Saturday, 20 June 2026
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पुलिस में हुए फेरबदल में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने प्रदेश के पुलिस प्रमुख सोमेश गोयल को हटाकर सीताराम मरड़ी को पुलिस प्रमुख के तौर पर तैनाती दी है। मरड़ी 1886 बैच और गोयल 1984 बैच के आई पी एस अधिकारी हैं। गोयल जून 2017  में  डी जी पी स्टेट बने थे। उनसे पहले 1985 बैच के संजय कुमार डी जी पी थे। क्योंकि जब संजय कुमार को डी जी पी बनाया गया था उस समय गोयल के खिलाफ विजिलैन्स में एक मामला चल रहा था। इस कारण से उनकी वरिष्ठता को नज़रअन्दाज किया गया। लेकिन अब जब 2017 में गोयल का मामला समाप्त हुआ तो संयोगवश उसी दौरान संजय कुमार केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर चले गये और गोयल आसानी से डी जी पी स्टेट बन गये। परन्तु अब गोयल केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर नही गये  हैं और उन्हें छः माह के बाद ही पद से हटाकर उनसे कनिष्ठ को डी जी पी नियुक्त कर दिया गया है। पुलिस के शीर्ष पर हुए फेरबदल को लेकर पुलिस मुख्यालय से लेकर सचिवालय तक में सवाल उठने शुरू हो गये हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार पुलिस प्रमुख को दो सालों के कार्यकाल से पहले ही हटा सकती है या नही? 
यह सवाल इसलियेे उठ रहा है कि पुलिस तन्त्र में सुधार किये जाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जो प्रयास एक लम्बे अरसे से चले आ रहे थे उनके तहत 1979 में राष्ट्रीय पुलिस कमिशन का गठन किया गया था। इस कमिशन की रिपोर्टों पर जब कोई कारवाई नही हुई तब 1996 में दो सेवानिवृत पुलिस प्रमुखों ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। डी जी पी प्रकाश सिंह और एन के सिंह ने याचिका दायर करके अदालत से आग्रह किया कि सरकार को एनपीसी की सिफारिशें लागू करने के निर्देश दिये जायें। इस याचिका पर 22 सितम्बर 2006 को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया और इसमें सरकार को सात निर्देश दिये गये और इस पर राज्य सरकारों से भी अनुपालना रिपोर्ट तलब की गयी थी। इसके लिये 16 मई 2008 को एक माॅनिटरिंग कमेटीे का भी गठन किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जो सात निर्देश जारी किये थे उनके तहत पहला था कि स्टट सिक्योरिटी कमीशन का गठन किया जाये। दूसरा था कि डी जी पी की नियुक्ति पारदर्शी हो और उसका कार्याकाल कम से कम दो वर्ष का रहे। तीसरा था कि आॅप्रेशन डयूटी पर तैनात जिला पुलिस चीफ से लेकर एस एच ओ तक को दो वर्ष का कार्यकाल दिया जाये। 

स्मरणीय है कि जब सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला आया था और उस पर अमल की रिपोर्ट तलब की गयी थी तब हिमाचल सरकार ने एक अध्यादेश लाकर तुरन्त प्रभाव से इस पर अमल किया था और बाद में विधानसभा सत्रा के दौरान इस आश्य का नियमित विधेयक पारित किया गया था। इस विधेयक और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पुलिस में इन पदों पर तैनात अधिकारियों को दो वर्ष के कार्यकाल से पहले किसी ठोस कारण के बिना हटाना संभव नही है। केरल और गोवा में राज्य सरकारों द्वारा डी जी पी को उनके पदों से हटाया गया था। इस हटाने को जब अदालत में चुनौती दी गयी थी तब सरकार को अपने फैसले वापिस लेने पडे़ थे। अब 2017 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने दो वर्ष के कम से कम कार्यकाल को लेकर सरकार को कड़े़ निर्देश दिये हैं। यह सब संभवतः इसलिये किया गया है ताकि पुलिस और जांच ऐजैन्सीयों  पर ‘‘पिंजरे का तोता’’ होने के आरोप कम से कम लगें। आज प्रदेश में सरकार बदली है। नये मुख्मन्त्री ने कार्यभार संभाला है। गृह विभाग भी उन्ही के पास है। संभव है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले और सरकार के अपने ही विधेयक की जानकारी शायद मुख्मन्त्री को न रही हो। लेकिन गृह सचिव को इसकी जानकारी रहना स्वभाविक और आवश्यक है तथा यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह मुख्मन्त्री को भी इससे अवगत करवायें। क्योंकि आज यदि कोई अधिकारी या अन्य व्यक्ति इस फैसले को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटा देता है तो सरकार के लिये कठिनाई पैदा हो सकती है। क्योंकि अभी सरकार ने यह ऐलान किया है कि वह पिछली सरकार द्वारा बनाये गये मामलों को वापिस लेगी। जबकि यह मामले वापिस लेने के लिये संबंधित जांच अधिकारियों के खिलाफ भी झूठे या कमजा़ेर मामले बनाने के लिये कारवाई करने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय एक मामले में संबधित अधिकारियों को जारी कर चुका है। कानून के इस परिदृश्य में पुलिस में हुए कुछ फेर बदल सरकार के लिये परेशानी खड़ी कर सकते हैं क्योकि कई अधिकारियों का दो साल का कार्यकाल पूरा नही हुआ है।

नेता प्रतिपक्ष के लिये राहुल ने मुकेश पर जताया भरोसा

शिमला/शैल। पत्रकारिता से राजनीति मे आये और लगातार चैथी बार ऊना के हरोली विधानसभा क्षेत्र से अपनी जीत कायम रखने वाले पूर्व उद्योग मन्त्री मुकेश अग्निहोत्री सदन में कांग्रेस विधायक दल के नेता होंगे। अखिल भारतीय राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाने का दायित्व मुकेश को सौंपा है। स्मरणीय है कि जब कांग्रेस विधायक दल अपनेे स्तर पर नेता का चयन नहीं कर पाया और प्रस्ताव पारित करके नेता चुनने का अधिकार राहुल गांधी को सौंप दिया तब इसके लिये राहुल का मुकेश पर भरोसा जताना अपने में एक बड़ा अहम राजनीतिक फैसला हो जाता है। वीरभद्र सरकार  के मन्त्रीमण्डल के सदस्यों में से मुख्यमन्त्री के अतिरिक्त कवेल सुजान सिंह पाठानिया कर्नल डा. धनी राम शांडिल और मुकेश अग्निहोत्री ही इन चुनावों मे जीत हासिल कर पाये हैं इन तीनों में से पिछली सरकार के कार्यकाल में सदन में यदि किसी की परफारमैन्स सराहनीय रही है तो उसमें मुकेश अग्निहोत्री का नाम ही पहले स्थान पर आता है। इस नाते आज नेता प्रतिपक्ष के रूप में मुकेश के चयन  को आम आदमी का समर्थन मिल रहा है।
लोकतन्त्र में जितना महत्व सत्ता का होता है उसके मुकाबले में प्रतिपक्ष का महत्त्व उससे ही बड़ा हो जाता है। क्योंकि सरकार के हर काम पर बारिकीे से नज़र रखने और गुण दोष के आधार पर उसका समर्थन अथवा विरोध करना यह सबसे बडी़ जिम्मेदारी एक उत्तरदायी विपक्ष की रहती है। यही नहीं सरकार की गलत नीतियों पर सार्वजनिक जन चर्चा का वातावरण तैयार करना भी विपक्ष का सबसे बड़ा दायिव रहता है। आज संयोगवश केन्द्र से लेकर राज्य तक एक ऐसी पार्टी की सरकार है जो अपनी एक निश्चित विचारधारा रखती हैै और इस पार्टी को संघ की राजनीतिक ईकाई माना जाता है, इसलिये यह स्वभाविक है कि इस सरकार के हर फैसले में कहीं न कहीं इसकी विचारधारा का प्रभाव  अवश्य परिलक्षित रहेगा और संघ की विचारधारा की स्वीकार्यता को लेकर पूरे समाज में अभी बहस की ही स्थिति चल रही है। इस नाते भाजपा की कार्यशैली को समझने के लिये संघ की विचारधारा को समझना भी आवश्यक होगा तथा इसके लिये एक व्यापक अध्ययन की भी आवश्यकता रहेगी। इस समय कांग्रेस के जो 21 विधायक चुनकर आये हैं उनमें इन मानकों पर शायद मुकेश ही ज्यादा खरे उतरे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी दल जितना संघ की विचारधारा को लेकर आक्रामक दिखते हैं उतना शायद सरकार के फैसलों को लेकर नही है और यही भाजपा संघ की सफलता है कि उसके फैंसलो की जगह उसकी विचारधारा को लेकर ही आक्रामकता सामने आ रही है।
