Saturday, 03 October 2026
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क्या छापेमारी और गिरफ्तारी से कांग्रेस का बढ़ना रोक पाएंगे मोदी

अदानी प्रकरण से विश्व का शेयर बाजार भी हिल गया है। विदेशी निवेशकों ने इसमें से अपना निवेश निकालना शुरू कर दिया है। विदेशी बैंकों ने अदानी समूह के शेयरों पर कर्ज देना बन्द कर दिया। जो व्यक्ति अमीरों की सूची में 609 वें स्थान से उठकर विश्व में दूसरे स्थान पर पहुंच गया था वह अब हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद शायद 27 वें पायदान पर आ पहुंचा है। देश के हर बड़े सार्वजनिक प्रतिष्ठान का प्रबन्धन अदानी समूह के पास कैसे पहुंचा? जो देश का नम्बर एक और विश्व का दूसरा बड़ा अमीर हो लेकिन टैक्स अदा करने वाले पहले पन्द्रह की सूची में भी न हो तो ऐसे करिश्मे को लेकर सवाल उठना स्वभाविक है। यह सवाल संसद के पटल पर आ चुके हैं। इन सवालों का जवाब देश की सरकार और देश की निगरान एजैन्सीयों से पूछा जाना है। संसद के अन्दर यह काम विपक्ष को करना है और बाहर मीडिया को करना है। जो लोग हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट को देश और अदानी पर हमला करार दे रहे हैं उनसे एक ही सवाल पूछा जाना चाहिये कि क्या देश के बैंकों और एलआईसी जैसी संस्थाओं के पास आम आदमी का पैसा जमा नही है? आम आदमी के इस जमा पर ब्याज दरें क्यों कम हुई हैं? जीरो बैलेन्स के नाम पर खोलें खातों पर न्यूनतम जमा की शर्त क्यों लगानी पड़ी। बैंक की सेवाएं फीस के दायरे में क्यों आ गयी? नोटबन्दी के बाद रियल एस्टेट और ऑटोमोबाईल क्षेत्रों को आर्थिक पैकेज क्यों दिये गये? क्या वह पैसा वापस आ गया है? मोदी सरकार ने जितना सहयोग अदानी समूह को दिया है ऐसा ही सहयोग और कितने घरानों को मिला है। जब देश बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहा है तो प्रति व्यक्ति कर्ज क्यों बढ़ रहा है? महंगाई और बेरोजगारी क्यों बढ़ रही है। हर चुनाव में नये ही नारे क्यों उछालने पड़ रहे हैं पूरानों का हिसाब जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाता।
ऐसे दर्जनों सवाल हैं जो आज हर आदमी के जहन में कौंध रहे हैं। क्योंकि वह इनका भुक्त भोगी है। उसकी विडण्बना यही है कि वह स्वयं व्यवस्था से सवाल नही पूछ पाता। वह उम्मीद करता है कि मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व यह सवाल पूछे। आज मीडिया का एक बड़ा वर्ग यह सवाल पूछने का साहस नहीं कर रहा है और इसलिये गोदी मीडिया के संबोधन से संबोधित हो रहा है। लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग अपने अपने सामर्थय के अनुसार सवाल पूछने का साहस कर रहे हैं। भले ही उनके खिलाफ देशद्रोह और अन्य तरह के मामले बनाये जा रहे हैं। राजनीतिक दलों और नेताओं की भी यही स्थिति चल रही है। जो सवाल पूछने का साहस कर रहे हैं उनके खिलाफ जांच एजैन्सीयों की छापेमारी हो रही है। उनके नेताओं के खिलाफ मामले बनाकर उन्हें हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं के यहां छापेमारी और उसके बाद पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा की दिल्ली हवाई अड्डे से गिरफ्तारी असहनशीलता के प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रधानमंत्री तो ममता बैनर्जी को ‘‘ओ दी दी ओ दी दी’’ करके सार्वजनिक मंच से संबोधित कर सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ गौतम अदानी को लेकर कोई कटाक्ष सहन नही किया जा सकता। इस मानसिकता और गिरफ्तारी के प्रसंग ने बहुत सारे पुराने संदर्भों को जिन्दा करके पुरानों की सहनशीलता और नयों की असहनशीलता को एकदम फिर से चर्चा में लाकर खड़ा कर दिया है।
