शिमला/शैल। बीते चार जुलाई को शिमला कोटखाई में हुए गुड़िया गैंगरेप एवम हत्या और फिर इसी प्रकरण में पकड़े गये कथित अभियुक्तों में से एक सूरज की पुलिस कस्टडी में हुई हत्या के मामले में अब सीबीआई ने उस समय रहे शिमला के एसपी डी डब्ल्यू नेगी को गिरफ्तार कर लिया है। नेगी की गिरफ्तारी के बाद मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि वह इस मामले को सुलझाने में बुरी तरह असफल रही है और पूरी जांच को भटका दिया गया है। दूसरी ओर इसी गिरफ्तारी पर प्रतिपक्ष नेता प्रेम कुमार धूमल ने अपनी प्रतिक्रिया में दावा किया है कि इस गिरफ्तारी से भाजपा की सारी आशंकाएं सही साबित हुई है। स्मरणीय है कि इस प्रकरण ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। लोगों का आक्रोश जनान्दोलन के रूप में सड़को पर आ गया था उग्र भीड़ ने
कोटखाई पुलिस स्टेशन को आग तक लगा दी थी। लोगों के इस उग्र आन्दोलन को देखते हुए प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेशों पर सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। 22 जुलाई से इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले है।
सीबीआई को मामला हाथ में लिये करीब चार महीने हो गये है। सीबीआई जांच पर प्रदेश उच्च न्यायालय लगातार अपनी निगरानी बनाए हुए है। लेकिन अब तक इस पूरे मामले में जांच के नाम पर हुआ क्या कुछ तो यह तथ्य सामने आते हैं। चार जुलाई को यह पन्द्रह वर्षीय गुड़िया स्कूल से घर नहीं पहुंचती है। परिजन तलाश करते हैं उन्हे चार को कोई पता नही चलता है पांच को भी कोई पता नही चलता है और शाम को नौ बजे वह लड़की के मामा को इसकी सूचना देते हैं जो छः को तलाश पर निकलता है उसे लड़की की लाश मिल जाती है और वह परिजनों और पुलिस को सूचित करता है। उसकी सूचना पर एफआईआर दर्ज होती है। आठ नौ को इस हत्या की खबरें छपती है इस पर उच्च न्यायालय दस को स्वतः संज्ञान लेकर पुलिस और सरकार से रिपोर्ट तलब करता है। खबरे छपने पर इसकी जांच के लिये नौ को पुलिस की एसआईटी गठित हो जाती है। 12 जुलाई को छः लोगों से पूछताछ करती और 13 जुलाई को इन्हे गिरफ्रतार कर लेती है। लेकिन इस पूछताछ और गिरफ्तारी से पहले ही चार लोगों के फोटो मुख्यमन्त्री की अधिकारिक फेसबुक पेज पर वायरल हो जाते हैं और कुछ ही समय बाद हटा भी लिये जाते हैं परन्तु जो लोग गिरफ्तार किये जाते हैं उनमें इन लोगों में से कोई नही होता है जिनके फोटो वायरल हो चुके थे। इस पर पुलिस जांच पर पक्षपात के आरोप लग जाते हैं। लोगों का गुस्सा फूट पड़ता है सरकार जन दबाव में मामला सीबीआई को सौंपने का फैसला कर लेती है इसी के साथ जब उच्च न्यायालय में सुनवाई के लिये मामला आया तब तक कोटखाई पुलिस थाने को आग लगा दिये जाने की वारदात घट चुकी थी और डीजीपी ने अपने शपथ पत्र में अदालत के सामने यह सारी स्थिति रख दी। इस पर अदालत ने भी सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इस मामले की जांच तुरन्त अपने हाथ मंे ले। उच्च न्यायालय ने मुख्य सचिव को भी निर्देश दिये थे कि 'The chief Secretary to the govt. of Himachal Pradesh shall ensure that appropriate action in taken against officials /officers/functionaries of the state, in accordance with law. Within a period of two weeks from today, we shall independently examine the matter and take approriate action.
