शिमला/बलदेव शर्मा
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ आय से अधिक संपति और मनीलाॅंडरिग मामलों में सह अभियुक्त बने आनन्द चौहान 8 जुलाई से गिरफ्तार हैं। आनन्द की गिरफ्तारी को ईडी ने मनीलाॅंडरिग प्रकरण में अंजाम दिया है। ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें जमानत न दिये जाने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा इसके लिये खटखटाया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी जमानत याचिका पर अब सुनवाई 6 जनवरी को रखी है। इससे पहले यह मामला 2 नवम्बर को लगा था और उस दिन सीबीआई को इस पर जवाब दायर करने के लिये कहा गया था। सीबीआई को जबाव के लिये चार सप्ताह का समय दिया गया था। सीबीआई को जमानत मामले में चार सप्ताह का लंबा समय दिया जाना आनन्द चौहान की नजर में ज्ज का झुकाव अभियुक्त की ओर न होकर सीबीआई की ओर होने का प्रमाण है। इसी समय दिये जानेेे को आनन्द चौहान ने मामले की सुनवाई कर रहे ज्ज जस्टिस विपिन सांघी और भारत सरकार के आर्टानी जनरल मुकुल रोहतगी की आपस में रिश्तेदारी होने को भी इसी आईनेे में देखते हुए इसे ज्ज का सीबीआई के प्रति झुकाव होने का प्रमाण मान लिया। इसी कड़ी में कभी भाजपा सरकार के शासनकाल में वीरभद्र से जुडे़ किसी मामले में मुकुल रोहतगी द्वारा दी गई कानूनी राय को भी इसी के साथ जोड़कर यह धारणा बना ली की जज जानबूझ कर सीबीआई की मदद कर रहे हैं और उसे राहत नही देंगे। इसी धारणा के साये में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायधीश और दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश को अपने भतीजे सौरभ चौहान के माध्यम से पत्र भेजकर जस्टिस सांघी की बजाये किसी अन्य जज को मामले की सुनवाई दी जाये की गुहार लगायी गयी है। आनन्द चौहान की धारणा पर अपनी मोहर लगाते हुए वीरभद्र ने भी इसके साथ अपना पत्र जोड़ दिया है। अदालत आनन्द चौहान और वीरभद्र के पत्रों का क्या संज्ञान लेती है या इन्हे नजर अंदाज कर दिया जाता है यह तो आने वाले समय में स्पष्ट होगा बहरहाल जस्टिस सांघी की कोर्ट में इस पत्र के बाद भी वीरभद्र के सी.बी.आई. मामले की सुनवाई जारी है और 15 दिसम्बर को इसमें वीरभद्र प्रत्युत्तर देंगे।
स्मरणीय है कि सीबीआई में वीरभद्र सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपति और ईडी में मनीलाॅंडरिग के तहत मामले चल रहे हैं। इन मामलों में प्रतिभा सिंह आनन्द चौहान और चुन्नी लाल सह अभियुक्त हैं । सीबीआई आय से अधिक संपति का प्रकरण देख रही है इसमें आरोप है कि जब वीरभद्र केन्द्र में मन्त्री थे उस दौरान जो संपति उन्होने अर्जित की है वह उनकी उस समय की आय से कहीं अधिक है इस संपति में ग्रटेर कैलाश में लिया गया मकान, महरोली का फाॅर्म हाऊस और करीब एक दर्जन से अधिक एलआइसी पालिसियां शामिल हैं। आय से अधिक संपति प्रकरण में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज करकेे वीरभद्र केआवास तथा अन्य स्थानों पर छापामारी की थी। इस छापामारी और दर्ज हुई एफआईआर को हिमाचल उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। हिमाचल उच्च न्यायालय ने सीबीआई पर कुछ प्रतिबन्ध लगाते हुए मामले की जांच जारी रखने के निर्देश दिये। सीबीआई ने हिमाचल उच्च न्यायालय के निर्देशों को चुनौती सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला ट्रांसफर करने की गुहार लगा दी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए मामला दिल्ली उच्च न्यायालय को ट्रांसफर कर दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने छःअप्रैल को वीरभद्र और प्रतिभा सिंह को जांच में शामिल होने के निर्देश देते हुए मामले की जांच पूरी करने के आदेश दिये। इसके बाद सीबीआई ने मामले की जांच पूरी करके दिल्ली उच्च न्यायालय से इसमें चालान दायरे करने की अनुमति दिये जाने का आग्रह कर दिया। सीबीआई के इस आग्रह पर आदेश होने से पूर्व वीरभद्र की लंबित याचिका का निपटारा किया जाना आवश्यक है जिसके कारण सीबीआई पर कुछ प्रतिबन्ध लगे थे। अब इस याचिका पर सुनवाई चल रही है। वादी और प्रतिवादी सभी अपना पक्ष रख चुके हंै। अब प्रत्युत्तर के लिये 15 को यह मामला लगा है। इसमें दोनों पक्षोें द्वारा अपना पक्ष रखने के बाद जज की निष्ठा पर सवाल उठाया गया है। कानून के जानकारों की राय में इस तरह की आपति मामले की सुनवाई शुरू होने से पहले आनी चाहिये थी। फिर सीबीआई प्रकरण में आनन्द चौहान की भूमिका समिति है।
दूूसरी ओर मनीलाॅडरिंग की जांच में आनन्द चौहान की भूमिका प्रमुख है और इसी में उसकी गिरफ्तारी हुई है। इसमें ईडी ने मार्च में करीब आठ करोड़ की संपति की अटैचमैन्ट की थी। आरोप है कि वीरभद्र ने अपने ही अवैध धन को आनन्द चौहान के माध्यम से बागीचे की आय और एलआईसी की पालिसियां लेकर वैध बनाने का प्रयास किया है। ग्रटेर कैलाश की संपति अर्जित करने में इसी धन का निवेश हुआ है। इसी के साथ महरौली फाॅर्म हाऊस की खरीद में इसमें से कुछ धन का निवेश हुआ है। मार्च के अटैचमैन्ट आदेश में स्पष्ट लिखा है कि वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर और महरौली फाॅर्म हाऊस को लेकर जांच पूरी नही हुई है। आनन्द चौहान के खिलाफ जब चालान दायर किया गया था तो उसमें भी अनुपूरक चालान दायर करने की बात कही गयी है। अब जब आनन्द चौहान अपनी जमानत को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में पहुंच चुका है तब ईडी पर शेष बची जांच को पूरा करके अनुपूरक चालान जल्द दायर करने का दबाव आ जाता है। जानकारों के मुताबिक इसमें भी महरौली फाॅर्म हाऊस को लेकर एक और अटैचमैन्ट आदेश आ सकता है। फिर किसी की गिरफ्तारी की संभावना हो सकती है। क्योंकि आनन्द चौहान का तो तर्क ही यह है कि इस सबमें वह लाभार्थी नही है और लाभार्थी अभी भी जेल से बाहर है। आनन्द की जमानत याचिका और वीरभद्र आनन्द के जज की निष्ठा को लेकर लिखे गये पत्रों से ईडी पर शेष बची जांच को शीघ्र पूरा करने का दवाब आ गया है और यह सब वीरभद्र के लिये अन्ततः घातक सिद्ध हो सकता है।
आनन्द और वीरभद्र के पत्र





शिमला। मुख्यमन्त्रीे कार्यालय से मुख्यमन्त्रीे का डीओ लेटर पैड चुराकर उसके माध्यम से कर्मचारियों के तबादले करवाये जाने के मामले में अन्ततः पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाने की स्थिति घट चुकी है। फर्जी डीओ लेटर काण्ड में कर्मचारियों के सैंकडा़े तबादलें करवाये गये थे। इस काण्ड में अब पुलिस ने संजय गुलेरिया की गिरफ्तारी को अंजाम दिया है। लेकिन इस गिरफ्तारी के साथ ही सीएम आॅफिस से एक तबदला रैकेट चलाये जाने का आरोप लग गया है। आरोप है कि तबादला काण्ड के तार सीएम आॅफिस के साथ-साथ नाहन से भी जुडे़ हैं।
