बढ़ते कर्ज से दशकों की वित्तीय नीतियों पर उठे सवाल

Created on Saturday, 03 October 2026 10:49
Written by Shail Samachar
हिमाचल प्रदेश की कर्ज कहानी को किसी एक सरकार या एक राजनीतिक दल के खाते में डालकर खत्म नहीं किया जा सकता। यह दशकों में लिए गए आर्थिक फैसलों, विकास की प्राथमिकताओं और सरकारी खर्च की नीतियों का परिणाम है। इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं कि प्रदेश पर कितना कर्ज है, बल्कि यह है कि दशकों की उधारी से हिमाचल ने क्या हासिल किया और अपनी वित्तीय आत्मनिर्भरता क्यों नहीं बना पाया।
समय के साथ हिमाचल में सड़क नेटवर्क बढ़ा, बिजली परियोजनाएं बनीं, उद्योग आए, पर्यटन और बागवानी का विस्तार हुआ तथा सरकारी संस्थानों का ढांचा मजबूत हुआ। प्रदेश के पास अब कई ऐसे क्षेत्र हैं जो लगातार आर्थिक गतिविधि और राजस्व पैदा करते हैं। इसके बावजूद यदि सरकार को अपने वित्तीय दायित्वों के लिए लगातार नई उधारी की जरूरत पड़ रही है तो सवाल विकास की मात्रा से ज्यादा उसकी वित्तीय गुणवत्ता पर उठता है। किसी परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से तय नहीं होती। यह भी देखना जरूरी है कि उससे कितनी आर्थिक गतिविधि, रोजगार, उत्पादन या सरकारी आय बढ़ी। हर सरकार को कर्ज के उपयोग और परिणाम का हिसाब देना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि उससे बनी परिसंपत्तियां कितना आर्थिक लाभ दे रही हैं और सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नई उधारी प्रदेश की आय बढ़ाने में कितनी भूमिका निभाएगी।
निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए हिमाचल में समय-समय पर औद्योगिक नीतियां बनाई गईं। उद्योगों को जमीन, बिजली और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। लेकिन इस वित्तीय नीति से प्रदेश को कितना स्थायी राजस्व मिला। उद्योगों को दिए गए प्रोत्साहनों के मुकाबले राज्य की अपनी आय कितनी मजबूत हुई इसका भी मूल्यांकन जरूरी है।
जलविद्युत के मामले में भी यही सवाल है। मुद्दा बिजली परियोजनाओं की उपयोगिता नहीं, बल्कि बिजली से मिली आय के दीर्घकालीन प्रबंधन का है। क्या इस आय को ऐसी परिसंपत्तियों में लगाया गया, जो भविष्य में और आय पैदा करतीं?
कर्ज तब गंभीर चुनौती बनता है जब सरकार की अपनी आय का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज और अन्य अनिवार्य खर्चों में चला जाये। इसलिए अब बहस केवल कर्ज की रकम पर नहीं, कर्ज की उत्पादकता पर होनी चाहिए। हिमाचल में सरकार-दर-सरकार आरोप लगाने के बजाये पिछले दशकों की वित्तीय नीतियों का मूल्यांकन जरूरी है। यह देखा जाना चाहिए कि किस दौर में कितनी उधारी हुई, उसका कितना हिस्सा पूंजीगत परिसंपत्तियों पर लगा, कितनी परियोजनाओं से वास्तविक आय पैदा हुई और कितना खर्च ऐसा था जिसने भविष्य में कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं दिया। इससे यह स्पष्ट होगा कि कौन-से फैसले प्रदेश की आर्थिक क्षमता बढ़ाने वाले थे और किन फैसलों का वित्तीय बोझ आज भी बजट पर बना हुआ है। हर बड़ी उधारी का उद्देश्य, अपेक्षित आर्थिक लाभ और भुगतान की क्षमता स्पष्ट होनी चाहिए। हिमाचल कि जनता को यह बताने की जरूरत नहीं कि कर्ज कितना बढ़ा। उसे यह बताना होगा कि दशकों की उधारी ने प्रदेश को कितना मजबूत किया, अपनी आय क्यों पर्याप्त नहीं बन सकी और आज भी नई उधारी की जरूरत क्यों पड़ रही है। यही सवाल हिमाचल की आर्थिक नीतियों और सत्ता में रही सरकारों की जवाबदेही तय करेगा।