इस परिदृश्य में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मुकेश की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है क्योंकि वह पिछली सरकार में एक महत्वपूर्ण मन्त्री रहे हैं। सरकार के हर फैसलें में वह बराबर के  भागीदार रहे हैं। भाजपा ने बतौर विपक्ष इसी सरकार के खिलाफ समय-समय पर आरोप पत्र सौंपे हैं। इन्ही आरोप पत्रों के माध्यम से सरकार कांग्रेस के ऊपर सदन के भीतर और बाहर बराबर दबाव बनाये रखेगी। कांग्रेस सरकार के अन्तिम छः माह के फैसलों पर जय राम  सरकार ने पुनर्विचार करने की घोषणा की है। इसलिये इन फैसलों की सदन के भीतर और बाहर वकालत करना नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी हो जाती है। यह एक अच्छा संयोग है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में वित्त विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी जो अधिकारी निभा रहा था आज जयराम सरकार में भी यह जिम्मेदारी उसी अधिकारी के पास है। सरकार के हर फैसले में विभाग की भागीदारी रहती है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि वित्त विभाग की स्वीकृति के बिना कोई भी फैसला हो ही नही पाता है। ऐसे में इस संद्धर्भ में यह सरकार पिछली सरकार के प्रति ज्यादा आक्रामक हो ही नही पायेगी। इसकी पहली झलक राजस्व विभाग में हुई सेवानिवृत कर्मचारियों की नियुक्तियों को लेकर इस सरकार के यूटर्न लेने से समाने भी आ गयी है।
 लेकिन राजनीतिक परिदृश्य में मुकेश का नेता प्रतिपक्ष बनाना इस संद्धर्भ में भी एक बड़ा फैसला बन जाता है कि वीरभद्र के कार्यकाल में मुख्यमन्त्री और संगठन प्रमुख में अन्त तक टकराव की स्थिति बनी रही है। क्या यह टकराव आज भी उसी स्थिति में बना रहेगा या इसमें कमी आयेगी क्योंकि मुकेश को बहुत हद तक वीरभद्र का ही प्रतिनिधि अभी तक माना जा रहा है। इस संद्धर्भ में मुकेश पर वीरभद्र के साये का तमगा कब तक चिपका रहता है और वह व्यवहारिक तौर पर इस साये से कब और कैसे बाहर आते हैं इस पर सबकी निगाहें बनी रहेगी।  आज संयोगवश कांग्रेस अध्यक्ष सुक्खु और नेता प्रतिपक्ष मुकेश दोनों हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं फिर जातिय समीकरण में भी दोनों प्रदेश की दो बड़ी जातियों से आते हैं। यह दोनो नेता आपस मे किस तरह का तालमेल बिठाते हैं इस पर भी सबकी नजरें रहेंगी क्योंकि आने वाले लोकसभा चुनावों में पार्टी को जीत दिलाने की जिम्मेदारी इन्ही दोनो की होगी।

आशा कुमारी थप्पड़ प्रकरण पर उठते कुछ सवाल

शिमला/शैल। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी सचिव, पंजाब की प्रभारी और बनीखेत की विधायक, प्रदेश की वरिष्ठ कांग्रेस नेता आशा कुमारी का थप्पड़ प्रकरण जिस ढंग से प्रचारित /प्रसारित हुआ है उससे कई ऐसे राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े हो गये हैं जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक हो गया है क्योंकि इस प्रकरण की एक पात्र महिला कांस्टेबल ने आशा कुमारी के खिलाफ मामला थाना सदर में दर्ज करवा दिया है। इस कांस्टेबल के बाद आशा कुमारी ने भी मामला दर्ज करवा दिया है। यह मामला जब घटा था उसके बाद आशा कुमारी ने इस पर खेद भी व्यक्त कर दिया था लेकिन इस खेद जताने के वाबजूद यह मामला दर्ज हुआ है।
स्मरणीय है कि घटना वाले दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कांग्रेस भवन में काग्रेस के नेताओं की एक बैठक लेने आये थे जिसमें यह विधानसभा चुनाव लड़े सारे प्रत्याशीयों, जिला एवम ब्लाक अध्यक्षों को आमन्त्रित किया गया था क्योंकि इस बैठक में कांग्रेस की हार के कारणों का आंकलन किया जाना था। राहुल गांधी को एसपीजी की सुरक्षा उपलब्ध है जिसका अर्थ है कि जहां भी जिस भी बैठक में राहुल गांधी शामिल होंगे उसमें भाग लेने वालों को इस सुरक्षा ऐजैन्सी से पास लेना अनिवार्य होगा और उसमें भाग लेने वालों की सूची और उसका अनुमोदन स्थानीय आयोजकों से किया जाता है। इस अनुमोदन के बाद ही एसपीजी अपना पास जारी करती है। स्वभाविक है कि इस बैठक के लिये भी यही व्यवस्था थी। इस बैठक में कांग्रेस के सारे नवनिर्वाचित विधायक भाग ले रहे थे। आशा कुमारी चम्बा से जीतने वाली अकेली कांग्रेस नेता है। जबकि हर्ष महाजन से अनुमोदित नीरज नैय्यर और पूर्व वन मन्त्री ठाकुर सिंह भरमौरी तक यह चुनाव हार गये है। आशा कुमारी न केवल विधायक ही है बल्कि वह पंजाब की प्रभारीे भी है। शायद ही प्रदेश में ऐसा कोई हो जो आशा कुमारी के नाम से परिचित न हो।
