Sunday, 21 June 2026
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सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के परिदृश्य में बिन्दल मामले पर उभरे संदेह

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ डेढ़ दशक से चल रहे अपराधिक मामले को वापिस लेने के सीआरपीसी धारा 321 के तहत अदालत में आवेदन दायर किया है। इस आवेदन पर 29 सितम्बर को विचार होने की संभावना है। इस मामले में यह आवेदन उस समय आया है जबकि यह मामला फैसले के कगार पर पहुंचा हुआ है। क्योंकि इसमें अभियोजन पक्ष की सारी गवाहीयां हो चुकी हैं। केवल नामजद अभियुक्तां का 313 में अपना ब्यान होना ही बाकि बचा है। इस ब्यान के बाद बहस और फिर फैसले की स्टेज आयेगी। कुल मिलाकर अदालत का इसमें चार/पांच दिन का और समय लगेगा। जबकि अब तक महीनों के हिसाब से इसमें अदालत का समय लग चुका है। ऐसे में इस स्टेज पर यह तर्क आना कि इस मामले को चलाये रखने से अदालत का समय ही नष्ट होगा कोई ज्यादा व्यवहारिक नही लगता।
इस मामले में बिन्दल के साथ दो दर्जन से अधिक और अभियुक्त भी हैं। लेकिन सरकार केवल बिन्दल का ही मामला वापिस ले रही है अन्य अभियुक्तों का नही। इसकों लेकर भी सरकार की मंशा पर सवाल उठने लग पडे़ हैं। क्योंकि यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार यह मानती है कि अन्य अभियुक्त बिन्दल के बिना भी यह अपराध कर सकते थे। वैसे तो कानून के जानकारों के मुताबिक यदि बिन्दल का मामला वापिस हो जाता है तो अन्य अभियुक्तों के खिलाफ भी मामला स्वतः ही कमजोर हो जायेगा। क्योंकि इसमें बिन्दल की भूमिका ज्यादा मानी जा रही है।
ऐसे में अब अदालत पर लोगों की निगाहें लगी है कि क्या अदालत मामला वापिस लेने के आग्रह को स्वीकार कर लेती है या नही। क्योंकि प्रदेश उच्च न्यायालय में जुलाई 2016 में कैप्टन राम सिंह के मामले में निचली अदालत द्वारा धारा 321 में आये आवेदन को स्वीकार करने के फैसले को पलट चुकी है।
अभी 13 सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय की प्रधान न्यायधीश, दीपक मिश्रा और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़ की पीठ का फैसला आया है। इसमें 321 पर विस्तार से चर्चा करने के बाद अदालत ने यह कहा है कि  We are compelled to recapitulate that there are frivolous litigations but that does not mean that there are no innocent sufferers who eagerly wait for justice to be done. That apart, certain criminal offences destroy the social fabric. Every citizen gets involved in a way to respond to it; and that is why the power is conferred on the Public Prosecutor and the real duty is cast on him/her. He/she has to act with responsibility. He/she is not to be totally guided by the instructions of the Government but is required to assist the Court; and the Court is duty bound to see the precedents and pass appropriate orders.

In the case at hand, as the aforestated exercise has not been done, we are compelled to set aside the order passed by the High Court and that of the learned Chief Judicial Magistrate and remit the matter to the file of the Chief Judicial Magistrate to reconsider the application in accordance with law and we so direct.
The appeal is, accordingly, allowed. सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के परिदृश्य में यह महत्वपूर्ण होगा कि अदालत 321 में आये आवेदन को स्वीकार करती है या नही। लेकिन सरकार के इस फैसले से भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के दावों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह अवश्य लग जाता है।