मुख्य सचिव ने यह कारवाई कोटखाई थाना प्रकरण सहित पूरे मामले में करनी थी लेकिन इस कारवाई के संद्धर्भ में भी आज तक कोई जानकारी बाहर नही आई है। गुड़िया के पोस्टमार्टम की जो रिपोर्ट चर्चा में आयी है उसके मुताबिक गुड़िया की हत्या चार जुलाई को ही पांच से छः बजे के बीच हो गयी थी। इसके मुताबिक गैंगरेप से लेकर हत्या तक पूरे अपराध को दो घन्टे में ही अंजाम दे दिया। क्या यह संभव हो सकता है इस पर अभी तक कुछ भी स्पष्ट नही हो पाया है।
अब सीबी आई के सामने दो मामले हैं एक गुड़िया के गैंगरेप और हत्या का, दूसरा है इसी प्रकरण में पकड़े गये एक संदिग्ध की पुलिस कस्टडी में हुई मौत। गुड़िया प्रकरण में जो संदिग्ध पकड़े थे उनके खिलाफ 90 दिन के भीतर पुलिस/सीबीआई अदालत में चालान दायर नही कर पायी और उनको ज़मानत मिल गयी है। यह ज़मानत तकनीकी आधार पर है गुण -दोष के आधार पर नहीं। इसलिये इसे क्लीन चिट नही कहा जा सकता। सीबीआई इन संदिग्धों का नार्को भी करवा चुकी है। लेकिन इस नार्को में क्या हुआ है इसका भी कोई खुलासा बाहर नही आया है। एक संदिग्ध की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के लिये सीबीआई पूरी एसआईटी को हिरासत में ले चुकी है। उच्च न्यायालय ने 30 नवम्बर तक इनके खिलाफ चालान दायर करने के निर्देश दे रखे हैं यदि तब तक चालान दायर नही होता है फिर इनको भी तकनीकी आधार पर ज़मानत मिल जायेगी। अब सीबीआई ने इसी कस्टोडियल डैथ के लिये डी डब्ल्यू नेगी को हिरासत में लिया है। नेगी पर आरोप है कि उन्होने इस प्रकरण में गलत मामला दर्ज किया। तथ्यों को छुपाया गया। नेगी पर इन आरोपों को आधार उनकी कुछ अधिकारियों और अन्य लोगों से हुई बातचीत का रिकार्ड सामने कहा जा रहा है। उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक कस्टोडियल डैथ को लेकर हिरासत में चल रहे एसआईटी के सदस्यों से कोई बड़ी जानकारी नही मिल पायी हैं सीबीआई ने एसआईटी के सदस्यों के आवाज के सैंपल लेने के लियेे अदालत में याचिका दायर कर रखी है। लेकिन इस पर कोई फैसला नही हो पाया क्योंकि अभियुक्तों की ओर सेे अदालत में कोई वकील पेश नही हुआ।
पुलिस कस्टडी में हुई मौत के लियेे पुलिस ने मृतक सूरज और दूसरे अभियुक्त राजूू के बीच झगड़ा होना कहा है। लेकिन सीबीआई ने पुलिस थ्योरी को न मानतेे हुए एसआईटी को हिरासत में ले लिया, लेकिन इसके बावजूद सीबीआई असली हत्यारे को चिन्हित नही कर पायी है। अब सवाल उठता है कि क्या सूरज की मौत पुलिस की पूछताछ में कोई ज्यादती होने से हो गयी या फिर उसे नीयतन किसी कोे बचाने के लिये मारा गया? यदि किसी को बचाने के लिये मारा गया तो क्या इसके लिये पुलिस पर किसी बडे का दवाब था या फिर मोटे पैसे का खेल था? यदि दवाब था तोे किसका और क्यों? यदि मोटे पैसेे का खेल था तो यह पैसा कौन दे रहा था। एसआईटी के सदस्यों को इन्ही सवालों के लिये हिरासत में लिया गया है, लेकिन अभी तक सफलता के नाम पर सीबीआई खाली हाथ है। इन्ही सवालों के लिये अब डी डब्ल्यू नेगी को पकड़ा गया है। यहीं पर एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि सीबीआई ने गुड़िया प्रकरण में जिन अभियुक्तों का नार्को करवाया था क्या उस नार्को में भी कोई ठोस लीड हाथ नही लगी है? क्योंकि इन्ही अभियुक्तों में से एक की गाड़ी गुड़िया को स्कूल से लाने से
