तीन साल बाद कांग्रेस का आत्ममंथन या बढ़ती बेचैनी?
- Details
-
Created on Wednesday, 08 July 2026 13:01
-
Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने संगठन की आम सभा के जरिए वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का बिगुल तो बजा दिया, लेकिन बैठक के भीतर और बाहर जो घटनाक्रम सामने आये, उन्होंने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या कांग्रेस वास्तव में संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल का दावा कर सकती है? तीन साल के कार्यकाल को उपलब्धियों से भरा बताने वाली कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार की कार्यशैली, संगठन की नाराजगी और जनता के बदलते मूड को लेकर दिखाई दे रही है।
बैठक में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू, प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, मंत्रिमंडल के सदस्य, सांसद, विधायक तथा जिला और ब्लॉक कांग्रेस के पदाधिकारी मौजूद रहे। मंच से सरकार की तीन वर्षों की उपलब्धियों को गिनाया गया और कार्यकर्ताओं से इन्हें घर-घर पहुंचाने का आहवान किया गया। लेकिन इसी बैठक ने कई ऐसे सवाल भी छोड़ दिए जिनका जवाब कांग्रेस नेतृत्व को देना होगा।
बैठक में कुछ मंत्री और कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी मौजूद नहीं थे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि अनुपस्थित रहने वालों को नोटिस जारी किए जाएंगे और जरूरत पड़ी तो कारवाई भी होगी। यह बयान केवल अनुशासन का संदेश नहीं था, बल्कि यह भी दिखाता है कि संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। यदि पार्टी को अपने ही नेताओं को बैठक में लाने के लिए नोटिस की चेतावनी देनी पड़े तो यह संगठनात्मक मजबूती नहीं, बल्कि अंदरूनी असहजता का संकेत माना जा सकता है।
बैठक में बार-बार कहा गया कि सरकार और संगठन मिलकर काम कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों की घटनाएं इस दावे पर सवाल खड़े करती हैं। कई कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता लगातार यह शिकायत करते रहे हैं कि सरकार के फैसलों में संगठन की भागीदारी सीमित है। दूसरी ओर संगठन को भी कई बार सरकार के निर्णयों की जानकारी बाद में मिलती है। ऐसे में ‘बेहतर तालमेल’ का दावा राजनीतिक संदेश तो हो सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई देती है।
कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा अनकहा मुद्दा आज भी स्व. राजा वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत है। प्रदेश के अनेक कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार बनने के बाद वीरभद्र सिंह के कई पुराने समर्थकों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। नियुक्तियों से लेकर संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व तक, यह असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा है।
निगम और बोर्डों में नियुक्तियों को लेकर भी विवाद हुए। हाल ही में निगम भंडारी की ताजपोशी को लेकर कांग्रेस के भीतर सार्वजनिक बयानबाजी हुई। एक मंत्री द्वारा लगातार आपत्ति जताने के बाद प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल को यह कहना पड़ा कि वह संबंधित पक्षों से बात करने की कोशिश कर रही हैं। यह बयान बताता है कि मामला केवल व्यक्तिगत असहमति का नहीं, बल्कि संगठनात्मक समन्वय की चुनौती का भी है।
कांग्रेस सरकार लगातार प्राकृतिक खेती, दुग्ध खरीद, स्वास्थ्य, शिक्षा, हरित ऊर्जा, पर्यटन और वित्तीय सुधारों को अपनी उपलब्धि बता रही है। लेकिन प्रदेश में जनता का बड़ा वर्ग आज भी महंगाई, बेरोजगारी, कर्मचारियों की मांगें, विकास कार्यों की धीमी गति, सड़क, स्वास्थ्य और स्थानीय समस्याओं को लेकर सवाल पूछ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की रफ्तार और शहरी क्षेत्रों में रोजगार तथा बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष की चर्चा लगातार सुनाई देती है। यही कारण है कि सरकार की उपलब्धियों का प्रचार जितना मजबूत दिखता है, उतना ही चुनौतीपूर्ण उसका जनस्वीकार भी दिखाई देता है।
हाल के नगर निगम और नगर निकाय चुनावों के परिणामों को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को अपेक्षित बढ़त नहीं मिल सकी। कई शहरी क्षेत्रों में पार्टी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। स्थानीय स्तर पर संगठन की कमजोरी और गुटबाजी की चर्चा भी चुनाव परिणामों के बाद तेज हुई।
यही वजह है कि अब 2027 की तैयारी की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सबसे पहले अपने संगठन को मजबूत करने की बात कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ समय से मंत्रिमंडल विस्तार और कुछ मंत्रियों के विभाग बदलने अथवा फेरबदल की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। इन अटकलों ने भी कांग्रेस के भीतर राजनीतिक हलचल जरूर बढ़ाई है। जब सरकार के भीतर संभावित बदलावों की चर्चा सार्वजनिक होने लगे तो उसका असर संगठन और प्रशासन दोनों पर पड़ता है। यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व लगातार एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रहा है।
बैठक के दौरान पत्रकारों के साथ कथित अभद्र व्यवहार की खबरें और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी है। यदि किसी राजनीतिक दल के कार्यालय में मीडिया के साथ ऐसा व्यवहार होता है तो यह पार्टी की सार्वजनिक छवि पर असर डालता है।
हालांकि इस मामले में आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है, लेकिन विपक्ष को सरकार और संगठन दोनों पर सवाल उठाने का अवसर जरूर मिल गया है।
कांग्रेस ने इस बैठक में कार्यकर्ताओं को सरकार की उपलब्धियां घर-घर पहुंचाने का संदेश दिया। लेकिन केवल उपलब्धियों का प्रचार चुनाव नहीं जिताता। जनता अपने रोजमर्रा के अनुभव के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करती है।
यदि संगठन और सरकार के बीच तालमेल पर सवाल बने रहते हैं, यदि गुटबाजी समाप्त नहीं होती, यदि नियुक्तियों और राजनीतिक संतुलन को लेकर विवाद जारी रहते हैं और यदि जनता की स्थानीय समस्याओं का समाधान अपेक्षित गति से नहीं होता, तो 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।
यह भी सच है कि सरकार के पास अभी चुनाव से पहले पर्याप्त समय है। यदि आने वाले डेढ़ वर्ष में सरकार प्रशासनिक प्रदर्शन, विकास कार्यों और संगठनात्मक एकजुटता पर प्रभावी काम करती है तो राजनीतिक तस्वीर बदल भी सकती है।
शिमला के राजीव गांधी भवन की बैठक का घोषित उद्देश्य संगठन को मजबूत करना और चुनावी तैयारी शुरू करना था। लेकिन बैठक ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार की कार्यशैली, संगठन की अपेक्षाएं और जनता की बढ़ती उम्मीदें हैं।
तीन साल बाद कांग्रेस अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा जनता के सामने रख रही है, लेकिन जनता अब केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से सरकार का मूल्यांकन कर रही है। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि कांग्रेस संगठन की यह बैठक 2027 की जीत की रणनीति साबित होती है या फिर भीतर बढ़ती बेचैनी को संभालने की एक राजनीतिक कवायद।
Add comment