धारा 118 की जांच में क्या सचिव स्तर पर दी गयी ई सी अनुमतियों की जांच भी होगी

शिमला/शैल। पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक सानन ने मुख्यमन्त्री को पत्र लिखकर शिकायत की है कि प्रदेश मे 2013 से लेकर 2017 तक मुजारियत एवम् भू सुधार अधिनियम की धारा 118 का दुरूपयोग हुआ है। इस दुरूपयोग के कुछ मामले उठाते हुए यह मांग की है कि पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह, पूर्व मुख्य सचिव वीसी फारखा और तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्य तरूण श्रीधर के खिलाफ तुरन्त मामला दर्ज करके जांच की जाये। सानन ने यह भी कहा है कि यदि सरकार जांच नहीं करवाती है तो वह इसके लिये अदालत का दरवाजा भी खटखटायेंगे। ऐसा पहली बार देखने को मिला है कि अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे अधिकारी ने इतनी गंभीरता दिखाते हुए ऐसी कोई शिकायत की है। सानन इस समय जयराम सरकार द्वारा गठित कुछ कमेटीयों के सदस्य भी हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार निश्चित रूप से उनकी शिकायत पर जांच करवायेगी और दोषीयों के खिलाफ कारवाई करेगी।

सानन की शिकायत के साथ ही जय राम सरकार ने 118 के दुरूपयोग की एक शिकायत पर पूर्व मुख्य सचिव राज्य चुनाव आयोग के अध्यक्ष पी मित्रा के खिलाफ 2010 में घटे एक मामले की पुनः जांच शुरू कर दी है जबकि इस मामले में विजिलैन्स ने एक समय क्लोज़र रिपोर्ट तक दायर कर दी थी। अब इस मामले में कुछ नये तथ्य सामने आने का दावा करके विजिलैन्स ने अदालत से क्लोजर रिपोर्ट वापिस लेकर नये सिरे से यह जांच शुरू की है। आरोप है कि उस दौरान धारा 118 के तहत भू खरीद की अनुमतियां देने के मामलां में पैसों का लेनदेन होता था। जांच के बाद यह आरोप कितना सही साबित होता है यह तो समय ही बतायेगा। लेकिन विजिलैन्स के सूत्रों के मुताबिक पैसों का लेनदेन शिमला के संकटमोचन के पास एक होटल में हुआ था। वहां से किसी के माध्यम से यह पैसा चण्डीगढ़ में किसी को भेजा गया था। शिमला से किसके माध्यम से यह पैसा भेजा गया उसका नाम पता विजिलैन्स को मालूम नही है। चण्डीगढ़ में जिसको दिया गया उसका भी नाम मालूम नही है। एक लाल गाड़ी में बैठे व्यक्ति को पैसा दिया गया। लेकिन इस गाड़ी का नम्बर तक विजिलैन्स को मालूम नही है लेकिन फिर भी विजिलैन्स पूरी गंभीरता से यह जांच कर रही है।
विजिलैन्स इस मामले के माध्यम से उस दौरान धारा 118 के तहत दी गयी अनुमतियों के मामलों को खंगाल रही है। ऐसे में उसी दौरान घटे आप्टिमा कंन्सट्रक्शन का मामला भी सामने आ जाता है। क्योंकि जब यह मामला प्रदेश विधानसभा में मुकेश अग्निहोत्री ने उठाया था तब तत्कालीन मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल ने इस मामले की जांच करवाने का आश्वासन सदन में दिया था। लेकिन यह जांच आज तक नहीं हो पायी है। स्मरणीय है कि आप्टिमा कन्सट्रक्शन ने कसौली के एक गांव बनानी में 108 बीघे ज़मीन लेकर एक कॉलोनी का निर्माण किया था। लेकिन गांव के लोगों ने ग्रामीण अधिकार सुरक्षा संघर्ष समिति कसौली का गठन करके इसका विरोध किया था। ग्रामीणों का आरोप था कि इसके लिये हजारां पेड़ काट दिये गये हैं। इसलिये वन विभाग के एनओसी को लेकर एतराज उठाया गया था। आरोप था कि इसके लिये डीपीएफ के बिना उचित अनुमति के सड़क निकाल दी गयी है। इसी के साथ पानी को लेकर भी यह आरोप था इन्हें पानी भी गांव के स्त्रोत से ही दे दिया गया जबकि अलग स्त्रोत होना चाहिये था। इससे भी गंभीर आरोप यह था कि ग्रामीणों की अनुमति के बिना ही उनकी जमीन ले ली गयी। जबरदस्ती जमीन लेने का आरोप एक महिला रीना देवी ने वाकायदा शपथपत्र देकर लगाया था। रीना देवी का आरोप था कि उसकी पन्द्रह बीघे जमीन बिना उसकी अनुमति के ले ली गयी है जबकि वह स्वयं इसके बाद भूमिहीन हो जाती है। रीना देवी ने शपथपत्र के साथ यह शिकायत तत्कालीन मंत्री महेन्द्र सिहं ठाकुर को दी थी।
