सत्ता बदलती रही कर्ज का मॉडल नहीं बदला

Created on Wednesday, 09 September 2026 13:17
Written by Shail Samachar
कैग रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि हिमाचल प्रदेश की वित्तीय समस्या अचानक पैदा नहीं हुई। पिछले कई वर्षों में सरकारें जिस तरीके से खर्च, कर्ज और राजस्व का प्रबंधन करती रही हैं, उसने हिमाचल को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है जहां नया कर्ज विकास के लिए कम और पुराने कर्ज तथा ब्याज का बोझ संभालने के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। यह सिर्फ किसी एक सरकार की विफलता नहीं, बल्कि लगातार चली आ रही उस राजनीतिक अर्थव्यवस्था की नाकामी है जिसमें फैसले तो लिए गए, लेकिन उनकी दीर्घकालिक कीमत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। आज राज्य की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव बना हुआ है। सरकार की आय और खर्च के बीच ऐसा संतुलन नहीं बन पा रहा है जिससे कर्ज का बोझ स्थिर हो सके। पुराने दायित्व चुकाने में ही उधार का बड़ा हिस्सा खप रहा है। कर्ज अगर उत्पादक संपत्ति बनाने के बजाये पुराने कर्ज को चुकाने में लगने लगे तो वह विकास का साधन नहीं, आर्थिक जाल बन जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर लगातार सरकारों ने ऐसी स्थिति बनने क्यों दी? वेतन, पेंशन और ब्याज पर सरकार की आय का बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है। जब इसमें सब्सिडी जैसे कठोर खर्च भी जुड़ते हैं तो विकास के लिए सरकार के पास बहुत सीमित पैसा बचता है। यही कारण है कि पूंजीगत निवेश कमजोर पड़ता है और नई योजनाओं के लिए फिर कर्ज का सहारा लेना पड़ता है।
हिमाचल बिजली राज्य होने के बावजूद इससे राज्य की अपनी आय कितनी मजबूत हुई? बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथ में है। सीमेंट उद्योग राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से चलता है, उससे आर्थिक लाभ और स्थानीय रोजगार कितना बढ़ा? पर्यटन हिमाचल की सबसे बड़ी संभावनाओं में है, मगर इसकी अर्थव्यवस्था को भी बड़े पैमाने पर निजी निवेश पर छोड़ दिया गया। सरकारी संस्थान और निगम कमजोर होते गये और रोजगार के लिए आउटसोर्सिंग बढ़ती गई। अगर सरकार के पास संसाधन हैं, जमीन है, पानी है, पर्यटन है और मानव संसाधन है, फिर भी राजस्व बढ़ाने के बजाय कर्ज बढ़ रहा है तो सवाल विकास की दिशा पर उठेगा ही।
राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों की स्थिति भी सरकारों की आर्थिक सोच पर सवाल खड़े करती है। नुकसान में चल रही संस्थाओं की कार्यक्षमता सुधारने, पुनर्गठन करने या आवश्यक होने पर कठोर निर्णय लेने के बजाये उन्हें लंबे समय तक ढोने का मॉडल आखिर कब तक चलेगा?
यहां सरकार बदलने से समस्या अपने आप नहीं बदलेगी। क्या कांग्रेस या भाजपा की पिछली सरकारों ने हिमाचल को कर्ज पर चलने वाली अर्थव्यवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई ठोस मॉडल बनाया? क्या राजस्व के नए स्रोत तैयार किए गए? क्या घाटे वाले संस्थानों पर कठोर फैसले हुए? क्या सब्सिडी को राजनीतिक सुविधा के बजाये आर्थिक क्षमता से जोड़ा गया? क्या बिजली, उद्योग और पर्यटन से राज्य की अपनी आय बढ़ाने की रणनीति बनी?
अब सत्ता में रही हर सरकार हिसाब जनता को देने का समय आ गया है कि उसके कार्यकाल में कर्ज के बदले प्रदेश को कौन-सी स्थायी संपत्ति बनी, कितनी योजनाओं ने आय पैदा की और कितने सरकारी निवेश ने वास्तव में राज्य की वित्तीय ताकत बढ़ाई।
हिमाचल का कर्ज कम करने के लिए सरकारों को खर्च की प्राथमिकताएं बदलनी होंगी, गैर-उत्पादक व्यय पर लगाम लगानी होगी, सरकारी संस्थानों की जवाबदेही तय करनी होगी और बिजली, पर्यटन, उद्योग, खनन तथा अन्य संसाधनों से मिलने वाली आय को मजबूत करना होगा। सरकार को नई घोषणायें करने से ज्यादा ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनानी होगी जो घोषणाओं का खर्च खुद उठा सके। सवाल सिर्फ आज की सरकार से नहीं, उन सभी सरकारों से है जिन्होंने वर्षों तक कर्ज को आसान रास्ता और आर्थिक सुधार को कठिन रास्ता माना। कर्ज लेकर सरकार चलाना शासन हो सकता है, लेकिन आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था नहीं।