राहुल गांधी प्रकरण राष्ट्रीय प्रश्न बनता जा रहा है क्योंकि इस मुद्दे पर सारा विपक्ष एकजुट होकर कांग्रेस के साथ खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र ने इस एक जूटता पर यहां तक कह दिया कि सारे चोर इक्कठे हो गये हैं। कुछ लोगों ने मेरी छवि बिगाड़ने के लिये सुपारी दे रखी है। प्रधानमंत्री की इन प्रतिक्रियाओं से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह इस प्रकरण से पूरी तरह हिल गये हैं अन्यथा प्रधानमंत्री स्तर के व्यक्ति से इस तरह की अपेक्षा नहीं की जा सकती। पूरी केन्द्र सरकार और भाजपा इस मामले को अदालती मामला करार देकर इसका प्रभाव हलका करने का प्रयास कर रही है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे पूर्व भी कई सांसदों की सदस्यता अदालती फैसलों के कारण जा चुकी है तब तो इतना हंगामा खड़ा नहीं हुआ था फिर अब क्यों। इस तर्क का जवाब देने के लिये यह समझना आवश्यक है कि जिन अन्य सांसदों की सदस्यता गयी है उनके खिलाफ मानहानि के नहीं बल्कि आपराधिक मामले थे। राहुल के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं था। फिर जिस अधिनियम के तहत राहुल की संसद सदस्यता रद्द की गयी है उसमें यह नहीं कहा गया है कि फैसला आने के बाद स्वतः ही सदस्यता चली जायेगी। फैसले से व्यक्ति अयोग्य हो जायेगा लेकिन उसके निष्कासन के लिये आदेश राष्ट्रपति से चाहिये और राष्ट्रपति ऐसा आदेश चुनाव आयोग की राय से पारित करेगा। लेकिन राहुल के मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ। लोकसभा सचिवालय में अपने ही स्तर पर यह सब कुछ कर दिया। इसी में राजनीतिक दबाव की गंध आती है। क्योंकि अगली कड़ी में आवास खाली करने का फरमान भी जारी हो गया।
राहुल के जिस ब्यान से मोदी समाज का अपमान हुआ है उससे ज्यादा अपमानजनक टिप्पणी राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य और भाजपा नेत्री खुशबू सुन्दर की 2018 में रही है। तब मोदी समाज का अपमान नहीं हुआ क्योंकि मोदी किसी समुदाय विशेष का घोतक नहीं है। मोदी उपनाम वाले सारे लोग एक ही समुदाय या जाति के नहीं हैं। हिन्दू, मुस्लिम, पारसी सभी इस उपनाम का उपयोग करते हैं। वैष्णव (बनिया) पोरबन्दर के खारवा (मछुआरे) और लोहाना (व्यवसायी) समुदाय में मोदी उपनाम लगाने वाले लोग हैं। ओ.बी.सी. की सूची में मोदी नाम का कोई समुदाय या जाती नहीं है। बिहार और राजस्थान की केन्द्रीय सूची में भी कोई मोदी नहीं है। गुजरात की केंद्रीय सूची में मोदी घांची है। यहां सब अब सामने आ चुका है। इस गणित में कौन सा मोदी कैसे आहत हुआ यह एक सामान्य समझ का विषय बन जाता है। आगे अदालतों में यह बहस का विषय बनेगा। इस मामले की सुनवाई एक माह में पूरी हो गयी। जबकि शायद फास्ट टै्रक कोर्ट भी इस गति से फैसले नही दे पाये हैं। इस तरह मामले के सारे तथ्यों को यदि एक साथ रखकर देखा जाये तो इसमें निश्चित रूप से राजनीति की गंध आती है। एक राजनीतिक गंध हर रोज स्पष्ट होती जा रही है। इसी से भाजपा लगातार यह सवाल कर रही है कि कांग्रेस ऊपरी अदालत में क्यों नहीं जा रही है। क्योंकि जैसे ही मामला अदालत में जायेगा तो तुरंत प्रभाव से अदालत में विचाराधीन की श्रेणी में आ जायेगा और सार्वजनिक बहस काफी हद तक रुक जायेगी यही भाजपा चाहती है।