उस समय यह आरोप लगाया था कि इस कॉलोनी के लिये ई सी मन्त्री को सूचित किये बिना ही सचिव के स्तर पर दे दिया गया था। यही नही सचिव ने अपने ही स्तर पर आधा दर्जन बिल्डरज को ई सी दे दिये थे। जबकि वह इसके लिये सक्षम नही थे। सूत्रों के मुताबिक यह ई सी देते हुए वह फाईल पर लिख देते थे कि मुख्यमन्त्री ने ऐसा चाहा है। स्मरणीय है कि 2014 में यह मामला बहुत चर्चित हो गया था। गौरतलब है कि उस समय संबंधित विभाग के सचिव यही दीपक सानन थे जिनकी शिकायत पर आज जयराम जांच करवा रहे हैं और उन्हे कुछ कमेटीयों का सरकार ने सदस्य बना दिया है। लेकिन उस दौरान टीसीपी के मंत्री महेन्द्र सिंह ठाकुर के साथ विभाग के सचिव दीपक सानन की बिल्कुल नही बन रही थी। बल्कि महेन्द्र सिंह ने इसकी शिकायत धूमल से भी कर दी थी क्योंकि विधानसभा सत्र में भी सानन एक बार भी अपने मंत्रा से नही मिले थे। ऐसे मे जब उस दौरान के 118 के मामलों की जांच की ही जा रही है तो इस प्रकरण में उस महिला रीना देवी की शिकायत की जांच भी हो जानी चाहिये जो उसने उस समय 13.12.2011 को वाकायदा शपथपत्र लगाकर मंत्री को दी थी। इस महिला की शिकायत है कि चर्चा विधानसभा तक में हुई थी लेकिन आवश्वासन के वाबजूद यह जांच हुई नही है।
इस परिदृश्य में यह गौरतलब है कि यदि जयराम सरकार और उसकी विजिलैन्स सही में बिना किसी निहित राजनीतिक स्वार्थ के धारा 118 के दुरूपयोग के मामलों की ईमानदारी से जांच करना चाहती है तो उसे इस संद्धर्भ में आज तक गठित हुए तीनों जांच आयोगों की रिपोर्ट पर कारवाई करनी चाहिये। स्मरणीय है कि इस बारे में सबसे पहले 1993 में वीरभद्र सिंह ने एस एस सिद्धु की अध्यक्षता में एक जांच बिठाई थी। इसके बाद सेवानिवृत जस्टिस रूप सिंह ठाकुर की अध्यक्षता में दूसरी बार जांच बैठी। तीसरी बार जस्टिस डीपी सूद ने इस संद्धर्भ में जांच की। इन तीनों कमेटीयों में हजारों मामले 118 के दुरूपयोग के सामने आये हैं। कांगड़ा के पालमपुर में 464 बीघे का चाय बागीचा दिल्ली निवास फैजमुर्तजा अली द्वारा खरीदा जाना चर्चा का विषय रहा है। यही नही जुलाई 2007 से 29 दिसम्बर 2007 के बीच 118 की 97 अनुमतियां दी गयी। इनमें अनुमति पाने वाले तीन आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं। इन सारी अनुमतियों में 118 के प्रावधानों की उल्लंघना के गंभीर आरोप हैं। जस्टिस डीपी सूद आयोग ने 42 बिल्डरों की जमीनें जब्त करने की सिफारिश की थी। एक बिल्डर अग्रवाल पर यह आरोप है कि उसने स्त्ग्ट में केवल 336 पेड़ दिखाये हैं जबकि हजारों की संख्या में पेड़ काटे गये है। सूद आयोग ने बिल्डरों को नोटिस भेजे थे लेकिन यह लोग एक बार भी आयोग के सामने न तो पेश हुए और न ही नोटिस का जवाब तक दिया है। इसलिये जब जयराम सरकार सानन की शिकायत पर विजिलैन्स से जांच करवा रही है तब सरकार की ईमानदारी और निष्पक्षता का यह तकाजा रहेगा कि सरकार ऑप्टिमा प्रकरण तथा करीब आधा दर्जन बिल्डरों को सचिव स्तर पर ई सी जारी किये जाने की भी जांच करवाये। सानन को दी गई स्टडीलीव और उसके द्वारा ली गयी टी डी पर भी सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि सूत्रों के मुताबिक इन मामलों की शिकायत भी विजिलैन्स के पास पंहुच चुकी है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मनाली के होटल Citrus पर लगाया NGT ने 20 लाख का जुर्माना

