इस समय देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जो शायद भारत में पहली बार देखने को मिल रहा है। देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब केन्द्र सरकार ने राज्यों को जीएसटी में उनका हिस्सा दे पाने में असमर्थता जाहिर कर दी है। वित्तमन्त्री सीता रमण ने इस आर्थिक संकट को ईश्वर की देन कह दिया है। वित्त हर गतिविधि का मूल होता है और जब यही गड़बड़ा जाये तो तुरन्त प्रभाव से राष्ट्रीयहित में संसद को भंग करके एक राष्ट्रीय सरकार के गठन की आवश्यकता हो जाती है लेकिन इस समय ऐसा नही किया जा रहा है बल्कि संकट के इस दौर में विपक्ष की सरकारों को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। बल्कि विपक्ष मुक्त भारत का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे हालात में एक सशक्त और स्पष्ट विपक्ष की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है क्योंकि सत्तापक्ष अपनी नीतियों की समीक्षा के लिये तैयार नही है। वह आज भी अपनी गलतीयों के लिये नेहरू-गांधी काल की नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है। मीडिया भी सरकार से सवाल पूछने की बजाये विपक्ष को कमज़ोर करने के काम में लग गया है और इसीलिये उसे गोदी मीडिया की संज्ञा दी जा रही है। उच्च न्यायपालिका का सरोकार भी आम आदमी नही रह गया है। मंहगाई और बेरोज़गारी दोनों का संकट एक साथ झेल रहे आम आदमी की सुध लेने वाला कोई नही रह गया है। यदि कोई सरकार से सवाल पूछने का साहस दिखाता है तो उसे तुरन्त देशद्रोह करार देकर उसके पीछे जांच एजैन्सीयों को लगा दिया जाता है। 



वित्त मंत्री सीता रमण ने इस स्थिति को ईश्वर की देन कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात संबोधन में इसका जिक्र तक नही किया। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर बनने के लिये खिलौने बनानेे और कुत्ते पालने का नया दर्शन लोगों के सामने रख दिया है। खिलौने बनाने और कुत्ते पालने से जीडीपी को स्थिरता तक पहुंचने में ही कितने दशक लगेंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के इन वक्तव्यों से समझा जा सकता है कि वह इस समर्थता के प्रति कितने गंभीर और ईमानदार हैं। क्योंकि इस तरह की धारणाओं का सीधा अर्थ है कि आम आदमी को इस संकट के समय उसके अपने ही सहारे छोड़ दिया गया है। स्पष्ट है कि जब किसी चीज़ को Act of God कह दिया जाता है कि उसका अर्थ कि प्रबन्धन ने यह मान लिया है कि वह इसमे कुछ नही कर सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के वक्तव्यों के बाद सरकार और संगठन में से किसी ने भी आगे कुछ नही कहा है। इसका सीधा अर्थ है कि पूरी सरकार और संगठन का यही मत है।
जब किसी परिवार पर आर्थिक संकट आता है तो सबसे पहले वह अपने अनावश्यक खर्चों को कम करता है। यही स्थिति सरकार की होती है वह अपने खर्चे कम करती हैं लेकिन मोदी सरकार इस स्थापित नियम से उल्ट चल रही है। उसका खर्च पहले से 22% बढ़ा हुआ है। प्रधानमंत्री के प्रचार पर ही सरकारी कोष से दो लाख प्रति मिनट खर्च किया जा रहा है। इस समय आरबीआई से लेकर नीचे तक सारी बैंकिंग व्यवस्था संकट और सवालों में है। कर्ज की वसूली ब्याज का स्थगन और एनपीए तक बैंकिंग से जुड़े सारे महत्वपूर्ण मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं। बैंकों को प्राईवेट सैक्टर को देने का फैसला कभी भी घोषित हो सकता है। बैंक में आम आदमी का पैसा कब तक और कितना सुरिक्षत रहेगा इसको लेकर भी स्थिति स्पष्ट नही है। आम आदमी के जमा पर 2014 से लगातार ब्याज कम होता आ रहा है। इस बार तो वित्त मन्त्री ने बजट भाषण में ही कह दिया था कि आम आदमी बैंक में पैसा रखने की बजाये उसे निवेश में लगाये। नोटबंदी से आर्थिक व्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उससे आज तक देश संभल नही पाया है। रियल एस्टेट और आटोमोबाईल जैसे क्षेत्रों को आर्थिक पैकेज देने के बाद भी उनकी हालत में सुधार नही हो पाया है और यह कोरोना से पहले ही घट चुका है। इसलिये गिरती जीडीपी के लिये ईश्वर पर जिम्मेदारी डालने के तर्क को स्वीकार नही किया जा सकता। फिर इसी वातावरण में अंबानी और अदानी की संपतियां उतनी ही बढ़ी हैं जितना देश का जीडीपी गिरा है। आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को प्राईवेट सैक्टर के हवाले करने से आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास और घातक सिद्ध होगा। आने वाले दिनों में देश की गिरती जीडीपी और सरकार की आर्थिक नीतियां इक बड़ी बसह का मुद्दा बनेगी यह तय है।