लेकर उसके शव को ले जाने तक में प्रयुक्त हुई कही गयी है, जिसका सीधा अर्थ है कि उसको तो यह अवश्य पता है कि किसके कहने पर उसने गाड़ी प्रयोग की? क्योंकि जो लोग पुलिस ने पकड़े थे उनसे ही गुड़िया के मुजरिम की जानकारी मिलने की सबसे बड़ी संभावना थी। उनके नार्को में तो यह जानकारी होना आवश्यक है लेकिन इन लोगों के नार्को के बाद भी यदि सीबीआई गुड़िया के किसी भी दोषी को नही पकड़ पायी है। तो इसका सीधा अर्थ है कि इन लोगों का इस गुडिया मामले से कोई वास्ता ही नही रहा है। तब फिर हटकर सन्देह की सूई कोटखाई पुलिस की ओर घूमती है कि उसने असली गुनाहगारों को बचाने का खेल पहले ही दिन रच दिया था और इस कड़ी में जिन लोगों के फोटो वायरल हुए और फिर पोस्ट से हटा लिये गयेे यह इस प्रकरण को सुलझानेे की एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है, लेकिने इस संदर्भ में अभी तक सीबीआई के कोई कदम सामने नही आये है। अब डी डब्लू नेगी पर यदि यह आरोप है कि उन्होने जानबूझकर तथ्यों को छुपाकर गलत मामला दर्ज करवाया तो फिर सवाल उठता है कि नेगी ने किसकेे ईशारेे पर यह सब किया जो पुलिस अधिकारी अब तक हिरासत में है। उनका भविष्य तो खत्म होे जायेगा यदि वह किसी को बचानेे के प्रयास में अबतक खामोश बैठे है। क्योंकि कस्टोडियल डैथ नीयतन है या स्वभाविक परिस्थितियों का परिणाम है यह तो यही लोग जानते हैं। नेगी की हिरासत के बाद यदि सीबीआई कुछ और गिरफ्तारियों को 30 नवम्बर से पहलेे अंजाम नही देती है तो तय है कि पहले से हिरासत में चल रहे एसआईटी के सदस्यों को भी ज़मानत मिल जायेगी और यह ज़मानत मिलने का अर्थ होगा कि गुड़िया से लेकर सूूरज की हत्या तक सीबीआई पूरी तरह खाली हाथ है तथा अन्धेरे में तीर चला रही है या फिर वह भी शिमला पुलिस की तरह बचाने के प्रयास में लग गयी है। क्योंकि यदि सीबीआई भी कस्टोडियल डैथ जैसे स्पाट मामले को नही सुलझा पाती है तो फिर उसकी काबीलियत से ज्यादा उसकी नीयत पर ही सवाल उठने शुरू हो जायेंगे।
शिमला/शैल। मतदान के बाद कांग्रेस और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जहां चुनाव परिणामों को लेकर अपने-अपने आंकलनों में जुटे हैं वहीं पर दोनों पार्टीयां अपने-अपने विद्रोहियों और भीतरघातियों के खिलाफ कारवाई भी करने जा रही है। क्योंकि दोनों पार्टीयों को इन विद्रोहीयों और भीरतघातियों से नुकसान पहुंचा है। दोनों पार्टीयों के आधा - आधा दर्जन विद्रोही अन्त तक बतौर आज़ाद उम्मीदवार चुनाव मैदान में बने रहे हैं। यह विद्रोही भले ही स्वयं न जीत पायेे लेकिन अधिकृत उम्मीदवारों को अवश्य नुकसान पंहुचा सकते हैं यह माना जा रहा है। जहां एक ही चुनाव क्षेत्र में दोनों दलों के विद्रोही बतौर आज़ाद उम्मीदवार मैदान में बनेे रहे हैं वहां किसी आजा़द को सफलता मिल सकती है इसकी संभावना भी बराबर है। यह विद्रोही कहां- कहां रहे हैं? इस सवाल की पड़ताल करने से पूर्व यह समझना बहुत आवश्यक है कि दोनों दलों में विद्रोह की स्थिति आयी ही क्यों।
सत्तारूढ़ कांग्रेस में मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और संगठन प्रमुख सुक्खु के बीच जिस तरह का टकराव सत्ता संभालने के पहले ही दिन से शुरू हुआ था वह चुनावों तक बराबर बना रहा है। लेकिन चुनावों में जब कुछ वीरभद्र के विश्वस्त माने जाने वाले निर्दलीयों के रूप में चुनाव मैदान में समाने आ गयेे तब मुख्यमन्त्री पर अपरोक्ष में अंगूलियां उठना शुरू हो गयी। विद्रोहियों को आर्शीवाद देने और अधिकृत उम्मीदवारों को समर्थन न देने आक्षेप शिमला अर्बन और ठियोग विधानसभा क्षेत्रों में उस समय सामनेे आ गया जब एसआईडीसी के उपाध्यक्ष अतुल शर्मा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिये संगठन से निष्कासित किया गया। वीरभद्र ने इस निष्कासन का खुलेे रूप से विरोध करते हुऐ इसे अन्याय करार दिया है। इससेे यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि कुछ पार्टी विद्रोहियों को वीरभद्र का समर्थन हालिस है। माना जा रहा है कि चुनावों के परिणाम आने के बाद एक बार फिर संगठन और वीरभद्र में खुले टकराव की नौबत आयेगी।
