Saturday, 21 March 2026
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किन महिलाओं को मिलेगी 1500 रूपये की सम्मान राशि फॉर्म से उठे सवाल

शिमला/शैल। विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने प्रदेश की हर महिला को 1500 रूपये प्रतिमाह एक सम्मान राशि देने की गारंटी दी थी। इस गारंटी का असर हुआ और कांग्रेस की सरकार बन गयी। लेकिन सरकार बनने के बाद इस गारंटी को पूरा करना कठिन हो गया। क्योंकि प्रदेश की स्थिति तो श्रीलंका जैसे हालात होने की कगार पर थी। परन्तु यह गारंटी एक बड़ा मुद्दा बनाकर विपक्ष ने उछाल दी। जनता भी इसके प्रति सचेत हो गई और कांग्रेस सरकार से इसकी मांग करने लगी। कांग्रेस के नेता जनता को जवाब देने की स्थिति में नहीं रहे। मुद्दा कांग्रेस हाईकमान तक जा पहुंचा। हाईकमान ने लोकसभा चुनावों से पहले इसे लागू करने के निर्देश दे दिए।
अब सुक्खू सरकार ने इस गारंटी पर अमल करने की घोषणा कर दी है। इसके लिये एक फॉर्म जारी किया गया है। जो यह राशि पाने के लिये हर महिला को भरकर देना है। इस फॉर्म में कुछ वर्ग चिन्हित किये गये हैं। इस लाभ के लिये आवेदन करने वाली महिलाओं से यह जानकारी मांगी गयी है कि उनके परिवार का कोई सदस्य इन वर्गों में से तो नहीं है। फार्म में यह स्पष्ट नहीं किया गया है की इन वर्गों से संबंधित महिला इस लाभ की पात्र होंगी या नहीं। परन्तु यह जानकारी मांगने से ही यह शंका हो जाती है कि इनसे जुड़ी महिलाएं इस लाभ की पात्रा नहीं होगी। यदि ऐसा हुआ तो इस राशि के लाभार्थीयों का आकड़ा बहुत ही कम रह जायेगा। इस फार्म से तो यही संकेत उभरता है।
यह है फॉर्म
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

व्यवस्था परिवर्तन के जुमले ने पहुंचाया सरकार को गिरने की कगार पर

शिमला/शैल। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद प्रदेश की राजनीतिक स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। कांग्रेस के संकट को संभालने के लिये हाईकमान द्वारा भेजे गये पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के बाद यह संकट और गहरा गया है। क्योंकि इस रिपोर्ट पर उठी चर्चाओं के अनुसार इस संकट के लिये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा प्रतिभा सिंह और उनके मंत्री बेटे विक्रमादित्य सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुये प्रतिभा सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने का सुझाव दिया गया है। इसी के साथ मुख्यमंत्री द्वारा भी अपनी गलतियां स्वीकार करने की बात करते हुये लोकसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पर विचार करने की बात की गई है। यदि सही में पर्यवेक्षकों की ऐसी ही रिपोर्ट है तो यह अन्तःविरोधी है और संकट को गहराने वाली है। क्योंकि एक के अपराध की सजा अभी और दूसरे के अपराध पर बाद में विचार किया जायेगा। क्या इस स्थिति को कांग्रेस जन स्वीकार कर पायेंगे? यदि पर्यवेक्षकों के इस सुझाव को मानते हुये इस पर अमल भी कर लिया जाये तो क्या कांग्रेस प्रदेश में लोकसभा की कोई सीट जीत पायेगी? शायद नहीं। जब सरकार बन जाती है तो मुख्यमंत्री प्रमुख हो जाता है और संगठन दूसरे स्थान पर चला जाता है। स्मरणीय है कि जब सुक्खविंदर सिंह सुक्खू प्रदेश अध्यक्ष थे और स्व. वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री थे और दोनों में भेद चल रहे थे। तब कांग्रेस चुनाव हार गयी थी और उस हार के लिये बतौर अध्यक्ष सुक्खू ने मुख्यमंत्री वीरभद्र को जिम्मेदार ठहराया था। सुक्खू का उस समय का ब्यान वायरल हो चुका है। सुक्खू का यह तर्क तब भी सही था और आज भी सही है। कार्यकर्ता सरकार के कार्यों को लेकर जनता में जाता है। सरकार की उपलब्धियों पर चुनाव लड़े जाते हैं उसके ब्यानों पर नहीं। आज हिमाचल की सबसे बड़ी समस्या युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी है। हिमाचल बेरोजगारी में देश का छटा राज्य हो गया है। युवाओं को रोजगार देने की गारंटी दी गई थी। लेकिन विधानसभा के इस बजट सत्र में यह प्रश्न पूछे गये थे कि सरकार ने एक वर्ष में कितना रोजगार उपलब्ध करवाया है। ऐसे हर सवाल के जवाब में सूचना एकत्रित की जा रही का ही जवाब दिया गया है। ऐसे जवाब में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि लोग पार्टी को समर्थन देंगे। इस परिदृश्य में यह सवाल अहम हो जाता है कि यदि कार्यकर्ता जनता के सवालों को लेकर अपने नेताओं से सवाल नहीं पूछेंगे तो किससे पूछेंगे? प्रदेश नेतृत्व द्वारा जवाब न दिये जाने पर हाईकमान तक बात पहुंचाई जायेगी। यदि हाईकमान भी बात नहीं सुनेगा तो फिर बगावत के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। क्योंकि जनता सुप्रीम होती है। पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट से यही झलकता है कि इस समय सरकार और पार्टी को बचाने की बजाये मुख्यमंत्री को बचाने के प्रयास किये जा रहे हैं। भले ही कांग्रेस के हाथ से हिमाचल में सरकार और संगठन दोनों ही निकल जायें। क्योंकि बागी विधायक और पार्टी अध्यक्ष पिछले एक वर्ष से हाईकमान को वस्तुस्थिति से अवगत करवाते आ रहे हैं और उनकी बात नहीं सुनी गयी। सारे प्रदेश को व्यवस्था परिवर्तन की जुमले के गिर्द घुमाया गया और आज मित्रों के बोझ से ही सरकार गिरने पर पहुंच गई है। जबकि यह व्यवस्था परिवर्तन आज तक परिभाषित नहीं हो सका है।