यह सब अदानी समूह पर हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट और उससे पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस को लेकर बनी नयी जन धारणा का परिणाम माना जा रहा है। जिस राहुल गांधी के चरित्र हनन के लिये अरबों खर्च किये गये थे आज इस यात्रा के बाद वही राहुल व्यक्तिगत स्तर पर मोदी से बड़ा नाम बन गया है। भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी को लेकर फैलायी गयी सारी भ्रान्तियों को जड़ से उखाड़ फैंका है। समाज के हर वर्ग तक राहुल गांधी पहुंच गया है यह एक स्थापित सच्च है। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी अदानी समूह पर हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट और उसके साथ बीबीसी और गॉर्जियन के खुलासों से समाज के हर वर्ग के सवालों के दायरे में आ गये हैं। अगली चुनावी जंग मोदी बनाम राहुल होने जा रही है। क्योंकि आज पूरे देश में कांग्रेस को छोड़कर ऐसा कोई दूसरा राजनीतिक दल नहीं है जिसकी पहचान देश के हर गांव तक हो। न चाहते हुए भी क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के साथ खड़े होना होगा। अन्यथा अपने-अपने राज्य से बाहर केन्द्र की सरकार को लेकर सबकी स्थिति दिल्ली में आम आदमी पार्टी जैसी होगी। आप लोकसभा के दोनों चुनावों में दिल्ली में कोई भी सीट क्यों नहीं जीत पायी? क्योंकि केन्द्र के लिये मोदी विकल्प थे। आज मोदी बनाम राहुल की अगली लड़ाई में क्षेत्रीय दलों के लिये यह सबसे बड़ा सवाल होगा। आज कांग्रेस को विपक्षी एकता से ज्यादा राज्यों में कांग्रेस के कमजोर नेतृत्व को पूरी कड़ाई के साथ सुधारना होगा या एक तरफ करना होगा।

क्या अदानी के ग्रहण से निकल पायेंगे मोदी

अदानी प्रकरण पर हिन्डनबर्ग के खुलासे से जो परिस्थितियां निर्मित हुई है उनसे पूरा देश हिल कर रह गया है। क्योंकि इस खुलासे से अन्तरराष्ट्रीय शेयर बाजार से लेकर देश के शेयर बाजार में अदानी समूह के शेयरों में गिरावट आयी है। इस गिरावट से देश विदेश के हर निवेशक को नुकसान हुआ है। इसमें सबसे गंभीर पक्ष यह है कि देश के सार्वजनिक बैंकां और एलआईसी तक ने इस समूह में निवेश किया है। बैंकों ने तो कर्ज भी दिया है। लगभग हर सार्वजनिक क्षेत्र का प्रबन्धन इस समूह के पास है। ऐसे में यह स्थिति बन चुकी हैं कि इस समूह के डूबने से पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा। संसद में इस प्रकरण पर उठे विपक्ष के सवालों का कोई जवाब नहीं आया है। प्रधानमंत्री का भाषण भी ‘‘सवाल गंदम और जवाब चना’’ बनकर रह गया है। इस प्रकरण पर उठे सवालों के परिदृश्य में संसद कुछ समय के लिये स्थगित करनी पड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय में इस पर आयी याचिकाओं पर शीर्ष अदालत ने अपने स्तर पर जांच करवाने का भरोसा देश को दिया है। इस जांच के लिये सरकार द्वारा सुझाये नामों को शीर्ष अदालत ने अस्वीकार कर दिया है। सरकार ने हिन्डन बर्ग के खुलासे को देश पर हमला कर दिया है लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं दिया है कि देश के करीब सारे बड़े सार्वजनिक प्रतिष्ठान इस समूह के पास कैसे पहुंच गये? देश का सबसे अमीर व्यक्ति शीर्ष कर दाताओं के पहले दस नामों में भी शामिल क्यों नहीं है। यह सामान्य सवाल आज देश के हर नागरिक के दिमाग में आ चुके हैं यह एक कड़वा सच है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा है। क्योंकि हिंन्डन बर्ग के खुलासे के साथ ही गुजरात दंगों को लेकर बी.