जिम्मेदार तन्त्र के खिलाफ मुख्यसचिव को हुये कारवाई के निर्देश
मंत्री महेन्द सिंह भी पाये गये अवैध निमार्ण के दोषी

शिमला/शैल। एन जी टी ने 18-12-17 को पारित एक आदेश में प्रदेश के मुख्य सचिव को पर्यटन, टी सी पी और प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के कुछ अधिकारियों/कर्मचारियों के खिलाफ कारवाई करने के निर्देश दिये हैं। लेकिन अदालत के इन आदेशों की अनुपालना अब तक नहीं हो पायी है। एन जी टी के आदेश में कहा गया है किWe direct the Chief Secretary of State of Himachal Pradesh to take appropriate disciplinary action in regard to dereliction of duty and for not maintaining the records and taking action in accordance with law against all the employees, officers and officials who have dealt with this file whether they are in service or have retired and providing undue advantage to Noticees. In the case of retired officers/officials, the action would be taken for reduction in pension as per rules. The employees may be of the Department of Town and Country Planning, the Government of Himachal Pradesh, Department of Tourism, State Pollution Control Board or any other agency of the Government as may be deemed proper by the department.
ऐसे ही आदेश इससे पहले कसौली के मामले में हो रखें हैं और उन पर भी आज तक कोई कारवाई नही हुई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर मुख्य सचिव अदालत के आदेशों को किसी के दबाव में या स्वंय अपने ही स्तर पर किसी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे आम आदमी में तो यही धारणा है कि यह संभवतः राजनीतिक दबाव के चलते हो रहा है। क्योंकि ऐसा संभव नही हो सकता कि अदालत के आदेशों की जानकारी प्रदेश के मुख्य मंत्रा को न हो।
एन जी टी के 18-12-17 को आदेश उस याचिका पर आये हैं जो मण्डी की सरकाघाट तहसील के गांव पारछू के निवासी रमेश चन्द ने दायर की है। इस याचिका में प्रदेश सरकार, पर्यटन, टी सी पी, पी डब्लयू डी, प्रदूषण नियन्त्राण बोर्ड, वन विभाग प्रोमिला देवी पत्नी महेन्द्र सिंह ठाकुर और रजत ठाकुर पुत्रा महेन्द्र सिंह ठाकुर को प्रतिवादी बनाया गया है। महेन्द्र सिंह ठाकुर इस समय प्रदेश के वरिष्ठ मंत्रा हैं। इनका मनाली में मनाली वैली के नाम से एक होटल है। इस होटल में भी याचिकाकर्ता ने अवैध निर्माण होने का आरोप लगाया है। इन आरोपों पर जब एन जी टी में पेशी लगी तब महेन्द्र सिंह इसमें व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। उनके पेश होने पर अदालत ने यह कहा है कि Initially the case related to the hotel constructed by Shri Mahinder Singh Thakur, owner of the Hotel Manali Valley. However, on a subsequent date Mr. Thakur appeared and made a statement that he would demolish the unauthorized construction as well as restore the Government land occupied and take all anti-pollution measures to the satisfaction of the concerned authority. The team headed by S.D.M. ensure compliance and in view of the statement made by Mr. Thakur which was given effect to no further orders were called for and not passed.

