Saturday, 20 June 2026
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इस कर्ज के आगाज का अन्जाम क्या होगा-उठने लगा है सवाल

शिमला/शैल। प्रदेश का वित्तीय वर्ष 2025-26 का बजट सत्र 28 मार्च को समाप्त हुआ है और सुक्खू सरकार को नये वित्तीय वर्ष में 2 अप्रैल को ही 900 करोड़ रुपए का कर्ज लेकर वर्ष की शुरुआत करनी पड़ी है। इस कर्ज के आगाज का अन्जाम क्या होगा यह प्रश्न इसलिये प्रसांगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वर्ष 2024-25 के अंतिम दिनों में ट्रेजरी बन्द रही है। ट्रेजरी बन्द होने का अर्थ और परिणाम क्या होता है यह वित्तीय समझ रखने वाला हर आदमी जानता है। जब सरकार विधानसभा में बजट दस्तावेज रखती है तो उसमें तीन वर्षों के आय और व्यय के आंकड़े शामिल रहते हैं। वर्ष 2025-26 के बजट अनुमानों के साथ ही 2024-25 के संशोधित आंकड़े और 2023-24 के वास्तविक आंकड़े सदन में आये हैं। इसी के साथ वर्ष 2023-24 की कैग रिपोर्ट भी इसी सत्र में सदन में आयी है। इस सरकार ने सत्ता दिसम्बर 2022 में संभाली थी और पिछली सरकार के अन्तिम दिनों के फैसले पलट दिये थे। इन्हीं फैसलों में एक फैसला पेट्रोल डीजल पर जो वैट पूर्व सरकार ने कम किया था उसे फिर से लागू कर दिया था। ऐसे ही कई और वित्तीय फैसले भी रहे हैं। इन फैसलों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सुक्खू सरकार ने अपने वित्तीय संसाधन बढ़ाने के कर और अन्य शुल्क बढ़ाने का कदम सत्ता संभालते ही उठा लिया था। लेकिन वर्ष 2023-24 की जो कैग रिपोर्ट आयी है और उसमें जो सवाल उठाये गये हैं उनसे इस सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल हो जाते हैं। कैग ने टिप्पणी की है कि यह सरकार 2795 करोड़ के कर्ज का कोई जवाब ही नहीं दे पायी है। वर्ष 2023 के बरसात में प्रदेश के कुछ भागों में आयी प्राकृतिक आपदा राहत में सरकार ने अपने संसाधनों से 4500 करोड़ खर्च किया है। केन्द्र पर यह लगातार आरोप है कि उसने इस आपदा में प्रदेश की कोई मदद नहीं की है। लेकिन कैग रिपोर्ट के मुताबिक आपदा में सरकार ने केवल 1209.18 करोड़ रुपए खर्च किये हैं जिसमें से 1190.35 करोड़ रुपए केन्द्र ने दिये हैं। इस तरह सुक्खू सरकार के अपने वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल खड़े हो जाते हैं।
वर्ष 2023-24 में राजस्व प्राप्तियां 37999.87 करोड़ अनुमानित थी जिनके मुकाबले में वास्तव में यह प्राप्तियां 39173.04 करोड़ रही। पूंजीगत प्राप्तियां 11865.71 करोड़ अनुमानित थी और 12206.06 करोड़ वास्तव में रही है। इस तरह करीब 1500 करोड़ यह कुल प्राप्तियां अनुमानों से अधिक रही हैं। परन्तु सरकार के कर और गैर कर राजस्व के आंकड़ों के मुताबिक कर राजस्व 2023-24 में 13025.97 करोड़ अनुमानित था और गैर कर राजस्व 3447.01 करोड़ था। परन्तु इन अनुमानों के मुकाबले कर राजस्व 11835.29 करोड़ और गैर कर राजस्व 3020.28 करोड़ रहा है। इस तरह कर और गैर कर राजस्व अनुमानों से 1617.41 करोड़ कम रहा है। कर और गैर कर राजस्व अनुमानों से कम रहा है परन्तु राजस्व आय और पूंजीगत आय अनुमानों से 1500 करोड़ ज्यादा रही और कुल कर-करेतर आय 1700 करोड़ कम रहा है। राजकोषीय घाटा जो 9900.14 करोड़ अनुमानित था वह वास्तव में 11265.74 करोड़ रहा। इसमें राजकोषीय घाटे में 1365.60 करोड़ का अन्तर रहा।
इन आंकड़ों के मुताबिक राजस्व और पूंजीगत आय अनुमानों से 1500 करोड़ अधिक रही और कुल करेतर आय 1700 करोड़ कम रही। राजकोषीय घाटा 1365.60 करोड़ रहा। लेकिन 2023-24 के लिये अनुपूरक मांगे 10307 करोड़ रही है। वर्ष 2023-24 में ही सरकार द्वारा करीब 10,000 करोड़ का कर्ज लेने का आरोप भाजपा ने एक आरटीआई जानकारी के आधार पर लगाया था। मुख्यमंत्री ने इस बार भी 2023 की आपदा राहत में 4500 करोड़ खर्च करने का दावा बजट भाषण में किया है। जबकि कैग रिपोर्ट के मुताबिक आपदा में कुल 1209 करोड़ खर्च किये गये हैं। इस तरह कैग रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों के आधार पर 2023-24 के खर्च के जो वास्तविक आंकड़े इस बार के बजट दस्तावेजों में दिखाये गये हैं उनकी प्रमाणिकता पर स्वतः ही सवाल खड़े हो जाते हैं। इसलिये जब सरकार को वर्ष 2025-26 के पहले ही दिन कर्ज लेने की आवश्यकता पड़ गयी है तो इस वर्ष के अन्त तक कुल स्थिति क्या हो जायेगी उसका अनुमान लगाया जा सकता है क्योंकि 2024-25 के मुकाबले 2025-26 के बजट आकार में इतनी कम वृद्धि हुई है कि उसमें संभावित महंगाई को जोड़ दिया जाये तो यह आकार 2024-25 से कम हो जाता है।