इसी तरह अगर भाजपा के भीतर उभरे विद्रोह का आंकलन किया जाये तो इसके लिये प्रदेश के स्थानीय नेताओं के हितों के अघोषित टकराव के साथ ही हाईकमान की नीति को भी बराबर का जिम्मेदार माना जा रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद जब कई राज्यों में भी पार्टीे की सरकारें बन गयी तो स्वभाविक रूप से कार्यकर्ताओं का मनोबल और बढ़ गया। इस मनोबल के बढ़नेे केे साथ ही उनकी अपनी महत्वकांक्षाए भी बढ़ी और वह उम्मीद करने लगे की सगंठन टिकटों के आवंटन में उन्हें भी तरजीह देगा। लेकिन जब टिकटों के लिये आवेदन किये जाने के पुराने चलन को नकार कर हाईकमान ने अपने ही सर्वे के आधार पर टिकट देने का फैसला लिया तो उससे स्थिति बदल गयी। लेकिन यह स्थिति उस समय और विकट हो गयी जब कांगे्रस से चुनावों के दौराने कुछ लोगों को पार्टी में शामिल करवाकर उनको टिकट थमा दिये गये। इसी के साथ यह जगजाहिर हो चुका था कि टिकट आंवटन में प्रदेश के बड़े नेताओं की राय को भी बड़ा अधिमान नही दिया गया है। फिर पार्टी बिना मुख्यमन्त्री का चेहरा घोषित किये चुनाव लडेगी इस फैसले को चुनाव के अन्तिम चरण में बदल दिया गया। धूमल को नेता घोषित किये जाने से पहले कार्यकर्ताओं और जनता में यह अप्रत्यक्ष प्रचार हो चुका था कि भाजपा में अगला मुख्यमन्त्री जेपी नड्डा होंगे। धूमल के घोषित होने केे साथ ही फिर पार्टी के भीतरी समीकरणों में बदलाव आया और इससे अपनी डफली अपने राग वाली स्थिति बन गयी।
इस परिदृश्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि जब पार्टीयों का शीर्ष नेतृत्व अपने को ही सर्वेसर्वा मानकर अपनेे निर्णयों पर सार्वजनिक सहमति तैयार करने की बजाये उन्हे एक तानाशाह की तरह संगठन पर थोपनेे लग जाता है तब यह स्थितियां विद्रोह और भीतरघात की शक्ल लेकर सामनेे आती हैं फिर पार्टीयां जब ऐसे लोगों के खिलाफ निष्कासन के फैसले लेती है तो उन पर अन्त तक अमल नही कर पाती है। 2012 के चुनावों में भी दोनों पार्टियों ने ऐसे लोगों के खिलाफ निष्कासन की कारवाई को अंजाम दिया था। लेकिन इन चुनावों के आते -आते सबको फिर से शामिल कर लिया गया। भाजपा ने तो कांग्रेस से चुनावों में नेताओं को तोड़कर अपने टिकट थमाये हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि किसी भी दल को बहुमत नही मिल पाता है और निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बनाने की नौबत आती है तो क्या दल उन्हे अपने में शामिल करने से परहेज करेंगे। उस समय सरकार बनाने के लिये यह विद्रोह और भीतरघात सब बीते वक्त की बात हो जायेगी और इन आजाद लोगों को मंत्री बनाया जायेगा। नगर निगम शिमला में सता के लिये अभी ही भाजपा यह सब कर चुकी है। इसलिये आज विद्रोह और भीतरघात के नाम पर कारवाई किये जाने का तब तक कोई अर्थ नही रह जाता है जब तक सता का लालच बना रहेगा।
शिमला/शैल। राज्य सरकार ने वर्ष 2002 में सरकारी भूमि पर किये गये अवैध कब्जों/अतिक्रमणों को नियमित करने के लिये एक पाॅलिसी अधिसूचित की थी। इसके तहत लोगों से कब्जों/अतिक्रमणों की जानकारी मांगी गयी थी। उस समय इस योजना के तहत करीब डेढ़ लाख लोगों ने बाकायदा शपथ पत्र देकर ऐसे कब्जों की जानकारी सरकार को दी थी। इतनी संख्या में हुए अतिक्रमणों की जानकारी सामने आने के बाद इस योजना को कुछ लोगों ने प्रदेश उच्च न्यायालय में CWP No. 1028 of 2002 के माध्यम से चुनौति दे दी। इस याचिका पर प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिये कि योजना के तहत प्रक्रिया तो जारी रखी जाये लेकिन इस आशय के पट्टे अदालत के अगले आदेशों के बिना जारी न किये जायें। यह याचिका अब तक अदालत मे लंम्बित है।