तबदला रैकेट का यह आरोप राजपूत सभा नाहन के अध्यक्ष और राज्य बिजली बोर्ड से सेवानिवृत एसडीओ दिनेश चैहान ने लगाये है। दिनेश चैहान ने बाकायदा शिमला में एक पत्रकार वार्ता आयोजित करके नाहन के सैणी बन्धुओं पर मुख्यमन्त्रीे कार्यालय के कुछ बाबूओं के साथ मिलकर इस रैकेट को अंजाम देने का आरोप लगाया है। आरोप है कि प्रति तबदला 15 हजार रूपया लिया जाता है यह पैसा नाहन के पीएनबी बैंक के खाता नम्बर 4588000400003305 में जमा होता है और शिमला में निकाल लिया जाता है। इस तबदला काण्ड में सैणी बन्धुओं के साथ एक थापा नाम के कर्मचारी के भी शामिल रहने का आरोप है। चैहान ने खुलासा किया है कि एक ही छत के नीचे काम कर रहे 28 में से 11 कर्मचारियों का तबदला कर दिया गया जो कि तबदला नीति के खिलाफ है।
चैहान का आरोप है कि 7 जनवरी 2016 को यह पूरा काण्ड एडीजीपी विजिलैन्स के संज्ञान में लाया गया था। उन्हें 11 कर्मचारियों के तबादले की सूची देकर इस काण्ड की जांच की मांग की गयी थी। इस संद्धर्भ में विजिलैन्स को लिखी चिट्ठी भी मीडिया के सामने रखी गयी। लेकिन विजिलैन्स ने अभी तक कोई कारवाई नही की है। इसके बाद 18 जुलाई को मुख्यमन्त्रीे के नाहन दौरे के दौरान 80 लोगों ने उनसे मिलकर इस काण्ड के बारे में उन्हें जानकारी दी थी। लेकिन फिर भी इस संबंध में कोई जांच अब तक नही होे पायी है।
चैहान ने ऐलान किया कि यदि अब भी इसमें जांच नही होती है तोे वह इस प्रकरण को राज्यपाल के संज्ञान में लायेंगे। राज्यपाल के ध्यान में लाने के बाद कुछ नही होता है तब इसमें अदालत का दरवाजा खटखटायेंगे।


शिमला। प्रदेश के निजि शिक्षण संस्थानों पर शिक्षा का बाजारीकरण करने के आरोप एक अरसे से लगते आ रहे हंै। इन्ही आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हिमाचल सरकार ने प्रदेश में इन संस्थानों के लिये एक नियामक आयोग का गठन किया हुआ है। बल्कि प्रदेश के एक निजि शिक्षण संस्थान का मामला जब सर्वोच्च न्यायालय तक पंहुचा था तब शीर्ष अदालत ने भी इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए एक एसआईटी का गठन किया था। यह एसआईटी भी पिछले छःमाह से प्रदेश में कार्यरत है। लेकिन इस सबके बावजूद कई निजि शिक्षण संस्थान लोगों की आंखों में धूल झोकंने और छात्रों से लाखों की फीस बटोरने के धन्धे में लगे हुए है। राजधानी शिमला के उपनगर संजौली में स्थित हैरिटेज इंस्टीच्यूट आॅफ होटल एण्ड मैनेजमैन्ट को नियामक आयेाग ने इस अवैधता का दोषी पाते हुुए उसे तुरन्त प्रभाव से बन्द किये जाने के आदेश जारी किये है। इस संद्धर्भ में उत्तर प्रदेश की हैरिटैज ऐजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष को नोटिस जारी करते हुए आयोग के सदस्य सुनील दत्त ने दस दिनों के भीतर इन आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के आदेश जारी किये हैं।
इस मामले मेे सुनवाई करते हुए आयोग ने पाया कि होटल मैनेजमैन्ट और केटरिंग में जो बीएससी की डिग्री मदुरैये के कामराज विश्वविद्यालय एमकेयू से 21 हजार रूपये में होती है उसके लिये यहां छात्रों से 2,58,505 रूपये वसूले जा रहे थे। जो डिप्लोमा वहां आठ हजार में होता है उसके लिये यहां पर 45650 रूपये लिये जा रहे थे।