बी.सी. कि एक डॉक्यूमैन्ट्री आ गयी इस पर प्रतिबन्ध लगाते हुये बी.बी.सी. पर ही प्रतिबन्ध लगाने की मांग के आश्य की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गयी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस आग्रह को अस्वीकार कर दिया। इस याचिका से कश्मीर फाईल्ज पर प्रधानमंत्री का यह तर्क फिर चर्चा में आ गया की यदि कश्मीर फाईल्ज से हटकर किसी के पास और तथ्य हैं तो उसे अलग से फिल्म बनाकर सामने लाना चाहिये। ठीक यही तर्क बी.बी.सी. की डॉक्यूमैन्ट्री पर लागू होता है। बी.बी.सी. के खुलासे के बाद बी.बी.सी. पर छापेमारी हो गयी। इसके बाद विश्व के सबसे प्रतिष्ठित अखबार दी गार्जियन का खुलासा गया। दी गार्जियन के खुलासे के बाद ईजरायल की कंपनी को लेकर यह सामने आ गया कि उसने भारत के में चुनावों को प्रभावित किया है। मोदी सरकार हर खुलासे पर खामोश है। यह भी नहीं कह पा रही है कि यह सब गल्त है। कांग्रेस लगातार सरकार और प्रधानमंत्री से इस सब पर प्रतिक्रिया की मांग कर रही है।
इस तरह जो परिस्थितियां बनती जा रही हैं वह भाजपा, केंद्र की सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी के लिये कठिनाइयां पैदा करेंगी यह तय है। क्योंकि एक आदमी अदानी के डूबने से देश के डूबने की व्यवहारिक स्थिति बन गयी है। महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ेगी। हालात एक और जनान्दोलन की ओर बढ़ रहे हैं। हिंन्दू-मुस्लिम, मन्दिर-मस्जिद के नाम पर अब फिर ध्रुवीकरण होना संभव नहीं लग रहा है। क्योंकि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने पूरा परिदृश्य बदल कर रख दिया है। आज राहुल गांधी नरेंद्र मोदी से बड़ा नाम बन गया है। राहुल की छवि बिगाड़ने के सारे प्रयास अर्थहीन होकर रह गये हैं। ऐसे में कांग्रेस को कमजोर करने के लिये कांग्रेस की सरकारों और उसके राज्यों के नेतृत्व को कमजोर करने की रणनीति अपनाई जाएगी यह तय है। इसमें यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का राज्यों का नेतृत्व इस स्थिति का कैसे मुकाबला करता है।

अदानी पर उठते सवालों से कब तक बचेगी सरकार और प्रधानमंत्री

क्या लोकतंत्र को सही में खतरा पैदा हो गया है? क्या विपक्ष को संसद में भी सरकार से तीखे सवाल पूछने का अधिकार नहीं है? क्या विपक्ष के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें संसद की कार्यवाही से ही निकाल दिया जायेगा? क्या देश की सारी व्यवस्था एक कारपोरेट घराने के गिर्द ही सिमट कर रह गयी है? क्या इन सवालों को एक लम्बे समय तक टाला जा सकता है? क्या देश एक ही आदमी के ‘‘मन की बात’’ के गिर्द घूमने को बाध्य किया जा रहा है? यह सवाल और ऐसे अनेकों सवाल अदानी प्रकरण के बाद खड़े हो गये हैं। क्योंकि जो कारपोरेट घराना कुछ ही वर्ष पहले विश्व के अमीरों की सूची में 609 स्थान पर था वह जब एक दशक से भी कम समय में देश का सबसे अमीर और विश्व का दूसरा रईस बन जाये तो निश्चित है कि वह सबकी जिज्ञासा का विषय तो बनेगा ही। ‘‘महाजनो येन गतः स पन्थाः’’ का अनुसरण करते हुए हर व्यक्ति उसके पद चिन्हों पर चलने का प्रयास करेगा ही। क्योंकि इस घराने का दखल उद्योग के हर क्षेत्र में हो गया। सरकार की नीतियां इसी के अनुकूल होती चली गयी। करोना महामारी के दौरान भी ‘‘आपदा को इसी ने अवसर’’ बनाया। देश के हर राज्य में ही नहीं विश्व के दूसरे देशों में भी इसका प्रसार होता चला गया। सता का इसे पूरा सहयोग मिल रहा है यह प्रधानमंत्री की इससे सार्वजनिक नजदीकियों के चलते जन चर्चा में आ गया। इस जन चर्चा के परिणाम स्वरूप देश-विदेश के निवेशक इस घराने की कंपनियों में निवेश करने लग गये। इसकी गति से प्रभावित होकर कुछ लोग इसकी सफलता के रहस्य को भी समझने में लग गये।
