में नियमित फैकल्टी की कमी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। कई विभाग अतिथि शिक्षकों या अनुबंध आधारित स्टाफ के सहारे चल रहे हैं। छात्रों का कहना है कि रिसर्च और इनोवेशन की बातें तो की जाती हैं, लेकिन कई बार प्रयोगशालाओं में आधुनिक उपकरणों की कमी के कारण व्यावहारिक शिक्षा प्रभावित होती है। विश्वविद्यालय ने अब प्रयोगशालाओं और तकनीकी ढांचे के लिए तीन करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे वर्षों से चली आ रही बुनियादी समस्याएं दूर हो पाएंगी।
राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज हमीरपुर, अटल बिहारी वाजपेयी राजकीय इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी संस्थान प्रगति नगर, हाईड्रो इंजीनियरिंग कॉलेज बंदला, बिलासपुर और अन्य सरकारी तकनीकी संस्थानों की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं मानी जाती। कई संस्थानों में स्थायी शिक्षकों के पद खाली हैं। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि जब तक उद्योगों के साथ मजबूत संबंध और बेहतर प्लेसमेंट नहीं होंगे, तब तक तकनीकी शिक्षा के प्रति आकर्षण बढ़ाना मुश्किल होगा।
निजी तकनीकी कॉलेजों की स्थिति भी अलग नहीं है। प्रदेश के कई निजी इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज पिछले कुछ वर्षों में कम दाखिलों की समस्या से जूझ रहे हैं। कुछ संस्थानों में पर्याप्त फैकल्टी नहीं है, जबकि कई जगहों पर प्रयोगशालाएं केवल निरीक्षण के समय सक्रिय दिखाई देती हैं। छात्रों का आरोप है कि कई निजी संस्थानों में फीस तो अधिक ली जाती है, लेकिन सुविधाएं अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिलतीं। प्लेसमेंट के नाम पर भी सीमित अवसर उपलब्ध होते हैं और अधिकतर छात्रों को प्रदेश से बाहर रोजगार तलाशना पड़ता है।
तकनीकी विश्वविद्यालय ने अब पीएचडी कार्यक्रम शुरू करने और शोध संस्कृति को मजबूत करने की घोषणा की है। इसके लिए शोध मार्गदर्शकों को प्रोत्साहन राशि देने तथा शोध पत्रिकाओं और ई-पुस्तकों के लिए बजट तय किया गया है। यह कदम सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि शोध केवल बजट से मजबूत नहीं होता। इसके लिए योग्य फैकल्टी, आधुनिक रिसर्च लैब, उद्योगों से साझेदारी और लंबे समय की अकादमिक योजना जरूरी होती है। यदि कॉलेजों में बुनियादी शिक्षण व्यवस्था ही कमजोर रहेगी, तो शोध और नवाचार के बड़े दावे जमीन पर असर नहीं छोड़ पाएंगे।
विश्वविद्यालय ने खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों, सॉफ्ट स्किल और उद्यमिता विकास के लिए भी बजट बढ़ाया है। छात्र गतिविधियों और कौशल विकास के लिए 70 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। हालांकि कई कॉलेजों के छात्र बताते हैं कि कैंपस स्तर पर नियमित तकनीकी फेस्ट, इनोवेशन प्रोग्राम और इंडस्ट्री इंटरैक्शन की कमी रहती है। कई कॉलेजों में ट्रेनिंग और प्लेसमेंट सेल केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। ऐसे में बजट प्रावधानों के साथ-साथ उनकी प्रभावी निगरानी भी जरूरी होगी।
सबसे बड़ा सवाल रोजगार को लेकर है। प्रदेश के तकनीकी संस्थानों से हर साल बड़ी संख्या में छात्र पास आउट होते हैं, लेकिन उनमें से काफी छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट नहीं मिल पाता। आईटी और कोर सेक्टर की बड़ी कंपनियों की सीमित मौजूदगी के कारण छात्रों को चंडीगढ़, दिल्ली, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर रुख करना पड़ता है। कई छात्र डिग्री पूरी करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या दूसरे क्षेत्रों में रोजगार तलाशने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में सरकार के “रोजगार सृजन” और “उद्यमिता” के दावों की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेज स्तर पर कितने प्रभावी अवसर तैयार होते हैं।
तकनीकी शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश में तकनीकी संस्थानों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता पर भी गंभीर ध्यान देने की जरूरत है। कई कॉलेजों में सीटें खाली रहना इस बात का संकेत है कि छात्र अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर करियर अवसर चाहते हैं। यदि कॉलेजों में आधुनिक तकनीक, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम, प्रशिक्षित फैकल्टी और मजबूत प्लेसमेंट व्यवस्था नहीं होगी तो नए बजट का असर सीमित रह जाएगा।
सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन तकनीकी शिक्षा में सुधार के बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन विपक्ष और छात्र संगठन इन घोषणाओं को जमीनी हकीकत से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि पहले कॉलेजों में खाली पद भरे जाएं, पुरानी मशीनें बदली जाएं, इंटरनेट और डिजिटल सुविधाएं मजबूत की जाएं तथा उद्योगों के साथ वास्तविक साझेदारी विकसित की जाए। केवल बजट घोषणाओं और नई योजनाओं से तकनीकी शिक्षा मजबूत नहीं होगी, बल्कि इसके लिए संस्थानों की वास्तविक समस्याओं को स्वीकार कर उनका समाधान करना होगा।
प्रदेश में तकनीकी शिक्षा का भविष्य अब इसी बात पर निर्भर करेगा कि सरकार इन घोषणाओं को कितनी पारदर्शिता और गंभीरता के साथ लागू करती है। यदि बजट का उपयोग वास्तव में बुनियादी सुधार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और रोजगार आधारित प्रशिक्षण पर होता है, तो यह तकनीकी शिक्षा के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। लेकिन यदि समस्याएं पहले की तरह बनी रहीं, तो करोड़ों रुपये के बजट और बड़े दावों के बावजूद छात्र बेहतर अवसरों के लिए प्रदेश से बाहर जाने को मजबूर रहेंगे।