देश में शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लासरूम और कौशल विकास जैसे मुद्दों को लगातार सरकार की उपलब्धियों के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन शिक्षा मंत्रालय की हालिया समीक्षा बैठक ने एक ऐसी सच्चाई सामने रखी है, जो इन दावों की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। सरकार के अनुसार देश में 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के दो करोड़ से अधिक बच्चे आज भी स्कूल से बाहर हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों के अधूरे सपनों और शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का संकेत है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कक्षा एक में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुंच पाते हैं। यानी लगभग 38 प्रतिशत बच्चे बीच रास्ते में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह स्थिति तब है जब शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया जा चुका है और केंद्र व राज्य सरकारें लगातार शिक्षा के विस्तार के दावे करती रही हैं।
शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) अब इन बच्चों को मुख्यधारा में वापस लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसके तहत देश के 10 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा। जिन राज्यों के जिलों को चुना गया है उनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और दिल्ली शामिल हैं। योजना यह है कि जो बच्चे आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक कारणों से नियमित स्कूलों में नहीं लौट सकते, उन्हें ओपन और डिस्टेंस लर्निंग के माध्यम से शिक्षा से जोड़ा जाए। यह पहल जरूरी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर बच्चे स्कूल से बाहर क्यों हो रहे हैं।
भारत में स्कूल छोड़ने की सबसे बड़ी वजह आज भी गरीबी है। लाखों परिवार ऐसे हैं जहां बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा जरूरी घर की आय बढ़ाना माना जाता है। ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चे कम उम्र में ही मजदूरी, खेतों में काम, दुकानों और छोटे व्यवसायों में लग जाते हैं। लड़कियों की स्थिति और भी गंभीर है। घरेलू जिम्मेदारियां, कम उम्र में विवाह और सामाजिक दबाव उनकी शिक्षा बीच में ही रोक देते हैं। शिक्षा मंत्रालय ने भी स्वीकार किया है कि आर्थिक मजबूरियां और घरेलू जिम्मेदारियां बच्चों के स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारण हैं। इसका मतलब साफ है कि यह केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता का भी परिणाम है।
देश में स्कूलों की संख्या बढ़ी है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता अब भी गंभीर चिंता का विषय है। ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। कई स्कूलों में विज्ञान और गणित जैसे विषयों के अध्यापक तक उपलब्ध नहीं हैं। डिजिटल शिक्षा की बात की जाती है, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा तक नहीं है। विभिन्न शिक्षा रिपोर्टों में यह सामने आ चुका है कि कक्षा पांच और आठ तक पहुंचने वाले कई छात्र बुनियादी पढ़ाई और गणित में कमजोर हैं। जब बच्चों और अभिभावकों का स्कूलों पर भरोसा कमजोर होता है, तो धीरे-धीरे ड्रॉपआउट की संख्या बढ़ने लगती है।
सरकार अब ओपन स्कूलिंग मॉडल को समाधान के रूप में सामने ला रही है। एनआईओएस निश्चित रूप से उन बच्चों के लिए अवसर बन सकता है जो नियमित स्कूलों में वापस नहीं जा सकते। लेकिन केवल नामांकन बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होगा। इन बच्चों को कौशल आधारित शिक्षा, रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग और नियमित मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी। यदि शिक्षा का संबंध बच्चों के भविष्य और रोजगार से नहीं जोड़ा गया, तो ड्रॉपआउट की समस्या दोबारा सामने आएगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दो करोड़ बच्चों का स्कूल से बाहर होना केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के भविष्य का सवाल है। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है। लेकिन यदि इतनी बड़ी आबादी शिक्षा और कौशल से वंचित रह जाएगी, तो बेरोजगारी, गरीबी और सामाजिक असमानता और बढ़ सकती है। सरकार की नई पहल उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन अब सबसे बड़ी परीक्षा उसके क्रियान्वयन की होगी। क्योंकि किसी भी देश का भविष्य उसके स्कूलों में तय होता है, और जब करोड़ों बच्चे स्कूल से बाहर हों, तो यह केवल शिक्षा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है।