इसी खोज के परिणाम स्वरूप एक रिसर्च संस्था हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सामने आ गयी। इस रिपोर्ट ने यह खुलासा किया कि इस घराने में कई फर्जी विदेशी कंपनियों का हजारों करोड़ का निवेश है। यह कंपनियां और इनके संचालक धरातल पर मौजूद ही नही है। इनके मुख्यालय ‘‘टैक्स हैवन’’ देशों में स्थित हैं। इस घराने ने अपनी कंपनियों के शेयरों में फर्जी उछाल दिखाकर देश-विदेश के शेयर बाजार को प्रभावित किया है। यह खुलासा भी सामने आ गया कि इस धन्धे में इसके अपने परिजनों की भी सक्रिय भागीदारी है। यह पहले से ही सार्वजनिक संज्ञान में था कि 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रचार के लिए नरेन्द्र मोदी ने गौतम अदानी के ही हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया है। सरकार बनने के बाद गौतम अदानी प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर में साथ रहते आये हैं। इस आश्य के फोटोग्राफ तक संसद में विपक्ष दिखा चुका है। प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों में अकसर अदानी का साथ रहना या बाद में अदानी का उन देशों में जाना संसद में चर्चा और सवालों का विषय रहा है। सिंगापुर और बांग्लादेश में प्रधानमंत्री की सिफारिशों के बाद अदानी को ठेके मिलना सब आरोपों का विषय रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री ने संसद में इन सवालों का जवाब नही दिया है। बल्कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में पूछे गये अठारह सवालों को उनके भाषण में ही हटा दिया गया है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को देश के खिलाफ साजिश करार दिया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने इस सारी बहस का रुख बदलते हुये ‘‘एक अकेला सब पर भारी’’ करार दिया है।
इस परिदृश्य में अब यह प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय में भी पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है कि निवेशकों के निवेश की सुरक्षा के क्या उपाय हैं। आर.बी.आई. और सैबी से भी जवाब मांगा है क्योंकि सारी निगरानी एजैन्सियां अब तक खामोश बैठी हैं। जबकि अदानी समूह के शेयर लगातार गिरते जा रहे हैं। विदेशी निवेशक अपना निवेश निकाल रहे हैं। विदेशी बैंकों ने अदानी के शेयरों को बॉण्डज् के तौर पर लेने से मना कर दिया है। देश में भी एल.आई.सी., एस.बी.आई. और पी.एन.बी. सब नुकसान के दायरे में हैं। रिपोर्टों के मुताबिक दस लाख करोड़ का नुकसान हो चुका है। इन सब प्रतिष्ठानों में देश के आम आदमी का पैसा जमा है और इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा अदानी समूह में निवेशित है जिसके शेयर लगातार गिर रहे हैं। तो क्या आम आदमी इस पर चिंतित नहीं होगा। सरकारी बैंक अदानी को ढाई लाख करोड़ का कर्ज दे चुके हैं। सरकार चौरासी हजार करोड़ का कर्ज माफ कर चुकी है। देश का यह सबसे अमीर आदमी टैक्स देने वाले पहले पन्द्रह की सूची में भी नहीं है। यह आरोप संसद में लग चुका है। अदानी पर उठते सवालों से प्रधानमंत्री और सरकार लगातार बचते फिर रहे हैं। ऐसे में क्या इस स्थिति को लोकतंत्र के लिये घातक नहीं माना जाना चाहिये? क्या सरकार का रुख एक और जन आन्दोलन की जमीन तैयार नहीं कर रहा है?