इस समय नरेंद्र मोदी से राहुल का राजनीतिक कद बहुत बढ़ गया है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक की भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल को जिस तरह से स्थापित कर दिया है उसकी बराबरी कर पाना शायद नरेंद्र मोदी के लिये कठिन हो गया है। क्योंकि इस प्रकरण के बाद वह सब कुछ एकदम फिर से चर्चा में आ गया है जो पिछले आठ वर्षों में देश में घटा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश विदेश में दिये सारे ब्यान ताजा हो गये हैं। किस तरह से एक ही झटके में यह कह दिया गया कि 75 वर्षों में देश में हुआ ही कुछ नहीं है। किस तरह से पूर्व प्रधानमंत्रियों को लेकर टिप्पणियां की गयी है वह सब चर्चा में आ गयी है। कैसे नेहरु, गांधी परिवार के खिलाफ एक तरह से जिहाद छेड़े गये। कैसे राहुल को पप्पू प्रचारित करने में अरबों रुपए खर्च किये गये। कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन में यह सामने आ चुका है। यह बहस चल पड़ी है कि देश का अपमान नरेन्द्र मोदी ने किया है कि राहुल गांधी ने। क्योंकि सरकार लगातार अपने विरोधियों को येन केन प्रकारेण दबाने में लगी रही और आाम जनता को इसके बदले में जो महंगाई और बेरोजगारी मिली उसमें आज जनता को दोनों में तुलना करने पर खड़ा कर दिया है और उसमें मोदी कमजोर पढ़ते जा रहे हैं। क्योंकि अदानी प्रकरण पर सारी सरकार और भाजपा का अदानी के पक्ष में खड़े हो जाना आम आदमी की नजर में लगातार प्रश्नित होता जा रहा है। जब आज तक हर विवादित मुद्दे पर जे.पी.सी. का गठन होता आया है तो अदानी मामले में क्यों नहीं ? क्यों केंद्रीय कानून मंत्री सर्वोच्च न्यायालय और सेवानिवृत्त जजां के खिलाफ हर कुछ बोलने लग गये हैं। जनता इस सब पर नजर रख रही हैं और यही भाजपा तथा मोदी सरकार का कमजोर पक्ष बनता जा रहा है।






इस बदले परिदृश्य में पूर्णेश मोदी पुनः उच्च न्यायालय चले गये और गुहार लगाई कि स्टे को वापस ले लिया जाये और ट्रायल कोर्ट अपनी अगली कारवाई शुरू करे। उच्च न्यायालय ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुये स्टे हटा दिया। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विपुल पांचोली के स्टे वापिस लेने के बाद मामला सी.जे.एम. की अदालत पहुंच गया। एक माह में सारी कारवाई की प्रक्रिया पूरी होकर फैसला आ गया। फैसले में राहुल गांधी को दो वर्ष की सजा सुना दी गयी और मामला चर्चा में आ गया। क्योंकि इस कानून के तहत अधिकतम सजा ही दो वर्ष की है और पंचायत से लेकर संसद तक किसी भी चुने हुए प्रतिनिधि की सदस्यता रद्द करने के लिए कम से कम दो वर्ष की चाहिए। यदि राहुल को दो वर्ष से कम की सजा होती तो इस पर इतना शोर ही न उठता। अब एक माह में सारा ट्रायल पूरा हो जाना और सजा भी दो वर्ष की होना जिसका सीधा प्रभाव सांसदी पर पड़ेगा। यह सब संयोगवश हो गया या कोई और कारण भी रहे होंगे यह सब भविष्य के गर्भ में छिपा है इस पर अभी कुछ कहना सही नहीं होगा।
लेकिन इस फैसले ने पूरे देश की सियासत को हिला कर रख दिया है। राहुल गांधी इस फैसले से जरा भी विचलित नहीं है यह उनकी पत्रकारवार्ता से स्पष्ट हो गया। क्योंकि राहुल गांधी के इस ब्यान पर यह मानहानि मामला हुआ उससे भी गंभीर आरोप मोदी उपनाम पर राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य खुशबू सुन्दर 2018 में लगा चुकी है बल्कि यह आरोप लगाने के बाद ही वह भाजपा में शामिल हुई है। उनके ब्यान से किसी मोदी की कोई मानहानि नहीं हुई है। कांग्रेस ने खुशबू के ब्यान को मुद्दा बना लिया है। बल्कि इस फैसले के बाद भाजपा के सारे नेताओं के ब्यान एकदम नये सिरे से चर्चा में आ गये हैं। हिमाचल से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर शाहीनबाग आन्दोलन के प्रसंग में दिया ब्यान तक चर्चा का केन्द्र बन गये हैं। राहुल को लेकर आया फैसला एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है। भाजपा जब इसे ओ.