इसके बाद 2015 में अवैध कब्जों/ अतिक्रमणों का मामला फिर एक और याचिका CWP 3141 of 2015 के माध्यम से उच्च न्यायालय के समक्ष आया। इस पर पहले जो अदालत ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए ऐसे अवैध कब्जों/अतिक्रमणों को खाली करने के लिये इन पर उगाये गये पेड़ो को काटने के निर्देश दे दिये । इन निर्देर्शों पर पूरे प्रदेश में खलबली मच गयी। कई स्थानों पर सैंकड़ो पेड़ काट भी दिये गये। इसी बीच सेब बागावानों ने सरकार पर दबाव बनाया और अदालत से निर्देशों में संशोधन की गुहार लगायी। सरकार के आग्रह को स्वीकारते हुए अदालत ने पेड़ों को काटने की बजाये उनकी प्रूनिंग करने के आदेश दिये। इन आदेशों के साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि अवैध कब्जों/अतिक्रमणों के तहत आयी एक-एक ईंच भूमि को खाली करवाया जायेगा। इसी के साथ यह भी निर्देश दिये की अवैध रूप से कब्जा/अतिक्रमण करके उगाये गये बागीचों की उपज को सरकारी तन्त्र अपने कब्जे में लेेकर उसकी निलामी करवायेगा और पैसा सरकारी खजाने में जमा करवायेगा। मुख्य न्यायधीश जस्टिस मंसूर अहमद मीर और जस्टिस त्रिलोक चैहान की खण्डपीठ ने ऐसी की गयी निलामी और उसके तहत मिले पैसों पर सरकार से चार सप्ताह के भीतर जानकारी मांगी है और 17 अक्तूबर को मामला सुनवाई के लिये रखा है वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2015 में ऐसी निलामी हुई है और इससे कितना पैसा मिला है इसकी जानकारी अभी तक विभाग के पास नही है।
दूसरी ओर उच्च न्यायालय में जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर की खण्डपीठ के पास आये एक अवैध कटान के मामले में अदालत ने विशेष अदालत वन के फैसले को पलटते हुए अवैध कटान का दोषी पाये गये फारेस्ट गार्ड की सजा को बरकार रखा है। इसी फैसले में अदालत ने अवैध निमार्णो के नियमितिकरण को भी असंवैधानिक करार देते हुए सरकार को कड़ी फटकार लगायी है। अदालत ने दस बीघे से अधिक के वन भूमि पर हुए अतिक्रमणों का कड़ा संज्ञान लेते हुए सरकार को ऐसे अतिक्रमणों को चिहिन्त करके ऐसे लोगों के खिलाख अपराधिक मामले दर्ज करने के निर्देश दिये हैं। खण्डपीठ ने इसी फैसले में भारत सरकार के वित्त मन्त्रालय के तहत कार्यरत ईडी को भी निर्देश दिये हैं कि जिन लोगों ने वन भूमि पर कब्जे कर रखें हैं ऐसे लोगों के खिलाफ मनीलाॅंडरिंग अधिनियम के तहत मामले दर्ज करके ऐसे अर्जित की गयी संपत्तियों को भी जब्त किया जाये।
इस समय प्रदेश में वन भूमि पर हुए अवैध कब्जों/अतिक्रमणों की स्थिति जो सरकार उच्च न्यायालय के समक्ष रख चुकी है उसके मुताबिक दस बीघे से अधिक का अतिक्रमण के मामलों की संख्या 2524 है। इसमें सबसे अधिक संख्या जिला शिमला की है यहां पर 1079 मामलों में दस बीघे से अधिक का अतिक्रमण है इसमें भी सबसे अधिक मामले 342 रोहडू के हैं। शिमला के बाद अतिक्रमणों में कुल्लु दूसरे स्थान पर है यहां इनकी संख्या 1004 है। इसी तरह दस बीघे से कम के अतिक्रमणों की संख्या 10182 है। इसमें भी 2970 के साथ शिमला पहले स्थान पर है। इसके बाद कुल्लु में 2386 और मण्डी में 1270 मामले रिकार्ड पर आये हैं। कांगडा में 1754, चम्बा में 626, सिरमौर में 532 बिलासपुर में 410 सोलन में 121 हमीरपुर में 44 किन्नौर में 55, लाहौल स्पिति में 10 और ऊना में केवल 4 मामले रिकार्ड पर आये हैं।
