Thursday, 15 January 2026
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औद्योगिक विकास के दावों पर उठते सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार औद्योगिक विकास को लेकर आक्रामक और सक्रिय रणनीति अपनाने का दावा कर रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में सरकार राज्य को वैश्विक निवेश के मानचित्र पर स्थापित करने की बात कर रही है। लेकिन इन दावों के समानान्तर विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि क्या यह औद्योगिक नीति वास्तव में रोजगार और आर्थिक मजबूती की दिशा में ठोस परिणाम दे पाएगी, या यह केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह जाएगी।
सरकार द्वारा ‘इंडस्ट्री थ्रू इनविटेशन’ नीति को एक बड़े बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। दुबई, जापान और मुंबई जैसे निवेश केंद्रों में किए गए संवादों के बाद 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश और डव्न् साईन किये जाने का दावा है। आज डव्न् को वास्तविक निवेश मानकर प्रचारित करना भ्रामक हो सकता है। पूर्व की भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी हजारों करोड़ के डव्न् साईन किये गये थे, जिनमें से बहुत से कभी धरातल पर नहीं उतर सके। ऐसे में सवाल यह है कि वर्तमान सरकार इन प्रतिबद्धताओं को वास्तविक परियोजनाओं में बदलने के लिए क्या ठोस समय-सीमा और निगरानी व्यवस्था बना रही है।
सरकार ने 14,000 करोड़ रुपये की 683 औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देने और 32,000 रोजगार अवसर सृजित होने का दावा किया है। परियोजनाओं कि मंजूरी और क्रियान्वयन के बीच की खाई हिमाचल में हमेशा बड़ी रही है। औद्योगिक भूमि की सीमित उपलब्धता, पर्यावरणीय मंजूरियां और आधारभूत ढांचे की कमी ऐसे कारक हैं, जो कई परियोजनाओं को कागज़ों तक सीमित कर देते हैं। यहां पर सवाल यह है कि इनमें से कितनी परियोजनाएं वास्तव में निर्माण या उत्पादन चरण में पहुंच चुकी हैं।
एमएसएमई और ग्रामीण उद्यमिता को लेकर सरकार के दावों पर भी विपक्ष ने सवाल उठाये हैं। केंद्र सरकार को भेजे गए 1,642 करोड़ रुपये के प्रस्ताव और 109.34 करोड़ रुपये की प्रारंभिक फंडिंग को लेकर विपक्ष का कहना है कि यह राशि राज्य की जरूरतों के मुकाबले बेहद सीमित है पर जब तक बिजली, कच्चा माल, परिवहन और बाजार तक पहुंच जैसी मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं किया जाएगा, तब तक छोटे उद्योग टिकाऊ नहीं बन पाएंगे।
स्टार्टअप और नवाचार नीति को लेकर भी कुछ सवाल है। 107 स्टार्टअप्स के संचालन और 407 स्टार्टअप्स के प्रक्रियाधीन होने के सरकारी दावे के बीच यह सवाल उठता है कि इनमें से कितने स्टार्टअप्स वास्तव में लाभ में हैं और कितने केवल अनुदान आधारित प्रयोग बनकर रह गए हैं। हिमाचल प्रदेश में स्टार्टअप संस्कृति तभी सार्थक होगी जब उन्हें दीर्घकालिक बाजार समर्थन और वित्तीय स्थिरता मिलेगी।
मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना के तहत स्वीकृत 1,607 स्वरोजगार इकाइयों और 3,500 से अधिक रोजगार के आंकड़े यह बताते हैं कि यह संख्या राज्य के बेरोजगार युवाओं की कुल संख्या के मुकाबले बहुत छोटी है। क्या इन स्वीकृत स्वरोजगार इकाइयों की निगरानी भी की जा रही है, ताकि वे कुछ वर्षों में बंद न हो जाएं।
निवेशक सुविधा के लिए किए गए सुधारों-जैसे सिंगल-विंडो पोर्टल और निर्माण नियमों में ढील-पर भी पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय हितों की अनदेखी के आरोप लग रहे है। आज अगर औद्योगिक विस्तार के नाम पर पर्यावरणीय मानकों से समझौता किया गया, तो इसके दीर्घकालिक सामाजिक और पारिस्थितिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
सरकार को मिले राष्ट्रीय पुरस्कार ‘प्रशासनिक रैंकिंग’ तक सीमित है। असली मूल्यांकन पुरस्कारों से नहीं, बल्कि यह देखकर होता है कि औद्योगिक विकास से ग्रामीण आय, स्थानीय रोजगार और पलायन पर कितना प्रभाव पड़ा है।
राजनीतिक रूप से देखें तो हिमाचल में औद्योगिक नीति अब केवल आर्थिक विषय नहीं रही, बल्कि सत्ता की विश्वसनीयता की लड़ाई बन चुकी है। सरकार इसे बेसक आर्थिक सुधार की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताती है पर यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि इससे प्रदेश को कितना फायदा पहुंचता है।
हिमाचल की जनता के लिए निर्णायक प्रश्न यही है कि क्या यह औद्योगिक रणनीति राज्य को स्थायी रोजगार, संतुलित विकास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर ले जाएगी, या यह भी पूर्ववर्ती योजनाओं की तरह राजनीतिक बयानबाज़ी में सिमटकर रह जाएगी। इसका उत्तर आने वाले वर्षों में नीतियों के क्रियान्वयन और उनके वास्तविक परिणाम ही देंगे।

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