महेन्द्र सिह द्वारा अदालत को दिये गये इस आश्वासन के बाद इस होटल में हुआ कुछ अवै़ध निर्माण गिराया गया है। लेकिन जितना अवैध निर्माण चिन्हित हुआ था वह सारा ही गिरा दिया गया है या नहीं इसको लेकर जिला पर्यटन अधिकारी कुल्लु को कोई पूरी जानकारी नही है।
रमेश चन्द ने जो याचिका दायर की थी उसकी सुनवाई के दौरान एन जी टी ने 27-10-2017 को इस याचिका के मुद्दों के अतिरिक्त अन्य बिन्दुओं पर भी प्रदेश सरकार, टी सी पी और प्रदूषण नियन्त्राण बोर्ड से जवाब मांगा था। यह बिन्दु थे

1. How many hotels are operating in the city of Kullu, Planning Area, particularly in and around the Manali.
2. Out of them how many hotels have their own STP and other anti-pollution devices installed and how many are operating without obtaining consent of the Himachal Pradesh Pollution Control Board.
3. How many hotels out of them are located or constructed on the forest land.
4. How many cases of unauthorized construction which includes the construction which has been raised without obtaining sanction of the plan, NOC ordeviation or variations by addition of floors by construction of additional rooms beyond the sanction plan.
5. What action the State Government and the Pollution Control Board has taken in that behalf.
6. We direct Town and Country Planning Department and the State of Himachal Pradesh to submit whether any study or data have ever been prepared for the Kullu Planning Area with particularly Manali and its surrounding areas as to its carrying capacity, kind of development that should be permitted and keeping in view the fact that this area falls under Seismic Zone 4 and 5.

होटल मनाली वैली के साथ ही एक होटल सीट्रस का मुद्दा भी एन जी टी के सामने आया है। इस होटल में प्रारम्भ में 37 कमरों के लिये अनुमति ली गयी थी। लेकिन यहां पर 37 से 112 कमरे बन गये। इस बढ़े हुए निर्माण की कब किसने स्वीकृति दी इसको लेकर मालिक और टी सी पी तथा प्रदुषण नियन्त्रण बोर्ड का स्टैण्ड इस तरह से अलग-अलग सामने आया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि संबधित विभागों के अधिकारियों के बीच निश्चित रूप से सांठगांठ रही है। इसी सांठ गांठ को इंगित करके इस होटल को 20 लाख का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना दो सप्ताह के भीतरे अदा किया जाना था जिसका 75% प्रदेश के पर्यावरण विभाग और 25% प्रदूषण नियन्त्राण बोर्ड में जमा होना है। लेकिन क्या यह पैसा अभी तक जमा हो पाया है या नही इसके बारे में जब संबंधित विभागों से बात की गयी तो उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी ही नही थी।

एनजीटी के निर्देशों के बाद तहसीलदार कुल्लु और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर मनाली ने उप-मण्डल के होटलों का संयुक्त निरीक्षण 28.4.2018, 4.5.2018 और 18.5.2018 को किया। इस निरीक्षण में 92 होटलों की सूची तैयार की गयी है। इसमें 30 होटलों के खिलाफ वनभूमि के अतिक्रमण का आरोप है इस आरोप पर कारवाई के नाम पर कहा गया है कि Notice will be issued To the encroacher aaccording to the encroachment case which are being prepared by the revenue field agency. इस निरीक्षण को हुए भी पांच माह का समय बीत गया है लेकिन इन पांच महीनों में कितने होटलों को यह नोटिस जा चुके हैं इसके बारे में संबंधित अधिकारी बहुत स्पष्ट नही थे। लेकिन जो 92 होटलों की सूची बनाई गयी है उसमें याचिका में आये दोनां होटलों का नाम नही है। इसी तरह जो 73 होटलों की सूची प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने तैयार की थी उसमें उन होटलों के नाम शामिल थे जिनके पास Consent to operate नही थी। लेकिन होटल सीट्रस का नाम बोर्ड की इस सूची में भी शामिल नही है।
कुल्लु मनाली क्षेत्र में बने 547 होटलों में से 216 के पास आप्रेट करने की अनुमति नही है। परवाणु में अवैधता के आरोपों पर 44 होटलों का बिजली, पानी काटा गया। धर्मशाला में 144 होटलों के खिलाफ कारवाई की गयी है। कसौली में 44 होटलों की बिजली, पानी काटा गया। यह प्रदेश उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद हुआ है। इस समय सर्वोच्च न्यायालय से लेकर एनजीटी और प्रदेश उच्च न्यायालय सभी अवैध होटलों के खिलाफ कड़ा रूख अपनाये हुए है और मुख्य सचिव को संबंधित कर्मचारियों/अधिकारियों के खिलाफ कारवाई के निर्देश दे चुके हैं लेकिन अभी तक कोई कारवाई सामने नही आयी है।


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