कांग्रेस भवन में हुई इस बैठक के लिये सुरक्षा प्रबन्धों की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस की थी क्योंकि एसपीजी जो राहुल गांधी की सुरक्षा के लिये जिम्मेदार है। स्थानीय प्रबन्धन में उसकी भूमिका इतनी ही थी कि उसके द्वारा जारी पास के बिना भीतर बैठक में कोई नहीं जा सकता था। पुलिस प्रबन्धन भी ऐसी बैठकों के लिये तैनात किये गये सुरक्षा कर्मियों से यह सुनिश्चित करता है कि वह बैठक में भाग लेने वालों को जानता हो या उन्हें आसानी से चिहिन्त कर पाये ताकि कोई अव्यवस्था की शिकायत न आयेे। इस बैठक के लिये जब आशा कुमारी और अन्य लोग तो प्रत्यक्षदर्शीयों के मुताबिक सबसेे आगे मुकेश अग्निहोत्री उनके पीछे आशा कुमारी और फिर धनीराम शांडिल थे। आशा कुमारी के साथ उनका पीएसओ भी था। सबसे पहले मुकेश निकले उनका पास वहां तैनात इसी महिला कांस्टेबल ने चैक किया फिर उनको वापिस कर दिया और वह आगे चले गये। फिर आशा कुमारी ने पास दिखाया लेकिन इस पास को देखने के बाद इसे आशा को वापिस नही किया गया। जब पास वापिस मांगा गया और बताया गया कि आशा कुमारी विधायक है तो इसी पर महिला कांस्टेबल तर्क करने लग गयी उसने साथ खड़े पीएसओ को देखकर भी नही पहचाना जबकि धनीराम शांडिल भी वहीं आशा के पीछे खड़े थे। प्रत्यक्षदर्शीयों के अनुसार कांस्टेबल का व्यवहार जायज़ नही था और इसी पर नौबत थप्पड़ तक पहुंच गयी और उसी क्षण उसका विडियो भी शूट हो गया और तुरन्त ही वायरल भी हो गया। फिर जो विडियो वायरल हुआ है उसमें आशा से पहले मुकेश के जाने की घटना नही है। पास का दिखाना और वापिस मांगना भी रिकार्ड नही है केवल थप्पड़ और उसके बदले में फिर थप्पड़ यही रिकार्ड है।
वायरल हुए विडियो को देखने से यह सवाल उठता है कि विडियो रिकार्ड करने वाला पहले से ही इस बैठक में आने जाने वालो, पुलिस के सरुक्षा कर्मीेयों और एसपीजी की कारवाई को स्वभाविक रूप से रिकार्ड नही कर रहा था जिससे आगे-पीछे की कोई चीज रिकार्ड नही है तो स्वभाविक है कि रिकार्ड करने वाले के लिये भी यह अप्रत्याशित घटना रही हो। तब यह सवाल उठता है कि ऐसे माहोल में तो सामान्यतः दोनों पक्षों को शान्त करने का प्रयास पहले किया जाता है उस माहौल में ऐसी रिकार्डिंग तो तभी संभव है जब रिकार्ड करने वालों को पहले से ही यह ज्ञात रहा हो कि अब ऐसा घटने वाला है। इस प्रकरण में न तो आशा कुमारी के व्यवहार को जायज़ ठहराया जा सकता है और न ही महिला कांस्टेबल के व्यवहार को। फिर यह सामने आना भी आवश्यक है कि क्या यहां तैनात इन सुरक्षा कर्मीयों को यह तक नही समझाया गया था कि किसी भी व्यक्ति के साथ यदि कोई पीएसओ है तो उसका अर्थ क्या होता है। फिर यहां आने वाले लोग किसी मेले में नही जा रहे थे बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष की बैठक के लिये विधायक जा रहे थे। ऐसे मे क्या वहां तैनात सुरक्षा कर्मीयों को अधिक संवदेनशील नही होना चाहिये था। क्या इस संवदेनशीलता की जिम्मेदारी अप्रत्यक्षतः शीर्ष प्रशासन की नही हो जाती है। क्या यह सुरक्षा कर्मी इन वी आई पी लोगों को नहीं जानती थी या उन्हे पहचानने की उसे सामान्य समझ भी नही थी। ऐसे बहुत सारे सवाल है जो आगे उठेंगे।

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