दस बीघे से अधिक के मामलों में शिमला कुल्लु के बाद किन्नौर में 135, मण्डी में 108, चम्बा में 74, सिरमौर में 68, कांगड़ा में 24, बिलासपुर में 14 लाहौल में 5 और सोलन में 1 मामला सामने आया है। ऊना और हमीरपुर में ऐसे अतिक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है। प्रदेश में वन भूमि पर अतिक्रमण के सबसे अधिक मामले रोहडू में सामने आये है और इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व स्वयं वीरभद्र करते रहे हैं। यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब प्रदेश में हजारों बीघे वन भूमि पर अतिक्रमण हो रहा था तो सरकारी तन्त्र क्या कर रहा था। वीरभद्र ने तो कथित वन माफिया के खिलाफ खुली लड़ाई लड़कर प्रदेश की सत्ता संभाली थी। तो क्या इन अतिक्रमणकारियों को कोई राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था जिसके चलते पूरा सरकारी तन्त्र पंगु बन गया था या फिर इनके साथ मिल गया था।
सरकारी तन्त्र के इसी पक्ष पर चोट करते हुए जस्टिस राजीव शर्मा और सुरेश्वर ठाकुर की खण्डपीठ ने दस बीघा से अधिक के अतिक्रमणकारियों के खिलाफ मनीलांडरिंग के तहत मामले दर्ज करने के निर्देश देते हुए संबधित वन अधिकारियों की चल अचल संपत्ति पर भी लगातार नजर रखने के विजिलैन्स को निर्देश दिये हैं। अदालत ने कहा है। The State Government has not made sincere efforts to prevent and evict the persons who have encroached upon the forest land. There are large tracts of forests, which have not been demarcated till date (i.e. UDF-). The State Government has only taken steps after the intervention of this Court to evict the persons who have unauthorizedly occupied the forest land and raised orchards. The action has been initiated primarily against those persons who had given affidavits admitting their encroachment upon the forest land. Thus, in larger public interest, the State Government is directed to initiate process to identify the encroachments over the forest land and the persons who have planted fruit bearing trees and to take necessary steps for their eviction under the H.P. Public Premises and Land (Eviction and Rent Recovery) Act, 1971 as well as under the H.P. Land Revenue Act, 1954 and also to register FIRs against those persons under the Indian Forest Act and Indian Penal Code. The Director, Enforcement Directorate, Ministry of Finance, Government of India, New Delhi is also directed to register cases against those persons who have encroached upon the huge tracts of forest land and have planted fruit bearing trees and amassed illgottenmoney and also engaged in money laundering within 3 months. The State Government is also directed to provide necessary details of the persons, who have encroached upon more than 10 bighas of forest land and have also indulged in money laundering within 4 weeks to the Director, Enforcement Directorate, Ministry of Finance, Government of India, New Delhi to enable it to register cases against them. It shall be open for the Director, Enforcement Directorate, Ministry of Finance, Government of India, New Delhi to confiscate /forfeit the property of the persons, who have encroached upon more than 10 bighas of forest land under the Prevention of Money-Laundering Act, 2002. The Vigilance Department of the State of H.P. is also directed to carry out periodical verification of movable and immovable properties of the revenue officials/forest officers posted, more particularly, in Districts Mandi, Shimla, Chamba .
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