क्या प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस मिलकर चल रहे हैं?

शिमला/शैल। क्या प्रदेश भाजपा भी गुटबाजी का शिकार है? क्या भाजपा के सभी गुट अपने-अपने तरीके से सुक्खू सरकार के साथ है? यह सवाल इसलिये उठ रहे हैं कि भाजपा अभी तक अपने अध्यक्ष का चयन नहीं कर पायी है। भले ही भाजपा "Party with differences" की ओर इस संद्धर्भ में प्रश्नित निगाहों से देख रहे हैं। वैसे तो भाजपा का यह चरित्र उसी दिन से सवालों में आ गया जब यह भ्रष्टाचारियों की शरणस्थली बन गयी थी। हिमाचल भी इसमें अछूता नहीं रहा है। आज भाजपाई बने कांग्रेसी अलग ही नजर आ रहे हैं और शायद यह अलग दिखना ही भीतर की पूरी तस्वीर बयां कर देता है। लेकिन इस समय भाजपा के भीतर क्या पक रहा है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि प्रदेश स्तरीय मुद्दों पर भाजपा का आचरण क्या रहा है। हिमाचल इस समय वितीय संकट से गुजर रहा है। सुक्खू सरकार इस संकट के लिये पिछली सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन को दोष देती आ रही है। अभी सरकार को नये वित्तीय वर्ष के पहले ही दिन कर्ज लेना पड़ा है। इसी संकटपूर्ण स्थिति में अभी बजट सत्र के अंत में विधायकों मंत्रियों और अध्यक्ष उपाध्यक्ष के वेतन भत्ते बढ़ाये हैं। लेकिन यह बढ़ौतरी और प्रचारित संकट अपने में विरोधाभासी है। परन्तु इस पर भाजपा की ओर से कोई प्रश्न नहीं उठाया गया। इस बढ़ौतरी के लिये बढ़ती महंगाई को कारण बनाया गया है। परन्तु यह बढ़ती महंगाई आम आदमी को भी बराबर परेशान करती आ रही है। और उसकी ओर किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने प्रदेश में नये आई.ए.एस. अधिकारी लेने से इन्कार कर दिया है। परन्तु जब सरकार सेवानिवृत्ति अफसरों को पुनः नौकरी पर रख रही है तो सरकार का कदम अपने में ही सवालिया निशान बन जाता है। परन्तु भाजपा इस बढ़ौतरी पर एक शब्द नहीं बोली है।
यही नहीं जब प्रदेश के मुख्य सचिव को सेवा विस्तार मिला तब यह सवाल उठा कि केन्द्र ने अपने ही दिशा निर्देशों को नजर अंदाज करके सुक्खू सरकार के सेवा विस्तार के आग्रह को कैसे स्वीकार लिया है। बड़ी हैरानी तो इस बात की है कि प्रदेश भाजपा ने इस पर एक शब्द भी नहीं बोला। केन्द्र में तो भाजपा की सरकार है प्रदेश से कांग्रेस का तो एक सांसद तक दिल्ली में नहीं है। ऐसे में बिना प्रदेश भाजपा के सहयोग से यह सेवा विस्तार कैसे संभव हो सकता है? मुख्यमंत्री सुक्खू ने जब यह कहा है कि भाजपा नादौन में ई.डी. की छापेमारी करवा सकती है तो प्रदेश में सी.बी.आई. को भी बुला सकती है। इससे क्या यह इंगित नहीं होता है कि पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मामले में कोई विशेष योजना तैयार की जा रही है। क्योंकि एक ओर संसद में जिस तरह से भाजपा सांसद पूर्व मंत्री अनुराग ठाकुर ने पहले राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को घेरा है वह अपने में एक बड़ा संकेत हो जाता है। क्योंकि इस पर जो विरोध प्रदर्शन कांग्रेस ने प्रदेश में किया वह अपने में कोई बड़ा प्रदर्शन न होकर केवल सांकेतिक होकर रह गया है।