अदानी पर उठते सवालों से कब तक बचेगी सरकार और प्रधानमंत्री

क्या लोकतंत्र को सही में खतरा पैदा हो गया है? क्या विपक्ष को संसद में भी सरकार से तीखे सवाल पूछने का अधिकार नहीं है? क्या विपक्ष के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें संसद की कार्यवाही से ही निकाल दिया जायेगा? क्या देश की सारी व्यवस्था एक कारपोरेट घराने के गिर्द ही सिमट कर रह गयी है? क्या इन सवालों को एक लम्बे समय तक टाला जा सकता है? क्या देश एक ही आदमी के ‘‘मन की बात’’ के गिर्द घूमने को बाध्य किया जा रहा है? यह सवाल और ऐसे अनेकों सवाल अदानी प्रकरण के बाद खड़े हो गये हैं। क्योंकि जो कारपोरेट घराना कुछ ही वर्ष पहले विश्व के अमीरों की सूची में 609 स्थान पर था वह जब एक दशक से भी कम समय में देश का सबसे अमीर और विश्व का दूसरा रईस बन जाये तो निश्चित है कि वह सबकी जिज्ञासा का विषय तो बनेगा ही। ‘‘महाजनो येन गतः स पन्थाः’’ का अनुसरण करते हुए हर व्यक्ति उसके पद चिन्हों पर चलने का प्रयास करेगा ही। क्योंकि इस घराने का दखल उद्योग के हर क्षेत्र में हो गया। सरकार की नीतियां इसी के अनुकूल होती चली गयी। करोना महामारी के दौरान भी ‘‘आपदा को इसी ने अवसर’’ बनाया। देश के हर राज्य में ही नहीं विश्व के दूसरे देशों में भी इसका प्रसार होता चला गया। सता का इसे पूरा सहयोग मिल रहा है यह प्रधानमंत्री की इससे सार्वजनिक नजदीकियों के चलते जन चर्चा में आ गया। इस जन चर्चा के परिणाम स्वरूप देश-विदेश के निवेशक इस घराने की कंपनियों में निवेश करने लग गये। इसकी गति से प्रभावित होकर कुछ लोग इसकी सफलता के रहस्य को भी समझने में लग गये।
इसी खोज के परिणाम स्वरूप एक रिसर्च संस्था हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सामने आ गयी। इस रिपोर्ट ने यह खुलासा किया कि इस घराने में कई फर्जी विदेशी कंपनियों का हजारों करोड़ का निवेश है। यह कंपनियां और इनके संचालक धरातल पर मौजूद ही नही है। इनके मुख्यालय ‘‘टैक्स हैवन’’ देशों में स्थित हैं। इस घराने ने अपनी कंपनियों के शेयरों में फर्जी उछाल दिखाकर देश-विदेश के शेयर बाजार को प्रभावित किया है। यह खुलासा भी सामने आ गया कि इस धन्धे में इसके अपने परिजनों की भी सक्रिय भागीदारी है। यह पहले से ही सार्वजनिक संज्ञान में था कि 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रचार के लिए नरेन्द्र मोदी ने गौतम अदानी के ही हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया है। सरकार बनने के बाद गौतम अदानी प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर में साथ रहते आये हैं। इस आश्य के फोटोग्राफ तक संसद में विपक्ष दिखा चुका है। प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों में अकसर अदानी का साथ रहना या बाद में अदानी का उन देशों में जाना संसद में चर्चा और सवालों का विषय रहा है। सिंगापुर और बांग्लादेश में प्रधानमंत्री की सिफारिशों के बाद अदानी को ठेके मिलना सब आरोपों का विषय रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री ने संसद में इन सवालों का जवाब नही दिया है। बल्कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में पूछे गये अठारह सवालों को उनके भाषण में ही हटा दिया गया है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को देश के खिलाफ साजिश करार दिया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने इस सारी बहस का रुख बदलते हुये ‘‘एक अकेला सब पर भारी’’ करार दिया है।