इस शिक्षण संस्थान को चला रही सोसायटी केआठ सदस्य हैं लेकिन हिमाचल से एक भी नही है। जबकि प्रदेश में अपना काम चलाने के लिये यहां से भी कुछ सदस्य होने चाहिये थे। नियामक आयोग के मुताबिक यह इंस्टीच्यूट रैगुलर कोर्स चलाने जैसे भ्रामक विज्ञापन देकर छात्रों को यहां आने के लिये प्रलोभित करता है। जबकि सही मायनों में यह एक स्टडी सैन्टर भी नहीं है। केवल छात्रों से पैसा बनाने का धंधा चलाया जा रहा था। इस संस्थान को यहां चलाने के लिये राज्य सरकार से भी कोई अनुमति नही ली गयी है। माना जा रहा है कि प्रदेश में ऐसे और भी कई संस्थान हो सकते हंै।
290 प्राईमरी,196 अप्पर प्राईमरी
और सकैण्डरी स्कूलों के पास केवल एक-एक कमरा
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठता के लिये पिछले दिनों एक मीडिया ग्रुप ने दिल्ली में आवार्ड प्रदान किया है। मुख्यमंत्री के नाम पर इस आवार्ड समारोह में उद्योग मन्त्री मुकेश अग्निहोत्री शामिल हुए थे और उन्होने यह आवार्ड ग्रहण किया था। जिस दौरान यह आवार्ड समारोह आयोजित हुआ था उसी दौरान प्रदेश कई भागों से यह समाचार भी आये थे कि कहीं पर छात्रों ने अध्यापकों की कमी के कारण सामूहिक रूप से स्कूल छोड़ दिया या अभिभावकों ने जाकर स्कूल ही बन्द कर दियं यह स्थिति माध्यमिक शिक्षा की थी।
इसके मुकाबले में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति तो और भी निराशाजनक रही है। प्रदेश में हजारों स्कूल ऐसे हैं जो कहीं अध्यापकों के संख्या मानदण्ड पूरे नही करते तो कंही छात्रों की संख्या के मानदण्ड पूरे नही करते हैं। जबकि एक प्राथमिक स्कूल से लेकर कालिज खोलने तक मानदण्ड तय हैं। लेकिन इन मानदण्डो की अनदेखी करते हुए स्कूल खोल दिये गये। शिक्षा के प्रचार के लिये आप्रेशन ब्लैक बोर्ड से लेकर सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय उच्च अभियान जैसे जो भी कार्यक्रम केन्द्र सरकार की ओर से समय-समय पर आये उनमें पहली प्राथमिकता नये शिक्षण संस्थान खोलने की रही है और इसमें तय मानदण्डों की जमकर अनदेखी हुई है। इस अनदेखी के परिणाम स्वरूप आज सरकार को शून्य से पांच की संख्या तक के 99 प्राथमिक स्कूल बन्द करने के आदेश जारी करने पड़े हैं। इन स्कूलों को बन्द करने के लिये यह सुनिश्चित किया गया है इनके एक से डेढ़ किलोमीटर के दायरे में दूसरा स्कूल उपलब्ध रहे। ताकि बन्द किये स्कूल के बच्चे और अध्यापक उस निकट के स्कूल में समायोजित किये जा सकें।
शिक्षा का सूरते हाल
लेकिन इसके अतिरिक्त 290 प्राईमरी 196 अप्पर प्राईमरी और चार सकैण्डरी स्कूल ऐसे हैं जिनके पास कवेल एक-एक ही कमरा है। एक कमरे में कैसे सुचारू रूप से अध्यापन हो सकता है इसका अनुमान कोई भी लगा सकता है। स्वभाविक है कि यह स्कूल खोलते समय केवल राजनीति ही प्रभावी रही है बच्चों का भविष्य नही। आज भी मुख्यमंत्री अपने हर दौरे में स्कूल घोषित करते जा रहे हैं ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब पहले खोले गये स्कूलों में ही भवन आदि की कमी है तो फिर नये स्कूलों की घोषणाएं क्यों की जा रही हैं।
