Wednesday, 20 May 2026
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ऊना के तालाब प्रोजेक्ट में फर्जीवाड़े के आरोप, विजिलेंस जांच की मांग

शिमला/शैल। ऊना जिले के हरोली क्षेत्र में करीब 2.05 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए पुबोवाल तालाब परियोजना (Pubowal Pond Project) पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। सरकार ने इस परियोजना को ‘नेचुरल ट्रीटमेंट सिस्टम’ और ‘स्टेट ऑफ आर्ट टेक्नोलॉजी’ आधारित मॉडल के रूप में पेश किया था, लेकिन अब सामने आये दस्तावेज और विजिलेंस को दी गई शिकायत इस पूरे प्रोजेक्ट को शक के घेरे में ला रहे हैं। ऊना निवासी रोहित कटवाल ने राज्य विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो को लगभग 700 पन्नों के दस्तावेजों के साथ शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि परियोजना में फर्जी डीपीआर, टेंडर में मिलीभगत, हितों के टकराव और करोड़ों रुपये के सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला सामने आता है। शिकायत के अनुसार जिस व्यक्ति ने परियोजना की डीपीआर तैयार की, उसी से जुड़ी कंपनी को बाद में काम दे दिया गया और करोड़ों रुपये का भुगतान भी कर दिया गया। शिकायत में कहा गया है कि जिस व्यक्ति ने डीपीआर तैयार की और बाद में यह काम Rebound Enviro Tech Pvt. Ltd. को मिला, जिसमें वह निदेशक बताये गये हैं। यानी जिसने परियोजना की जरूरत, लागत और तकनीकी ढांचा तय किया, वही सरकारी भुगतान लेने वाली एजेंसी से जुड़ा निकला। सरकारी परियोजनाओं में डीपीआर ही वह आधार होती है, जिसके आधार पर तकनीकी मंजूरी और प्रशासनिक स्वीकृति मिलती है। ऐसे में यदि डीपीआर तैयार करने वाला ही काम लेने वाला निकले, तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मामले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा डीपीआर की सामग्री को लेकर सामने आया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि डीपीआर में अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य की कुछ जगहों का जिक्र किया गया है। इतना ही नहीं, केरल के दो स्थानों के नाम भी दस्तावेज में पाए गए। सवाल यह उठ रहा है कि यदि परियोजना ऊना के हरोली क्षेत्र की थी, तो डीपीआर में अमेरिका और केरल की जगहों का क्या काम था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पूरी डीपीआर इंटरनेट या किसी अन्य परियोजना से कॉपी-पेस्ट कर तैयार की गई। तकनीकी शब्दावली भी कथित तौर पर शहरी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ी हुई बताई गई है, जबकि यह परियोजना एक ग्रामीण तालाब के लिए थी। यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो इसका अर्थ होगा कि जिस दस्तावेज के आधार पर करोड़ों रुपये की मंजूरी मिली, वह वास्तविक साइट अध्ययन पर आधारित ही नहीं था।
शिकायतकर्ता ने 13 मई 2026 को मौके का निरीक्षण कर तस्वीरें भी संलग्न की हैं। शिकायत में कहा गया है कि जिस ‘नेचुरल ट्रीटमेंट सिस्टम’ के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उसकी मुख्य संरचनाएं मौके पर दिखाई नहीं देतीं। डीपीआर में ‘कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड’, ‘फ्लोटिंग वेटलैंड’, ‘कैस्केडिंग एरेशन सिस्टम’ और ‘रूटजोन मीडिया’ जैसी हाईटेक संरचनाओं का उल्लेख है, लेकिन जमीन पर जो दिख रहा है वह एक सामान्य तरीके से सुंदर बनाया गया तालाब है, जिसमें रेलिंग, पक्की पगडंडी, लाइटें, एक छोटा फाउंटेन और एक झोपड़ीनुमा ढांचा नजर आता है। यानी जनता ने जिस ‘स्टेट ऑफ आर्ट टेक्नोलॉजी’ के लिए पैसा दिया, वह तकनीक आखिर जमीन पर कहां है, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। शिकायत में कई खर्चों को भी संदिग्ध बताया गया है। उदाहरण के तौर पर केवल 3X3 मीटर के ‘मेडिटेशन हट’ पर 7.71 लाख रुपये खर्च दिखाए गए हैं। एलईडी स्क्रीन और साउंड सिस्टम के लिए 7.5 लाख रुपये का भुगतान दर्ज है, लेकिन उसके मॉडल और तकनीकी विवरण तक नहीं दिए गए। ‘फ्लोटिंग वेटलैंड’ पर 12 लाख रुपये से अधिक और सामान्य निर्माण सामग्री पर बाजार दर से कई गुना अधिक खर्च दिखाया गया है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि रिकॉर्ड में करीब 60 लाख रुपये का सीमेंट कंक्रीट दिखाया गया, जबकि मौके पर साधारण पत्थर की चिनाई दिखाई देती है। शिकायतकर्ता का दावा है कि केवल इसी मद में 30 से 35 लाख रुपये तक का अंतर हो सकता है।
टेंडर प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। शिकायत के अनुसार परियोजना का टेंडर जनवरी 2024 में जारी हो गया था, जबकि पूरी योजना की प्रशासनिक मंजूरी सितम्बर 2024 में मिली। यानी मंजूरी बाद में और टेंडर पहले। इसके अलावा 2 करोड़ रुपये से अधिक के काम के लिए केवल 11 दिन का टेंडर समय दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इतनी कम अवधि में वास्तविक प्रतिस्पर्धा संभव नहीं थी। तीन कंपनियों ने बोली लगाई, लेकिन शिकायत में दावा किया गया है कि इनमें आपसी संबंध थे। एक कंपनी के दस्तावेज में दूसरी कंपनी के निदेशक का नाम ‘क्लाइंट’ के तौर पर दर्ज मिला, जिससे टेंडर में मिलीभगत यानी ‘बिड कार्टेलाइजेशन’ का संदेह पैदा होता है। ट्रेजरी रिकॉर्ड के अनुसार इस परियोजना में अब तक लगभग 1.63 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद मौके पर वह हाईटेक सिस्टम नजर नहीं आता, जिसके नाम पर पूरा प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इसी तरह की डीपीआर और ठेकेदार पैटर्न गोंदपुर जयचंद और दुलैहड़ा तालाब परियोजनाओं में भी दिखाई देते हैं, जिससे यह मामला एक अकेली परियोजना से आगे बढ़कर पूरे मॉडल की जांच की मांग करता है। अब देखना यह होगा कि विजिलेंस ब्यूरो इस शिकायत पर क्या कारवाई करता है, क्योंकि यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल एक तालाब परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी परियोजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन जाएगा।

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