इस परिदृश्य में अब यह प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय में भी पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है कि निवेशकों के निवेश की सुरक्षा के क्या उपाय हैं। आर.बी.आई. और सैबी से भी जवाब मांगा है क्योंकि सारी निगरानी एजैन्सियां अब तक खामोश बैठी हैं। जबकि अदानी समूह के शेयर लगातार गिरते जा रहे हैं। विदेशी निवेशक अपना निवेश निकाल रहे हैं। विदेशी बैंकों ने अदानी के शेयरों को बॉण्डज् के तौर पर लेने से मना कर दिया है। देश में भी एल.आई.सी., एस.बी.आई. और पी.एन.बी. सब नुकसान के दायरे में हैं। रिपोर्टों के मुताबिक दस लाख करोड़ का नुकसान हो चुका है। इन सब प्रतिष्ठानों में देश के आम आदमी का पैसा जमा है और इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा अदानी समूह में निवेशित है जिसके शेयर लगातार गिर रहे हैं। तो क्या आम आदमी इस पर चिंतित नहीं होगा। सरकारी बैंक अदानी को ढाई लाख करोड़ का कर्ज दे चुके हैं। सरकार चौरासी हजार करोड़ का कर्ज माफ कर चुकी है। देश का यह सबसे अमीर आदमी टैक्स देने वाले पहले पन्द्रह की सूची में भी नहीं है। यह आरोप संसद में लग चुका है। अदानी पर उठते सवालों से प्रधानमंत्री और सरकार लगातार बचते फिर रहे हैं। ऐसे में क्या इस स्थिति को लोकतंत्र के लिये घातक नहीं माना जाना चाहिये? क्या सरकार का रुख एक और जन आन्दोलन की जमीन तैयार नहीं कर रहा है?

मोदी सरकार के लिये घातक होगा अदानी प्रकरण

अदानी प्रकरण और मोदी सरकार का वर्ष 2023-2024 के लिए बजट दोनों करीब एक साथ आये हैं। मोदी सरकार का यह बजट उनके इस कार्यकाल का अन्तिम बजट है। 2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। इस नाते यह बजट महत्वपूर्ण हो जाता है। आयकर में भी बढ़ाई गयी सीमा अगले वर्ष होने वाले चुनावों के परिदृश्य में ही देखी जा रही है। बजट के सारे परिणामों के पूरा होने के लिये यह कहा गया है कि यह सब कुछ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए बजट पर यह सवाल उठाना बेमानी हो जाता है कि धन का प्रावधान कहां से होगा या यह बजट आम आदमी पर करों का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष बोझ बढ़ायेगा और सरकार की कर्ज पर निर्भरता बढ़ जायेगी। क्योंकि यह सामने चुका है कि सरकार ने संसाधन जुटाने के लिये पिछले वर्षों में भी विनिवेश, सार्वजनिक उपक्रमां को निजी क्षेत्र को सौंपने आदि के जो लक्ष्य रखें थे वह पूरे न होने के बाद संपत्तियों के मौद्रिकरण की नीति घोषित की है। संपत्तियों की जानकारी जूटाने के लिये पंचायत स्तर तक पत्र भेज दिया गया है। पहले चरण में मौद्रिकरण के नाम पर अठारह लाख एकड़ सरकारी जमीने बेचने का लक्ष्य तय किया गया है। महंगाई पर कितना नियन्त्रण हो पाया है। यह हर रोज बढ़ता कीमतों से सामने आ जाता है। बेरोजगारी के क्षेत्र में दो करोड