एक से डेढ किलोमीटर दायरे का मानदण्ड रखकर जो 99 स्कूल बन्द किये गये हैं उनमें पन्द्रह स्कूल तो ऐसे हैं जहां पर बच्चों की संख्या शून्य थी। एक से दो की संख्या वाले इस सूची में 17 स्कूल हैं। छात्रों की इस संख्या से यह स्वभाविक सवाल उठता है कि यह स्कूल खोलते समय क्या सोचा गया होगा। अभी एक से डेढ़ किलोमीटर के मानदण्ड से बाहर भी सैंकडो स्कूल ऐसे है। जहां बच्चों की संख्या पांच तक ही है। एक ओर मुख्यमंत्री यह दावा कर रहे हैं कि जहां एक भी बच्चा पढ़ने वाला होगा वह वहां भी स्कूल खोलेंगे। इसी कड़ी में प्राईमरी स्कूल से ही अंग्रेजी भाषा पढ़ाने का दावा किया गया है। लेकिन इन दावों को पूरा करने के लिये स्कूलों अध्यापको की अपेक्षित संख्या की ही भारी कमी है। संभवतः इसी कमी को देखकर अब इस कार्यकाल के अन्तिम वर्ष में प्राईमरी अध्यापकों के चार हजार पद भरने की घोषणा की गयी है।



प्रदेश की वरिष्ठ नौकरशाही की कार्य प्रणाली सवालों में
शिमला/शैल। अभी 30 नवम्बर को सेवानिवृत होकर पहली दिसम्बर को मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव की पत्नी मीरा वालिया ने निजि शैक्षणिक संस्थानों के लिये बने रैगुलेटरी कमीशन में बतौर सदस्य पदभार ग्रहण कर लिया है। सदस्य के रूप में मीरा वालिया का चयन करीब पांच छः माह पहले हो गया था। लेकिन उन्होने ने सेवानिवृति के बाद ही नया पदभार संभालने को अधिमान दिया ताकि उन्हे इस आयोग में पूरे तीन वर्ष का कार्याकाल मिल जाये। मीरा वालिया के पदभार संभालने के साथ ही इस नियामक आयोग के सदस्यों की संख्या दो हो गयी है। लेकिन अभी तक इस आयोग के अध्यक्ष का पद खाली चल रहा है और करीब एक वर्ष से यह पद खाली है। इस पद को भरने के लिये अलग से आवेदन मांगने की आवश्कता होगी और इसके लिये इसे अलग से विज्ञापित करना होगा।
इस रैगुलेटरी कमीशन की तरह मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी करीब एक वर्ष से खाली चल रहा है। इस पद को भरने के लिये आवेदन भी आमन्त्रित कर लिये गये थे। लेकिन इसके चयन के लिये चयन कमेटी का गठन नही किया गया और यह पद खाली चल रहा है। मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल पांच वर्ष है और यह पद उच्च न्यायालय के न्यायधीश के समकक्ष है और यहां से सेवानिवृति के बाद उसी तर्ज पर उसे लाभ मिलते हैं इसलिये इस पद के लिये कई बड़ो की नजर रहना स्वभाविक है। इस पद के चयन के लिये जो कमेटी गठित होती है उसमे मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमन्त्री द्वारा मनोनीत एक वरिष्ठ मन्त्री/चयन बहुमत से होता है। तो स्वाभाविक है कि जिसे मुख्यमंत्री चाहेंगे वही इस पद को हासिल करेगा।
एक वर्ष से यह पद खाली चल रहा है। इसके लिये आवदेन आमन्त्रित कर लिये जाने के बाद भी चयन नही किया गया है। स्वाभाविक है कि इस पद पर किसी की नजर है जिसके लिये इस पद को अभी तक खाली रखा गया है। सचिवालय के गलियारों की चर्चाओं को यदि अधिमान दिया जाये तो इस पद पर मुख्य सचिव वीसी फारखा आयेंगे क्योंकि मुख्य सचिव के लिये जिस तरह से अपने वरिष्ठों को पछाड़ कर वह इस पद पर काबिज होने में सफल हुए हैं उससे यही संकेत उभरते हैं। फारखा के लिये इस पद को एक बार फिर विज्ञापित करना होगा क्योंकि उन्होने पहले इसके लिये आवदेन नही कर रखा है। माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया को पूरा होने में 2017 के मई जुन तक का समय लगा दिया जायेगा। क्योंकि इसा दौरान लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष का पद खाली होगा।