क्या बजट में घोषित योजनाएं जमीनी हकीकत बन पायेगी?

  • बजट का आकार केवल 70 करोड़ बढ़ने से उठा सवाल।
  • पूंजीगत कार्यों के लिये इस बार 4% कम है प्रावधान
  • क्या सारे स्कूलों में इंग्लिश मीडियम लागू है?
  • क्या करीब पांच लाख किसान प्राकृतिक खेती और खुशहाल किसान योजना में कवर हो गये हैं?
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वर्ष 2025-26 के लिये 58,514 करोड़ का कुल बजट प्रस्तावित किया है। बजट का यह आकार पिछले वर्ष के 58,444 करोड़ से केवल 70 करोड रुपये अधिक है। बजट का बड़ा भाग राजस्व व्यय पर खर्च होता है क्योंकि उसमें प्रतिबद्ध खर्चें आते हैं जिन्हें कम नहीं किया जा सकता। सरकार के इन प्रतिबद्ध खर्चों में वेतन पर 25, पैन्शन पर 20, ब्याज अदायगी पर 12, कर्ज़ अदायगी पर 10, स्वायत संस्थाओं को ग्रांट पर 9 और शेष 24 पूंजीगत मद में खर्च किये जायेंगे। वर्ष 2024-25 में वेतन पर 25, पैन्शन पर 17, ब्याज अदायगी पर 11, कर्ज़ अदायगी पर 9, स्वायत संस्थाओं को ग्रांट पर 10, और शेष 28 पूंजीगत कार्यों के लिये थे। इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि इस वर्ष विकास कार्यों पर पिछले वर्ष की तुलना में चार प्रतिशत कम खर्च किये जायेंगे। स्वायत संस्थाओं की ग्रांट में भी एक प्रतिशत की कमी आयेगी। इस वर्ष ब्याज और कर्ज अदायगी पर ज्यादा खर्च होगा। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस वर्ष की वितीय स्थिति पिछले वर्ष के मुकाबले काफी कठिन रहेगी। इस कठिनाई से विकास कार्य प्रभावित होंगे और रोजगार भी कम होगा। इन आंकड़ों से यह शंका होना स्वभाविक है कि इस वर्ष के लिये घोषित योजनाओं पर पूरा अमल नहीं हो पायेगा। सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर तब सवाल खड़े हो जाते हैं जब 2024-25 के लिए 17053 करोड़ की अनुपूरक मांगे लाने के बाद भी 2025-26 के लिये बजट का आकार केवल 70 करोड़ ही बढ़ता है। इससे यह सामने आता है कि सरकार ने करीब 17000 करोड़ की अनुपूरक मांगे 58,444 करोड़ के बजट में ही काट छांट करके पूरी की हैं। इसके लिये प्रतिबद्ध खर्चों में तो कमी कि नहीं जा सकती। केवल विकासात्मक खर्चों पर ही कैंची चलाई जा सकती है। लेकिन इसी के साथ यह सवाल आता है कि सरकार ने वर्ष के दौरान जो कर्ज लिया वह कहां खर्च हुआ? क्योंकि जब 17000 करोड़ की अनुपूरक मांगे और 10000 करोड़ से अधिक का घाटा पूरा करने के बाद भी बजट का आकार न बढ़े तो यह सवाल तो पूछा ही जायेगा की कर्ज का निवेश कहां हुआ? क्योंकि कर्मचारियों के डी.ए. और संशोधित वेतनमानों का एरियर अब भी अदायगी के लिये पड़ा हुआ है। इस बजट से जहां सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े हो रहे हैं वहीं पर राज्यपाल के अभिभाषण में दर्ज उपलब्धियों पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है। राज्यपाल के अभिभाषण में यह कहा गया है कि सरकार ने विधानसभा चुनाव में घोषित दस गारंटीयों में से छः पूरी कर दी है। उन छः गारंटीयों में से एक है कि सारे सरकारी स्कूलों में इंग्लिश माध्यम कर दिया गया है। दूसरी गारंटी प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत 3577 ग्राम पंचायतों में 2,87,000 प्रशिक्षित और 2 लाख 8 हजार अभ्यास शील किसानों को कवर कर दिया गया है। आज प्रदेश की हर पंचायत में दो-तीन स्कूल हैं जहां पर आसानी से इस दावे की पड़ताल हो जायेगी कि हर स्कूल में इंग्लिश मीडियम हुआ है या नहीं। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश में 20690 गांव है सरकार का दावा है कि उसकी योजना के तहत करीब 5 लाख किसान कवर हो चुके हैं। इस दावे का अर्थ है कि प्रदेश के हर गांव से कम से कम एक दर्जन किसान योजना के लाभार्थी है परन्तु क्या व्यवहार में ऐसा है? क्या कांग्रेस का कोई नेता या कार्यकर्ता अपने गांव के लाभार्थीयों की कोई सूची जारी कर पायेगा शायद नहीं। क्योंकि यह सब दावे फाइलों तक ही सीमित हैं उससे आगे कहीं नहीं। इस बार जब पूंजीगत कार्य के लिये धन का प्रावधान ही पिछले वर्ष की तुलना में 4% कम है तब यह स्वभाविक है कि प्रदेश में विकास कार्य प्रभावित होंगे ही। इस बजट के आंकड़ों से यह इंगित होता है कि यह दस्तावेज इन अफसरशाहों ने तैयार किया है जिनका प्रदेश की जनता से कोई सीधा सरोकार नहीं है। विश्लेषकों के मुताबिक यह बजट कांग्रेस के विधायकों और कार्यकर्ताओं को जनता के सामने रखकर उपलब्धि का कोई दावा नहीं करने देगा।
 
