ब्रिक्स सम्मेलन ने एक बात साफ कर दी है कि दुनिया की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। कभी अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का दबदबा माना जाता था, लेकिन अब चीन, रूस, भारत और दूसरे देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इस बदलती तस्वीर में भारत की स्थिति सबसे अहम है। भारत न तो किसी एक देश के दबाव में है और न ही किसी एक खेमे का हिस्सा बनना चाहता है।
ब्रिक्स का मंच भारत के लिए अपनी ताकत दिखाने का बड़ा मौका है। यहां भारत ने साफ संदेश दिया है कि दुनिया के विकासशील देशों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आतंकवाद, आर्थिक सहयोग, तकनीक, ऊर्जा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर भारत की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन असली सवाल यह है कि सम्मेलन में हुई बातें जमीन पर कितनी उतरती हैं।
ब्रिक्स में कई ऐसे देश हैं जिनके अपने-अपने हित हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद रहा है। रूस का पश्चिमी देशों के साथ टकराव चल रहा है। पश्चिम एशिया के देशों की अपनी समस्याएं हैं। ऐसे में सभी देशों को एक साथ लेकर चलना आसान नहीं है। अगर ब्रिक्स केवल बैठक करने और बयान जारी करने तक सीमित रहा तो इसका कोई बड़ा फायदा नहीं होगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन को लेकर है। चीन के साथ बातचीत जरूरी है, लेकिन अपनी सुरक्षा से समझौता करके नहीं। दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिश होनी चाहिए, लेकिन भारत को अपनी सीमा, सुरक्षा और आर्थिक हितों पर पूरी मजबूती से खड़ा रहना होगा। दोस्ती की बात अपनी जगह है और राष्ट्रीय हित अपनी जगह।
आर्थिक मोर्चे पर भी ब्रिक्स के सामने बड़ी चुनौती है। कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और नई भुगतान व्यवस्था बनाने की चर्चा भी हो रही है। लेकिन केवल डॉलर के खिलाफ बोलने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए मजबूत आर्थिक व्यवस्था और देशों के बीच ज्यादा व्यापार जरूरी है।
यहीं भारत के लिए बड़ा मौका है। दुनिया अब चीन पर अपनी जरूरतों के लिए पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहती। कंपनियां नए देशों में निवेश के रास्ते तलाश रही हैं। भारत के पास बड़ा बाजार, युवा आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। अगर भारत सही नीतियां बनाए तो विनिर्माण, तकनीक, दवा, रक्षा, ऊर्जा और डिजिटल क्षेत्र में बड़े निवेश हासिल कर सकता है।
लेकिन इसके लिए भारत को सिर्फ सम्मेलन में भाषण देने से आगे बढ़ना होगा। दुनिया में प्रभाव उसी देश का होता है जिसकी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, जो अपनी जरूरत की चीजें खुद बना सकता है और जिसके पास तकनीक तथा सुरक्षा की ताकत होती है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह अलग-अलग देशों के साथ संबंध रख सकता है। अमेरिका के साथ भी संबंध, रूस के साथ भी बातचीत और चीन के साथ भी संवाद—भारत ने यह संतुलन बनाए रखा है। यही भारत की विदेश नीति की खासियत है। लेकिन संतुलन का मतलब यह नहीं कि कोई भी देश भारत पर अपनी शर्तें थोप सके।
ब्रिक्स भारत को दुनिया में अपनी भूमिका और मजबूत करने का अवसर देता है। लेकिन अब समय केवल उपलब्धियां गिनाने का नहीं है। भारत को यह दिखाना होगा कि वह विकासशील देशों की आवाज उठाने के साथ-साथ उनके लिए ठोस काम भी कर सकता है।
ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है। अब असली परीक्षा सम्मेलन खत्म होने के बाद है। अगर फैसले जमीन पर उतरते हैं, व्यापार और निवेश बढ़ता है और भारत अपनी आर्थिक व रणनीतिक ताकत को आगे ले जाता है, तभी यह सम्मेलन सफल माना जाएगा। वरना बड़ी-बड़ी बातें और चमकदार तस्वीरें कुछ समय बाद खबरों की भीड़ में खो जाएंगी।
दुनिया बदल रही है। भारत के पास आगे बढ़ने का मौका है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारत दुनिया में कितना सुना जा रहा है, सवाल यह है कि भारत अपने हितों के लिए दुनिया में कितना असर पैदा कर सकता है।