ऐसे में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष का पद मुख्य सूचना आयुक्त और रैगुलेटरी कमीशन के अध्यक्ष का पद सब एक साथ भरे जायेंगे और तीन विश्वस्तों को यहां बिठा दिया जायेगा। इसी के साथ नया मुख्य सचिव भी एक अन्य विश्वस्त बन जायेगा। इस सब में जो नाम चर्चा में चल रहे हैं उनमें सीआईसी के लिये फारखा लोक सेवा आयोग के लिये नरेन्द्र चौहान रैगुलेटरी कमीशन के लिये वी एन एस नेगी और मुख्य सचिव के लिये तरूण श्रीधर शामिल हैं। लेकिन कानूनी हल्कों में इन दिनों एक चर्चा यह चल रही है कि क्या कोई कमीशन अध्यक्ष के बिना हो सकता है। कानून के जानकारों के मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त बिना सूचना आयोग नही हो सकता। रैगुलेटरी कमीशन को तो पहले ही चुनौती दी जा चुकी है। प्राईवेट शैक्षणिक संस्थानों ने चुनौती दी है मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। इधर इतने समय तक इस पद के खाली रखे जाने से इस आयोग की आवश्यकता पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। फिर यही कहीं भाजपा ने प्रशासनिक अकर्मणयता के नाम पर इन खाली पदों पर दिये अपने आरोप पत्र में सवाल उठा दिया तो स्थिति एकदम बदल भी सकती है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय में प्रदेश सरकार उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील में गयी हुई है और सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर स्टे लगा रखा है। अब यह मामला कभी भी सुनवाईे के लिये आ सकता है। अब तक प्रदेश में जितने भी प्राईवेट विश्वविद्यालय खोलने के लिये हर विश्वविद्यालय के नाम से एक अलग से एक्ट लाया जाता है। अब तक प्रदेश मे जितने भी प्राईवेट विश्वविद्यालय खुले हैं उनके किसी के भी एक्ट में यह प्रावधान नही किया गया है कि यह विश्वविद्यालय नियामक आयोग द्वारा कंट्रोल किया जायेगा। अब जब इस आयोग के अध्यक्ष का पद ही करीब एक वर्ष से खाली चल रहा है तो सरकार इसकी अनिवार्यता का औचित्य कैसे प्रमाणित कर पायेगी। अब यह सवाल चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
इसी तरह अभी वीरभद्र सरकार ने पुलिस में सेवा निवृति से एक दिन पूर्व 1988 के बैच के आईपीएस अधिकारी वीएनएस नेगी को डीजीपी पदोन्नत करने से पूरे आईपीएस और आई ए एस हल्कों में यह पदोन्नति चर्चा का विषय बन गयी है। पुलिस में तो सबसे वरिष्ठ अधिकारी सोमेश गोयल ने तो वाकायदा अपना रोष व्यक्त करते हुए भारत सरकार के गृहमन्त्रालय को पत्र तक भेज दिया है। उनका आरोप है कि इन पदोन्नतियों में सर्विस नियमों की पूरी तरह अवहेलना की गयी है। सोमेश गोयल की वरियता को भी नजर अन्दाज करके उन्हे डीजीपी स्टेट नही बनाया गया था। उनके कनिष्ठ संजय कुमार को डी जी पी तैनात करते समय गोयल को भी डी जी पी प्रोमोट तो कर दिया गया परन्तु उन्हे अपैक्स स्केल नही दिया गया। अब नेगी को पदोन्नत करके उन्हे सेवा निवृति से पूर्व यह लाभ दे दिया गया है। इस समय पुलिस में डी जी पी स्तर के चार अधिकारी हो गये हैं।
दूसरी ओर आई पी एस 1988 बैच के अधिकारी को डी जी पी प्रोमोट करने से आई ए एस में भी इसी गणित पर पदोन्नतियों की मांग उठने की संभावना खडी हो गयी है। आई ए एस में अभी 1987 बैच के अधिकारियों को भी अतिरिक्त मुख्य सचिव नही बनाया गया है। 1987 बैच के ए जे वी प्रसाद भी सेवा निवृति के मुकाम पर पहुंच गये हैं इस नाते आई ए एस में भी पुलिस की तर्ज पर पदोन्नति की मांग उठना स्वाभाविक है।