Wednesday, 04 February 2026
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क्या सरकार अपने ही अन्त विरोधों से टूटने के कगार पर पहुंच गयी है?

शिमला/शैल। क्या हिमाचल सरकार अपने ही भार से टूटने के कगार पर पहुंच गयी है? क्या कांग्रेस हाईकमान इस संकट को सुलझा पायेगी? यह सवाल लोकनिर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के गैर हिमाचली आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर आये ब्यान के बाद उठी आम चर्चा के कारण सबकी चिन्ता और चिन्तन का विषय बन गये हैं। इन सवालों पर राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीतिक परिदृश्य में नजर डालना आवश्यक हो जाता है। अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर उठाये गये सवाल पर सतारूढ़ कांग्रेस में ही जिस तरह का विभाजन पार्टी के मंत्रियों और विधायकों में सामने आया है वह अपने में ही कई गंभीर सवाल खड़े कर जाता है। क्योंकि यह सब उस समय ज्यादा मुखर हो गया जब मुख्यमंत्री ने इस प्रकरण पर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे का जिक्र आने के बाद अपनी प्रतिक्रिया जारी की। इस परिपेक्ष में यह आकलन करना आवश्यक हो जाता है की हालत इस मुकाम तक पहुंचे क्यों?
स्मरणीय है कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव लड़ते हुये दस गारंटियां जारी की थी और चुनावों के दौरान ही पूर्व सरकार के खिलाफ एक आरोप पत्र सार्वजनिक रूप से जारी किया था। स्वभाविक रूप से यह दोनों विषय प्रदेश के हर आदमी से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे और इन्हीं के कारण प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। लेकिन जब सरकार का गठन हुआ तो पहले ही दिन केवल मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की ही शपथ हुई। मंत्रिमंडल का विस्तार होने से एक घंटा पहले ही मुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिला दी गई। उसके बाद जिस तरह से इन लोगों की तैनाती मंत्रियों के साथ की गई उस पर उस समय भी सवाल उठे थे जिन्हें व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर दबा दिया गया। उस दौरान आम आदमी को तो यह कहा गया की प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं लेकिन सरकार अपने खर्चों पर कोई नियंत्रण नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप सरकार को कर्ज के जाल में फंसना पड़ा जिसके कारण आज एक लाख करोड़ से अधिक का कर्ज हो गया है। बल्कि कर्ज के निवेश पर ही सवाल उठने की स्थिति आ गयी है। दूसरी ओर व्यवहारिक रूप से सरकार गारंटीयों पर ब्यानबाजी से आगे नहीं बढ़ पायी है।
मुख्यमंत्री व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर सरकार के हर फैसले को जायज ठहराते चले गये। इसमें उन्हें उन अधिकारियों पर अपनी निर्भरता बनानी पड़ी जिनके खिलाफ बतौर विपक्ष वह स्वयं आरोपित कर चुके थे। जो अधिकारी स्वयं सीबीआई के मामले झेल रहे थे वही मुख्यमंत्री के विशेष सलाहकार बन गये। हर मंत्री के विभाग को लेकर संबंधित मंत्री से पहले ही मुख्यमंत्री के बयान आने की संस्कृति बन गयी। इस कार्य संस्कृति के कारण अनचाहे ही यह संदेश चला गया कि विभाग में मंत्री से पहले मुख्यमंत्री है। अधिकारियों ने हर फैसले पर मंत्री परिषद की मोहर लगवाने की नीति अपना ली। इस सबसे यह हुआ कि मंत्रियों और मुख्यमंत्री में कारगर संवादहीनता बढ़ती चली गयी। इसी संवादहीनता की शिकायतें हाईकमान तक भी पहुंची परन्तु दिल्ली में प्रदेश से एक भी लोकसभा और राज्यसभा सांसद न होने से दिल्ली की निर्भरता पर्यवेशकों पर बढ़ती चली गयी। इसी का परिणाम हुआ कि प्रदेश में एक वर्ष में ही संगठन शुन्य हो गया। सरकार के कार्यकाल में होने वाले पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव सरकार के लिये उसकी नीतियों के दर्पण का काम करते हैं। लेकिन अधिकारियों ने इन चुनावों को टालने की नीतियां अपनाना शुरू कर दी। मामला उच्च न्यायालय में पहुंचने के बाद स्थिति न्यायालय से ही टकराव के मोड़ पर पहुंच गयी। प्रदेश में राज्यसभा सीट हारने और पार्टी के छः विधायकों द्वारा पार्टी बदलना भी मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली का ही परिणाम माना गया था। लेकिन हाईकमान इसका आकलन करने में असफल रही और यह संदेश चला गया कि हाईकमान पूरी तरह मुख्यमंत्री के साथ है।
आज स्थिति यह बन गयी है कि मुख्यमंत्री और उनके सहयोगीयों में कारगर संवाद बहुत कम रह गया है। सरकार ने इस दौरान प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने की जितनी भी योजनाएं घोषित की हैं वह जमीन पर कोई शक्ल नहीं ले पायी हैं। बल्कि संसाधन जुटाने के लिये जितने उपाय किये गये हैं उनसे आम आदमी पर ही आर्थिक बोझ बढ़ा है। इस समय कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता के पास प्रदेश के आम आदमी के पास जाने के लिए कुछ भी विशेष नहीं बचा है। जबकि अभी पंचायत चुनावों का सामना करना पड़ेगा। सरकार ने तीन वर्ष पूरा होने पर मण्डी में जो सम्मेलन किया था उसमें उप मुख्यमंत्री ने जिस भाषा और शैली में मुख्यमंत्री को अधिकारियों को लेकर चेताया था आज उसी स्वर में लोक निर्माण मंत्री ने उस चेतावनी को आगे बढ़ाया है। बल्कि इससे यह और स्पष्ट हो गया कि मुख्यमंत्री की आज राजनेताओं से ज्यादा अधिकारियों पर ही निर्भरता बन गयी है। क्योंकि उपमुख्यमंत्री से लेकर विक्रमादित्य तक सभी राजनेता अधिकारियों के नाम पर मुख्यमंत्री पर ही निशाना साधे हुये हैं। ऐसी स्थिति में यदि समय रहते हाईकमान स्थिति पर नियंत्रण न कर पाया तो सरकार का संकट में आना तय है।

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