नौकरियां देने के वादे से चलकर यह सरकार अब 4 वर्ष के लिये अग्निवीर बनाने तक पहुंची है। सरकार की अब तक की सारी योजनाओं का हासिल यही है कि एक सौ तीस करोड़ की आबादी में आज भी करीब साढ़े सात करोड लोग ही आयकर रिटर्न भरने तक पहुंचे हैं और उनमें भी आयकर देने वाले केवल डेढ़ करोड़ लोग ही है। आज भी सरकार अस्सी करोड लोगों को मुफ्त राशन देने को उपलब्धी करार दे रही है। अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जब अस्सी करोड लोग अपने लिये दो वक्त का राशन भी न जूटा पा रहे हो तो सारे घोषित लक्ष्यों और उपलब्धियों को दिन में ही सपने देखने से ज्यादा क्या संज्ञा दी जाये। आज कार्यकाल के अन्तिम बजट पर यह सवाल उठाने इसलिये प्रासांगिक हो जाता है क्योंकि देश का सबसे अमीर और विश्व का तीसरा अमीर व्यक्ति गौतम अदानी एक रिपोर्ट आने के बाद ही पन्द्रहवें पायदान पर पहुंच गया है। सरकार ने अदानी समूह के हवाले कितने सार्वजनिक प्रतिष्ठान कर रखे हैं सारा देश जानता है। सार्वजनिक बैंकों ने इस समूह को कर्ज भी दिये और इसके शेयर भी खरीदे। एल आई सी ने भी इसमें निवेश किया और यह सामने आया है कि इतना निवेश करने के लिये प्रधानमन्त्री या वित्त मन्त्री की पूर्व अनुमति चाहिये। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में यह खुलासा सामने आया कि इस समूह ने अपनी कंपनियों के शेयरों में 85 का उछाल दिखाकर निवेशकों को निवेश के लिये प्रेरित किया। बाद में अधिकांश कंपनियां फर्जी और अदानी परिवार के सदस्य द्वारा ही टैक्स हैवन देशों में संचालित के जाने का खुलासा सामने आया। इसके परिणाम स्वरुप समूह के शेयरों की कीमतों में गिरावट आने लगी। विदेशी निवेशकों ने निवेश बन्द कर दिया और अदानी समूह को अतिरिक्त बीस हजार करोड का निवेश जुटाने के लिये जारी किया एफ.पी.ओ. वापिस लेना पड़ा। यह एफ.पी.ओ. वापिस लेने से हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। समूह के शेयरों में गिरावट आने से निवेशकों में हड़कंप होना स्वभाविक है कि क्योंकि जिस लाभ की उम्मीद से निवेश किया गया था उसकी जगह मूल निवेश के भी सुरक्षित रह पाने पर प्रश्नचिंह लगता जा रहा है। एल. आई.सी. और सार्वजनिक बैंकों में देश के आम आदमी का पैसा जमा हैं। आज यह स्थिति पैदा हो गयी है कि अदानी समूह के डूबने से पूरे देश की आर्थिकी पर गंभीर संकट आ जायेगा। बजट के सारे लक्ष्य कागजी होकर रह जायेंगे। लेकिन यह सब होने के बावजूद देश की सारी निगरान एजैन्सियों का मौन बैठे रहना और संसद में विपक्ष के प्रश्नों पर सरकार का बहस से बचना देश के लिये एक अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देता है। यह स्थिति सरकार के भविष्य के लिये निश्चित रूप से घातक होने वाली है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को देश पर हमला करार देकर तनाव की स्थिति तो बनाई जा सकती है लेकिन उसे देश की आर्थिकी को नहीं बचाया जा सकता है। इसलिये अब प्रधानमन्त्री देश के सामने सही स्थिति रखने और विपक्ष के प्रश्नों का प्रमाणित जवाब देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा है।

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