केंद्रीय बजट हिमाचल के लिए निराशाजनक

Created on Thursday, 05 February 2026 17:46
Written by Shail Samachar

शिमला/शैल। केंद्रीय बजट 2026-27 को हिमाचल प्रदेश के लिए निराशाजनक और अन्यायपूर्ण बताते हुए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि यह बजट आम लोगों, मध्यम वर्ग, किसानों, बागवानों और विशेष रूप से पहाड़ी राज्यों की जरूरतों के प्रति केंद्र सरकार की असंवेदनशीलता को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि बजट में न तो बढ़ती महंगाई से जूझ रहे मध्यम वर्ग को राहत दी गई है और न ही हिमाचल जैसे राज्यों की संरचनात्मक चुनौतियों को समझा गया है।
मुख्यमंत्राी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 275 (1) के तहत राज्यों को दिए जाने वाले राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को 16वें वित्त आयोग द्वारा समाप्त करना संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार है। उन्होंने स्मरण कराया कि वर्ष 1952 से यह अनुदान राज्यों को दिया जाता रहा है और 15वें वित्त आयोग के दौरान हिमाचल प्रदेश को लगभग 37,000 करोड़ रुपये की सहायता मिली थी। इससे पहले भी अंतरिम व्यवस्था के तहत 11,431 करोड़ रुपये प्रदान किए गए थे। ऐसे में पहली बार आरडीजी को पूरी तरह समाप्त किया जाना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे और पहाड़ी राज्य की वित्तीय वास्तविकताएं मैदानी राज्यों से बिल्कुल भिन्न हैं। राज्य का 67 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वन एवं पारिस्थितिक आवरण में आता है, जिससे राजस्व अर्जन की क्षमता सीमित होती है। पर्वतीय भूगोल के कारण प्रति व्यक्ति सेवा वितरण की लागत अधिक है। इसके अलावा, हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से प्रदेश को 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा है। इन सभी तथ्यों की अनदेखी कर राजस्व घाटा अनुदान समाप्त करना राज्य की वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा करेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आरडीजी समाप्त होने से राज्य को आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं, विकास कार्यों और सामाजिक क्षेत्र में निवेश के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ेंगे, जिससे कर्ज का बोझ भी बढ़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विस्तृत ज्ञापनों और तकनीकी प्रस्तुतियों के बावजूद केंद्र सरकार और वित्त आयोग ने हिमाचल प्रदेश की वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया, जिससे यह आशंका गहराती है कि कांग्रेस शासित राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।
कृषि क्षेत्र पर बजट की आलोचना करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए किए गए प्रावधान अपर्याप्त हैं। सेब उत्पादन, जो प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देता है और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है, बजट में पूरी तरह उपेक्षित रहा। न तो बागवानी के लिए कोई विशेष पैकेज दिया गया और न ही विपणन, भंडारण या प्रसंस्करण के लिए कोई ठोस पहल की गई।
पर्यटन क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने निराशा जताई। उन्होंने कहा कि पर्यटन हिमाचल की पहचान और रोजगार का प्रमुख स्रोत है, लेकिन बजट में इसके लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया। पूर्वाेत्तर राज्यों के लिए बौद्ध सर्किट की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों वाले हिमाचल को इससे बाहर रखना भेदभाव को दर्शाता है। इसी तरह, भानुपल्ली-बिलासपुर और बद्दी-चंडीगढ़ जैसी महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं के लिए भी बजट में कोई आवंटन नहीं किया गया।
मुख्यमंत्री ने राज्यों की ऋण सीमा को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा 1.5 लाख करोड़ रुपये पर ही सीमित रखना और उस पर कठोर शर्तें लागू करना हिमाचल जैसे राज्यों के लिए व्यावहारिक नहीं है। साथ ही, जीएसटी मुआवजा बंद होने से राज्य को हर वर्ष भारी राजस्व नुकसान हो रहा है, जिसकी भरपाई के लिए केंद्र ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले ही पूंजी निवेश की बात करे, लेकिन पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा प्रबंधन, सड़क-रेल कनेक्टिविटी, जलविद्युत, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कोई ठोस सहायता नहीं दिखाई देती। केंद्रीय बजट 2026-27 न तो हिमाचल को विकास का स्पष्ट मार्ग देता है और न ही न्याय की भावना को दर्शाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश और उसके लोगों के हितों के लिए इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज मजबूती से उठाती रहेगी।