बी.सी. के अपमान का मुद्दा बनाने का प्रयास कर रही है तब उनके अपने ही नेताओं के ब्यान उस पर भारी पड़ रहे हैं। भाजपा और अदाणी के रिश्ते एक राष्ट्रीय सवाल बनता जा रहा है। अदाणी की भ्रष्टता पर प्रहार को राष्ट्र का अपमान बताना भाजपा को भारी पड़ेगा यह स्पष्ट होता जा रहा है। राहुल गांधी को उच्च न्यायालय से राहत मिलेगी ही क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय लिली थॉमस लोक प्रहरी और सुब्रमण्यम स्वामी के मामलों में जिस तरह की स्थापनाएं कर चुका है उनके मानकों पर शायद यह मामला पूरा नहीं उतरता है। ऐसे में इस फैसले के बाद राष्ट्रीय प्रश्नों पर उठने वाली बहस भाजपा और प्रधानमंत्री पर भारी पड़ेगी। वैसे यह देखना रोचक होगा कि प्रदेशों में बैठा हुआ कांग्रेस नेतृत्व किस तरह से जनता के बीच जाता है।


















कर्ज को लेकर यह नियम रहा है कि जी.डी.पी. के 3% से ज्यादा नहीं बढ़ना चाहिये। अब कोविड काल में यह सीमा बढ़ाकर 6% कर दी गयी है। इस संद्धर्भ में यह सामने आना चाहिये की कर्ज की सीमा का कब और क्यों अतिक्रमण हुआ तथा कर्ज के अनुपात में जी.डी.पी. में कितनी बढ़ौतरी हुई। जी.डी.पी. और एस.डी.पी. दोनों के आंकड़े आने चाहिये। बजट से पहले और बाद में कब-कब सेवाओं और वस्तुओं के दामों में बढ़ौतरी होती रही है। श्वेत पत्र में यह जानकारीयां होना इसलिये आवश्यक है कि अभी सुक्खु सरकार ने जयराम के कार्यकाल के अन्तिम छः माह के फैसले यह कहकर पलटे हैं कि इनके लिये बजट का प्रावधान नहीं था और इन्हें पूरा करने के लिये 5000 करोड़ के अतिरिक्त धन की आवश्यकता होगी। अब कांग्रेस ने चुनावों से पहले ही दस गारंटीयों की वायदा जनता से कर रखा है। मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ओ.पी.एस. लागू कर दिया गया है अन्य गारंटीयों के लिये भी प्रतिब(ता है। युवाओं को प्रतिवर्ष एक लाख रोजगार उपलब्ध करवाना है। इसलिये यह खुलासा भी बजट में आना चाहिये की इन गारंटीयों के औसत लाभार्थी कितने होंगे और इसके लिये कितना धन अपेक्षित होगा तथा कहां से आयेगा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि दस के लाभ के लिये नब्बे की जेब पर डाका डाला जायेगा।
अभी बजट प्रावधान और कर्ज को लेकर सुक्खु और जयराम में शिव धाम परियोजना के संद्धर्भ में वाक यद्ध शुरू हुआ है। इस वाक युद्ध के बाद यह सामने आया है कि एशियन विकास बैंक से पर्यटन अधोसंरचना के लिये 1311 करोड़ का कर्ज स्वीकृत हुआ है। इससे पहले यही बैंक 256.99 करोड़ हैरिटेज पर्यटन के नाम पर दे चुका है। जो स्थान हैरिटेज में चिन्हित हुए थे वही अब अधोसंरचना में भी चिन्हित हैं। ऐसे में यह खुलासा होना चाहिये की हैरिटेज में कितना काम हुआ है और उससे कितना राजस्व अर्जित हो रहा है। क्योंकि कर्ज का निवेश राजस्व अर्जित करने के लिये ही किये जाने का नियम है। पर्यटन के अतिरिक्त जल जीवन, बागवानी आदि और भी कई विभागों को इस बैंक से कर्ज मिला है। इन संस्थानों से राज्य सरकारों को कर्ज केन्द्र की गारंटी पर ही मिलता है लेकिन उसकी भरपाई तो राज्य सरकार को ही करनी होती है। कैग रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश को कर्ज चुकाने के लिये भी कर्ज लेना पड़ रहा है। 2019 में विश्व बैंक ने प्रदेश की Debt Management Performance Assessment पर एक 42 पन्नों की रिपोर्ट जारी की है। भारत सरकार का वित्त विभाग भी इस संद्धर्भ में 2020 में चेतावनी जारी कर चुका है। इस परिदृश्य में प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र आना और उसमें इन सवालों का जवाब होना सरकार से अपेक्षा रहेगी।