रामलीला मैदान से राहुल गांधी के नेतृत्व की राजनीतिक परीक्षा

Created on Wednesday, 04 November 2026 09:53
Written by Shail Samachar
दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को हुई विपक्ष की रैली को केवल चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध तक सीमित करके देखना राजनीतिक वास्तविकता को नजरअंदाज करना होगा। यह रैली केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की कार्यशैली, सत्ता के केंद्रीकरण, जांच एजेंसियों की भूमिका, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता की रोजमर्रा की समस्याओं पर उठ रहे सवालों का संयुक्त राजनीतिक प्रदर्शन थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि राहुल गांधी ने इस मंच से केवल कांग्रेस की बात नहीं की, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक साझा संघर्ष के लिए साथ लाने की कोशिश की है। क्या यह एकजुटता लोकसभा चुनाव से पहले किसी व्यापक राजनीतिक विकल्प का आधार बन सकती है?
रैली में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला और वामपंथी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय राजनीतिक घटना बना दिया। हालांकि आम आदमी पार्टी और द्रमुक जैसे कुछ प्रमुख दल इस मंच पर नहीं थे। रैली की भीड़ को लेकर भी राजनीतिक दावे आमने-सामने रहे। भाजपा ने कम भीड़ का हवाला देकर इसे विफल प्रदर्शन करार दिया है। दूसरी ओर विपक्ष ने इसे व्यापक जनसमर्थन का प्रदर्शन बताया है और एक साझा मंच से केंद्र सरकार को राजनीतिक चुनौती देने की कोशिश की है।
राहुल गांधी ने चुनावी निष्पक्षता को इस रैली का केंद्रीय मुद्दा बनाया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर के नाम पर पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग और सरकार का पक्ष है कि इस प्रक्रिया से फर्जी, दोहरे और अपात्र नामों की पहचान की जा रही है। ऐसे में सवाल यह है कि पात्र मतदाताओं के नाम हटने की शिकायतों का निपटारा किस तरह और कितनी पारदर्शिता से हो रहा है। चुनाव आयोग को आंकड़ों और शिकायतों की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। मतदान का अधिकार किसी राजनीतिक दल की कृपा नहीं, नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि सरकार आलोचना और असहमति को दबाने के लिए प्रशासनिक और कानूनी संस्थाओं का इस्तेमाल करती है। विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच, विरोध प्रदर्शनों पर कारवाई और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वालों के विरुद्ध कठोर रवैये की शिकायतें राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती रही हैं। जांच एजेंसियों की कारवाई को लेकर उठते सवाल इस राजनीतिक बहस को और गंभीर बनाते हैं। 2014 के बाद ईडी की जांच के दायरे में आये राजनेताओं में ज्यादातर विपक्षी दलों से जुड़े रहे हैं। इससे जांच एजेंसी के राजनीतिक इस्तेमाल का सवाल खड़ा होता है। यह भी सबके सामने है कि केंद्रीय एजेंसियों की भ्रष्टाचार संबंधी जांच का सामना कर रहे ज्यादातर नेता भाजपा में शामिल हुए है और उन्हे भाजपा में शामिल होने के बाद राहत मिली या उनकी जांच ठहर गई है। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को केवल कांग्रेस के नेताओं की जांच तक सीमित न रखकर संस्थाओं की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से जोड़ा है।
हालांकि आज देश की राजनीति केवल चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। जनता के सामने रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार के सवाल भी उतने ही बड़े हैं। आज परिवारों की खर्च क्षमता, युवाओं के लिए स्थायी रोजगार और महिलाओं की कामकाजी भागीदारी पर गंभीर चर्चा की जरूरत हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रा में भी जवाबदेही जरूरी है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, दवाओं, जांच सुविधाओं और बुनियादी ढांचे की उपलब्धता पर जनता के सवाल बने हुए हैं। विपक्ष को यह बताना होगा कि वह रोजगार कैसे बढ़ाएगा, महंगाई से राहत कैसे देगा, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक निवेश कैसे बढ़ाएगा और जांच एजेंसियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए कौन से संस्थागत सुधार करेगा। जनता को केवल विरोध का मंच नहीं, शासन का वैकल्पिक खाका भी चाहिए। यही वह जगह है जहां राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका की असली परीक्षा होगी। रामलीला मैदान की रैली ने विपक्षी दलों को एक साझा मुद्दे पर एकत्रा कर और सरकार से जवाबदेही मांगने के लिए राष्ट्रीय मंच तैयार कर दिया है। अब इस पहल को विश्वसनीय नीतिगत विकल्प में बदलना उसकी परीक्षा है।