सरकार पर भारी पड़ेंगे चुनाव आयोग पर उठते सवाल

Created on Wednesday, 07 October 2026 12:41
Written by Shail Samachar
एक समय ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर श्री लाल कृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में उठे सवाल आज मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके सहयोगी की आयुक्तों के गिरेबान तक पहुंच गये हैं। कभी यह बहस ईवीएम की विश्वसनीयता तक सीमित थी। आज सवाल ईवीएम से आगे बढ़कर मतदाता सूची, वोट चोरी के आरोप, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता तक पहुंच गया है। जब करोड़ों मतदाताओं के मतदान अधिकार को लेकर आशंका व्यक्त की जा रही हो और चुनावी प्रक्रिया पर ही अविश्वास बढ़ रहा हो, तब इसे सामान्य राजनीतिक विवाद मानकर टालना लोकतंत्रा के लिए गंभीर भूल होगी।
ईवीएम को लेकर 18 लाख मशीनों के कथित रूप से गायब होने जैसे दावे भी सार्वजनिक बहस में आए हैं। मतदाता सूची का एसआईआर भी इसी कारण संवेदनशील विषय है। चुनाव आयोग की स्वतंत्राता का प्रश्न भी यहीं खड़ा होता है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और जवाबदेही से जुड़े प्रावधानों को लेकर पहले से राजनीतिक विवाद है। चुनाव आयोग सरकार के अधीन कोई विभाग नहीं, संविधान के तहत स्थापित स्वतंत्रा संस्था है। चुनाव आयोग की ताकत उसके अधिकारों में नहीं, उसकी निष्पक्षता में है। सरकार से यह सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी जिसने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर ही बहस खड़ी कर दी? यदि संस्था पूरी तरह स्वतंत्र है तो उसे अपनी स्वतंत्रता साबित करने में संकोच क्यों होना चाहिए?
यह अविश्वास अचानक पैदा नहीं हुआ। पिछले वर्षों में सत्ता की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल हुआ। सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज किया। लेकिन जनता के सामने एक विचित्र राजनीतिक तस्वीर जरूर बनी जिन नेताओं को कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का चेहरा बनाकर पेश किया गया, उनमें से कई बाद में सत्ता पक्ष के साथ खड़े दिखाई दिए। सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार की परिभाषा भी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदल जाती है? यदि कोई नेता सत्ता के बाहर रहते हुए भ्रष्ट है तो सत्ता के साथ आते ही पाक-साफ कैसे हो जाता है? यदि जांच एजेंसियां वास्तव में स्वतंत्र हैं तो उनकी कारवाई का राजनीतिक समय और राजनीतिक परिणाम इतने सवाल क्यों पैदा करते हैं? इन सवालों का जवाब सत्ता को देना होगा।
इसी तरह रोजगार का सवाल है। दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष देने का वादा युवाओं की उम्मीदों का बड़ा आधार था। लेकिन आज लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, अस्थायी नौकरियों और बेरोजगारी के बीच अपना भविष्य तलाश रहे हैं। शिक्षा, जो कभी सामाजिक बराबरी का सबसे मजबूत हथियार थी, आज लगातार महंगी होती जा रही है। परीक्षा व्यवस्थाओं में प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं ने युवाओं का भरोसा तोड़ा है। जिस युवा ने वर्षों मेहनत करके परीक्षा की तैयारी की, उसके लिए प्रश्नपत्र लीक होना केवल एक परीक्षा का संकट नहीं, बल्कि उसके पूरे भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
देश की अर्थव्यवस्था को लेकर भी सवाल हैं। कर्ज बढ़ता गया। सरकारें विकास के लिए कर्ज लेती हैं, यह आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जनता पूछ रही है कि बढ़ते कर्ज का लाभ उसके जीवन में कितना दिखाई दे रहा है? रोजगार कहां है? शिक्षा सस्ती क्यों नहीं हुई? स्वास्थ्य व्यवस्था पर खर्च क्यों पर्याप्त नहीं है? आम परिवार की आय और खर्च के बीच अंतर क्यों बढ़ रहा है? दूसरी ओर बड़े उद्योग समूहों को मिली कर्ज राहत और बट्टे खाते में डाली गई रकम को लेकर विपक्ष के सवालों का उत्तर सार्वजनिक होना चाहिए।
युवा पीढ़ी इन तमाम सवालों को जोड़कर देख रही है। उसे महंगी शिक्षा, सीमित रोजगार, परीक्षा व्यवस्थाओं की खामियां और संस्थाओं की स्वतंत्रता पर उठते सवाल एक ही तस्वीर का हिस्सा दिखाई देते हैं। व्यावसायिक शिक्षा का बढ़ता बाजारीकरण भी इसी असुरक्षा को बढ़ाता है। जब शिक्षा हासिल करना महंगा हो और उसके बाद रोजगार की गारंटी न हो तो असंतोष स्वाभाविक है।
इसी पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग आज राजनीतिक बहस के केंद्र में है। लोकतंत्र में असहमति को दबाने के बजाय उसके कारणों का जवाब देना पड़ता है। बल प्रयोग इसका विकल्प नहीं है। सरकार यदि इस असंतोष को दबाने के लिए बल प्रयोग का रास्ता अपनाने की सोच रही है तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि आज स्थिति उस सीमा से आगे निकल चुकी है। पुलिस की ताकत से भीड़ हटाई जा सकती है, लेकिन सवाल नहीं हटाए जा सकते। गिरफ्तारियों से आवाज कुछ समय के लिए धीमी की जा सकती है, लेकिन विश्वास वापस नहीं लाया जा सकता। लोकतंत्र में असहमति को कुचलना आग बुझाना नहीं, उसे भीतर दबाना है। इसलिए आज सत्ता को यह तय करना होगा कि वह असंतोष को दबाने का रास्ता चुनेगी या अविश्वास दूर करने का।
नई पीढ़ी के सामने अपना भविष्य है। वह देख रही है कि शिक्षा महंगी है, रोजगार सीमित हैं, प्रतियोगी परीक्षाएं विवादों में हैं और राजनीतिक व्यवस्था में संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। इसलिए उसका असंतोष केवल किसी सरकार के खिलाफ नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें उसे अपना भविष्य असुरक्षित दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि आज चुनाव आयोग पर सवाल उठना केवल विपक्ष की राजनीतिक रणनीति मानकर खारिज करना आत्मघाती भूल होगी।