नगर निगम के महापौर और उपमहापौर के चुनाव में विधायकों को मतदान का अधिकार देने का क्या औचित्य ?

कई बार क्षणिक लाभ के लिये हम ऐसे निर्णय ले लेते हैं जिनके परिणाम दूरगामी होते हैं और इसके कारण या तो बाद में निर्णय बदलना पड़ता है या ऐसे निर्णय के दुष्प्रभाव का सारी व्यवस्था पर असर पड़ता है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसमें लगता है कि शायद उस के दूरगामी प्रभावों पर विचार नहीं किया गया है।
इस निर्णय के अनुसार नगर निगमों के महापौर और उपमहापौर के चुनाव में स्थानीय विधायकों को भाग लेने और मतदान करने का अधिकार दिया गया है, शायद यह निर्णय कानून की कसौटी पर सही नहीं उतरेगा।
इस निर्णय के परिणामस्वरूप यदि महापौर और उपमहापौर के चुनाव में विधायकों को मतदान का अधिकार होगा तो फिर क्या जब नगर परिषदों, नगर पंचायतों, जिला परिषदों, पंचायत समितियों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होगा तो उस में भी विधायकों को मतदान का अधिकार होगा ? क्या विधान सभा का चुनाव जीत कर विधायक को विधान सभा के अतिरिक्त स्थानीय निकायों ओर पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में मतदान का
अधिकार मिल जायेगा ?
इसी के आधार पर सांसदों को यह अधिकार होगा कि उनके चुनाव क्षेत्र में आने वाले सभी नगर निगमों, नगर परिषदों, नगर पंचायतों, जिला परिषदों, पंचायत समितियों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में सांसद भी अपने मत का प्रयोग कर सकेंगे । फिर मामला केवल पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों के मुखिया चुनने तक ही सीमित नहीं होगा फिर सांसद को अपने राज्य में मुख्यमन्त्री के चुनाव में मतदान करने का अधिकार मांगने से कैसे रोका जा सकेगा और यह प्रश्न केवल एक राज्य तक सीमित नहीं होगा, राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा।
इसीलिये मैंने कहा कि क्षणिक लाभ के लिये दूरगामी परिणामों वाले निर्णय लेने में पूरा विचार विमर्ष होना चाहिए। एक दो नगर निगमों के महापौर और उपमहापौर के चुनाव के लालच के साथ साथ प्रदेशव्यापी और राष्ट्रव्यापी परिणामों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
ऐसे निर्णय तर्कसंगत नहीं होते, संविधान निर्माताओं ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुये नेता अर्थात प्रधानमन्त्री (सरकार का मुखिया) का चुनाव करने का अधिकार केन्द्र में केवल लोक सभा के सांसदों को दिया है, राज्य सभा के सांसदों को यह अधिकार नहीं है। इसी प्रकार प्रदेश
सरकार का मुखिया, मुख्यमन्त्री विधान सभा के विधायक चुनते हैं विधान परिषद सदस्यों को यह अधिकार नहीं है ।
इसलिये नये आदेशानुसार चुने गये महापौर और उपमहापौर का चयन क्या कानून की कसौटी पर न्यायालय में टिक पायेगा ? यह महत्वपूर्ण प्रश्न रहेगा।

प्रेम कुमार धूमल,
पूर्व मुख्यमन्त्री, हिमाचल प्रदेश,
समीरपुर, जिला हमीरपुर (हि0प्र0)

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