इसी विरोध का परिणाम है कि सर्वोच्च न्यायालय प्रशान्त भूषण को वह सवाल उठाने के लिये सत्ता दे रहा है जो सवाल इसी सर्वोच्च न्यायालय के चार कार्यरत न्यायधीश वाकायदा एक पत्र के माध्यम से प्रैस के सामने रख चुके हैं। प्रशान्त भूषण को सज़ा देने के लिये स्थापित न्याययिक प्रक्रिया को भी नज़रअन्दाजा किया गया है। इसी तरह की स्थिति अदानी को दिये जा रहे त्रिवेन्द्रम एयरपोर्ट की है। केरल सरकार इस एयर पोर्ट को स्वयं चलाना चाहती है। इसके लिये शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की गयी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे केरल उच्च न्यायालय में उठाया जाये। केरल सरकार उच्च न्यायालय में आ गयी और उच्च न्यायालय ने इसे यह कह कर रद्द कर दिया कि इसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जायें। केरल सरकार फिर सर्वोच्च न्यायालय जा रही थी कि मोदी सरकार ने इस एयरपोर्ट को अदानी के हवाले करने का फैसला सुना दिया। क्या इस तरह की कारवाई से अदालत पर विश्वास कायम रह सकेगा। केन्द्र सरकार किस तरह की जल्दबाजी मे काम कर रही है इसका एक उदाहरण अपराध दण्ड संहिता में संशोधन करने के लिये गठित की गयी कमेटी में भी सामने आया है। इस कमेटी को संशोधन का यह काम छः माह में पूरा करना है और आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य तीनों अधिनियमों में संशोधन किया जाना है। देश के पहले लाॅ कमीशन ने ऐसे संशोधन के चार चरणों की प्रक्रिया तय की हुई है। लेकिन अब गठित की गयी कमेटी पहले दो चरणों को नजरअन्दाज करके सीधे तीसरे चरण से अपना काम शुरू कर रही है। इस पर सौ से अधिक विषय विशेषज्ञों ने पत्र लिख कर इसका विरोध किया है और इस कमेटी को तुरन्त प्रभाव से भंग करने की मांग की है।
इस तरह पूरे देश के अन्दर एक ऐसा वातावरण बनता जा रहा है जहां शीर्ष संस्थान विश्सनीयता के संकट में आ खड़े हुए है। कोरोना संकट के कारण आज देश की अर्थव्यवस्था एक संकट के मोड पर आ खड़ी हुई है। करोड़ों लोग रोजगार के संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे संकट काल में सरकार का अपने उपक्रमों को निजिक्षेत्र को सौंपना नीयत और नीति दोनों पर गंभीर आक्षेप लगने शुरू हो गये हैं। क्योंकि एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में हर हाथ को काम सरकारी उपक्रमों को निजिक्षेत्र को सौंपने से नही दिया जा सकता है। क्योंकि निजिक्षेत्र व्यक्तिगत स्तर पर मुनाफा कमाने की अवधारणा पर चलता है। इसके लिये वह हाथ को मशीन से हटाने की नीति पर चलता है और कामगारों की छटनी से शुरू करता है। आज सरकार भी उसी नीति पर चलने का प्रयास कर रही है। इसीलिये पचास वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों को काम की समीक्षा के मानदण्ड से हटाने पर विचार कर रही है। भाजपा ने 1990 में ही यह जाहिर कर दिया था जब शान्ता कुमार हिमाचल के मुख्यमन्त्री थे। तब निजिकरण क्यों के नाम से एक वक्तव्य दस्तावेज जारी किया गया था। इस वक्तव्य में यह आरोप लगाया गया था कि सरकारी कर्मचारी काम चोर और भ्रष्ट हैं। इसी आरोप के सहारे प्रदेश बिजली बोर्ड से बसपा परियोजना लेकर जेपी उद्योग समूह को दी गयी थी तय हुआ था कि बिजली बोर्ड के इस परियोजना पर हुए निवेश को जेपी उ़द्योग सरकार को ब्याज सहित वापिस करेगा लेकिन आज तक कैग की टिप्पणीयों के बावजूद एक पैसा तक वापिस नही हुआ है। आज प्रदेश की बिजली नीति और उद्योग नीति के कारण प्रदेश कर्ज के चक्रव्यूह में फंस चुका है। इसी तरह प्रदेश प्रमुख पर्यटक स्थल वाईल्डफलावर हाल दिया गया था जिससे प्रदेश को आज तक कोई लाभ नही मिला है। निजिकरण की देशभर में यही स्थिति है कर्मचारियों पर उस भ्रष्टता का आरोप लगाकर निजिकरण का आधार तैयार किया जाता है जिसकी उन्हे कभी सज़ा नही दी गयी है। इसी कारण से यह सवाल भी नही उठने दिया गया कि यदि सरकार एक उपक्रम नही चला सकती है तो देश कैसे चलायेगी।






