चेस्टर हिल्स: दो रेरा सर्टिफिकेट, एक प्रोजेक्ट और सवालों का जाल
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Created on Thursday, 23 April 2026 12:11
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित “चेस्टर हिल्स” प्रोजेक्ट इन दिनों केवल रियल एस्टेट निवेश का विषय नहीं रहा, बल्कि यह नियामक व्यवस्था, पारदर्शिता और कानून के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गया है। इस पूरे विवाद की जड़ में हैं हिमाचल प्रदेश रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए दो अलग-अलग रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र एक 02 मार्च 2023 से 02 मार्च 2043 तक और दूसरा 17 अक्तूबर 2023 से 17 अक्तूबर 2028 तक। पहला प्रमाणपत्र (Sr. No. 001047) “CHESTER HILLS-2” के नाम से जारी किया गया, जिसमें 20 वर्षों की असामान्य रूप से लंबी वैधता दी गई। दूसरा प्रमाणपत्र (Sr. No. 001077) “CHESTER HILLS PH-4” के नाम से केवल 5 वर्षों के लिए जारी हुआ। दोनों में प्रमोटर और भूमि स्वामी के रूप में M/S Chester Hills और श्री हंसराज ठाकुर का ही नाम है, और प्रोजेक्ट लोकेशन भी ठाकुर निवास, बाईपास रोड, सोलन है।
यहीं से कहानी उलझने लगती है। रेरा अधिनियम, 2016 के तहत किसी भी प्रोजेक्ट को रजिस्ट्रेशन देने से पहले प्राधिकरण को जमीन के स्वामित्व, कानूनी स्थिति, नक्शा स्वीकृति, वित्तीय स्रोत और अन्य सभी आवश्यक अनुमतियों की गहन जांच करनी होती है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब एक ही डेवलपर, एक ही लोकेशन और लगभग समान प्रकृति के प्रोजेक्ट के लिए दो अलग-अलग अवधि और नामों से सर्टिफिकेट जारी किए गए, तो क्या दोनों बार समान स्तर की जांच हुई?
पहले सर्टिफिकेट में 20 साल की अवधि अपने आप में असामान्य है। आमतौर पर रेरा प्रोजेक्ट की अनुमानित निर्माण अवधि के आधार पर 3 से 7 वर्षों तक का समय देता है। ऐसे में 20 वर्षों का रजिस्ट्रेशन यह संकेत देता है कि या तो प्रोजेक्ट को बहुत बड़े मास्टर प्लान के रूप में देखा गया, या फिर नियमों की व्याख्या में ढील बरती गई।
दूसरी ओर, उसी वर्ष अक्तूबर में जारी 5 साल का सर्टिफिकेट यह दर्शाता है कि प्रोजेक्ट को एक नए चरण (Phase-4) के रूप में पेश किया गया। लेकिन क्या यह वास्तव में अलग चरण है या उसी बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा? यदि यह एक ही मास्टर प्रोजेक्ट का हिस्सा है, तो फिर अलग-अलग रजिस्ट्रेशन और अलग-अलग अवधि क्यों?
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—दस्तावेजों की छानबीन। दोनों सर्टिफिकेट में स्पष्ट रूप से लिखा है कि प्रमोटर को किसी अन्य लागू कानून का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में जमीन खरीद से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण कानून धारा 118 है, जिसके तहत बाहरी व्यक्तियों को जमीन खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य होता है।
अब सवाल यह है कि जब रेरा ने यह सर्टिफिकेट जारी किए, तब क्या उसने यह सुनिश्चित किया कि जमीन की खरीद पूरी तरह वैध है? क्या यह जांच की गई कि कहीं बाहरी निवेशकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से जमीन का अधिग्रहण तो नहीं हुआ? यदि बाद में इस तरह के आरोप सामने आते हैं, तो यह सीधे-सीधे रेरा की जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
दोनों सर्टिफिकेट में एक समान शर्त भी है—प्रोजेक्ट से प्राप्त 70% धनराशि को एक अलग बैंक खाते में जमा करना होगा, ताकि उसका उपयोग केवल निर्माण और जमीन लागत के लिए हो। यह प्रावधान खरीदारों के हितों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि पैसों के लेनदेन को लेकर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह भी जांच का विषय बनेगा कि क्या इस शर्त का पालन किया गया या नहीं।
पहले सर्टिफिकेट में कुछ अतिरिक्त शर्तें भी जोड़ी गई हैं—जैसे कि कुछ मंजिलों को सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित रखना और 15 प्लॉट्स को केवल प्लॉट के रूप में ही बेचना। यह दर्शाता है कि प्रोजेक्ट की संरचना जटिल है और इसमें विभिन्न प्रकार के उपयोग शामिल हैं। ऐसे में रेरा की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह हर पहलू की गहराई से जांच करे।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या यह केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि है या इसके पीछे कोई बड़ा खेल? रेरा के चेयरपर्सन के हस्ताक्षर इन सर्टिफिकेट्स पर मौजूद हैं, जिससे यह मामला और संवेदनशील हो जाता है। हालांकि केवल हस्ताक्षर होने से किसी की भूमिका संदिग्ध नहीं मानी जा सकती, लेकिन यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो जिम्मेदारी तय होना तय है।
भ्रष्टाचार के आरोपों की बात करें, तो फिलहाल ये आरोप स्तर पर हैं और उनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। लेकिन दो अलग-अलग सर्टिफिकेट, अलग-अलग अवधि, और समान प्रोजेक्ट लोकेशन—ये सभी तथ्य मिलकर संदेह को जन्म जरूर देते हैं।
आगे चलकर इस मामले में किन-किन लोगों पर गाज गिर सकती है, यह पूरी तरह जांच पर निर्भर करेगा। इसमें डेवलपर, भूमि मालिक, बिचौलिये, और यदि कोई प्रक्रियात्मक चूक पाई जाती है तो संबंधित अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।
जहां तक बाहरी लोगों से पैसा लेकर प्रोजेक्ट चलाने का सवाल है, रेरा कानून इसे पूरी तरह नहीं रोकता, लेकिन हिमाचल के भूमि कानून इसे सीमित जरूर करते हैं। यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जमीन में निवेश किया है, तो उसकी वैधता की जांच अनिवार्य है।
फिलहाल, चेस्टर हिल्स प्रोजेक्ट एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर कदम, हर दस्तावेज और हर निर्णय की जांच जरूरी हो गई है। यह केवल एक प्रोजेक्ट का मामला नहीं, बल्कि उस सिस्टम की परीक्षा है जो रियल एस्टेट क्षेत्रा को नियंत्रित करता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इन दोनों प्रमाणपत्रों के बीच का रहस्य स्पष्ट हो पाता है या यह मामला और गहराता है। लेकिन इतना तय है कि ‘चेस्टर हिल’ अब एक साधारण परियोजना नहीं, बल्कि रेरा की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता का आईना बन चुका है। यह केवल एक प्रोजेक्ट का विवाद नहीं, बल्कि उस सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा है, जिस पर हजारों निवेशकों का भरोसा टिका होता है।
यह है प्रमाणपत्र
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