इस समय देश कोरोना संकट के दौर से गुजर रहा है। तीन लाकडाऊन झेलने के बाद अब अनलाक तीन चल रहा है। लेकिन अनलाक तीन में भी अभी तक बाज़ार की आर्थिक गतिविधियां 30% भी बहाल नही हो पायी हैं। 30% आर्थिक गतिविधियों का अर्थ है कि सरकार का राजस्व संग्रहण भी अभी तक 40% नही हो पाया है। राजस्व की इसी कमी के चलते केन्द्र सरकार ने हिमाचल जैसे राज्य को कह दिया है कि वह पहली सितम्बर से कोरोना के टैस्टों पर होने वाले खर्च को स्वयं उठाये। इसी संकट के कारण एपीएल परिवारों की राशन की सब्सिडी बन्द कर दी गयी है और बीपीएल की मात्रा कम कर दी है। करोड़ों लोग बेरोजगार होकर बैठ गये हैं। हिमाचल में ही इससे पीड़ित आत्महत्या करने लग पड़े हैं। राज्य के डीजीपी ने इस पर गंभीर चिन्ता व्यक्त की है। पूरा देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है। लेकिन राम मन्दिर के शिलान्यास को जिस तरह से देशभर में एक पर्व के रूप में मनाते हुए भाजपा-संघ द्वारा मिठाईयां बांटी गयी है उससे सत्तारूढ़दल की मानवीय संवेदनाओं और उसकी प्राथमिकताओं का अन्दाजा लगाया जा सकता है। विश्वभर में इस शिलान्यास के बाद धार्मिक राष्ट्रवाद को लेकर एक बहस छिड़ गयी है। इस शिलान्यास के बाद भी देश के धार्मिक स्थलों पर चल रही पाबन्दी नही हठ पायी है। इसको लेकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम कितने प्रसन्न हो रहे होंगे इसका भी आन्दाज लगाया जा सकता है। शिलान्यास को लेकर जब भी कोई निष्पक्ष आकलन होगा तब इन सवालों को नजरअन्दाज कर पाना कठिन होगा। क्योंकि आर्थिक संकट में इस समारोह पर हुआ यह करोड़ों का खर्च यह भूखे पेट की आंखों में सवाल बनकर तो खड़ा रहेगा ही।
यह शिलान्यास मर्यादा पुरूषोत्तम राम के मन्दिर का हो रहा था। कोरोना काल में हुए इस शिलान्यास के पर्व पर बहुत लोग और कई बड़े नेता कोरोना को लेकर चल रही पाबन्दियों के कारण नहीं आ पाये। क्योंकि कोरोना निर्देशों के उल्लघंन पर सजा और जुर्माने का प्रावधान घोषित है। बहुत लोगों को इसके लिये जुर्माना लगा भी है। लेकिन शिलान्यास समारोह में जो बाबा रामदेव जैसे लोग शामिल थे वह कोरोना निर्देशों का खुला उल्लघंन कर रहे थे। उन्हें कोई इसके लिये इंगित भी नहीं कर रहा था। गृहमन्त्री अमितशाह तीन अगस्त को कोरोना पाजिटिव पाये गये और वह उपचार के लिये मेदान्ता में भर्ती भी हुए। 29 जुलाई को वह प्रधानमन्त्री के साथ मन्त्री परिषद की बैठक में शामिल थे। नियमों के अनुसार उस बैठक में शामिल हर व्यक्ति को संगरोध में होना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नही है। देशभर में शिलान्यास के बाद जो जश्न मनाया गया है उसमें कोरोना निर्देशों का खुला उल्लंघन हुआ है। इस जश्न के आगे सारे नियम और निर्देश बौने साबित हुए हैं। समारोह में वह पोस्टर भी पूरा ध्यान आकर्षित कर रहा था जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत को राज्यपाल और मुख्यमन्त्री से ऊपर स्थान दिया गया था। जबकि मोहन भागवत कोई जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नही है। बल्कि उनका संघ तो एक पंजीकृत संस्था भी नही है। यही नहीं एक चित्र में तो भगवान राम को प्रधानमन्त्री अंगूली से पकड़कर मन्दिर की ओर ले जा रहे हैं यह दिखाया गया है कि इस तरह पूरे समारोह में प्रधानमन्त्री और संघ /भाजपा को ही महिमा मंडित करने का प्रयास रहा है। आज कोरोना के कारण आम आदमी इन मर्यादाओं के हनन पर खुल कर नहीं बोल पा रहा है। लेकिन इस समारोह से यह तो सामने आ ही गया है कि कोरोना को लेकर लगाई गयी पाबन्दियां केवल आम आदमी के लिये ही हैं। लेकिन यह तय है कि जिस दिन यह पाबन्दियां हटेगी उस दिन यही समारोह ऐसे सवाल लेकर आयेगा जिनका जवाब देना कठिन होगा क्योंकि मर्यादाओं का जो हनन यहां हुआ है वह अपना असर अवश्य दिखायेगा।