मुख्यमंत्री के बजट भाषण 2024-25 के अंश
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
मुख्यमंत्री के बजट भाषण 2025-26 के अंश
 
 
 
 
 
 
 
 
 

विश्वसनीयता बनाने के लिये नेगी प्रकरण सी.बी.आई. को सौंप देना चाहिये

  • यदि देशराज का नाम एफ.आई.आर. में हो सकता है तो मीणा का क्यों नहीं?
  • शोंगटोंग और पेखूबेला परियोजनाओं पर उठते सवाल कब तक नजरअन्दाज होते रहेंगे
  • यदि पत्र बम आने पर उसमें दर्ज आरोपों को गंभीरता से लिया होता तो शायद नेगी की मौत न होती
शिमला/शैल। क्या पावर कॉरपोरेशन के चीफ इंजीनियर विमल नेगी की मौत के लिये जिम्मेदार लोगों को सजा मिल पायेगी? प्रदेश सरकार द्वारा इस मामले में आदेशित जांच और पुलिस द्वारा दर्ज की एफ.आई.आर. की जांच पर भरोसा क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या विपक्ष की मांग पर यह मामला सी.बी.आई. को सौप जायेगा? यह सवाल इसलिये उठ रहे हैं क्योंकि जिस दिन से विमल नेगी गायब हुये थे उसके बाद से उनके परिजनों और पावर कारपोरेशन के कर्मियों/सहयोगियों द्वारा यह लगातार कहा जाता रहा कि वह गंभीर मानसिक तनाव में थे। इस मानसिक तनाव के लिये निगम के प्रबंधन को जिम्मेदार बताया जा रहा था। यह कहा जा रहा था कि प्रबंधन उन्हें गलत काम करने के लिये बाध्य कर रहा था। देर तक काम करवाया जाता था। छुट्टी मांगने पर छुट्टी नहीं दी जा रही थी। जब बिमल नेगी की लाश भाखड़ा बांध से शाहतलाई के निकट बरामद हुई तब परिजनों और कॉरपोरेशन के कर्मचारियों ने जिस तरह के आरोप लगाये और निगम के दो अधिकारियों हरिकेश मीणा और देशराज को तुरन्त प्रभाव से निलंबित करने की मांग की। इनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की। इस मांग पर देशराज को तो निलंबित कर दिया गया परन्तु हरिकेश मीणा को नहीं। इस मामले में जो एफ.आई.आर. दर्ज की गयी उसमें देशराज का तो नाम आ गया परन्तु मीणा का नाम नहीं आया केवल प्रबंध निदेशक लिखा गया। हरिकेश मीणा का नाम एफ.आई.आर. में न होने का मामला जब विधानसभा में गूंजा तब भी मीणा का नाम एफ.आई.आर. में नहीं आया। उसके बाद मीणा को छुट्टी पर भेज दिया गया। सरकार ने उसके बाद केवल यह आश्वासन दिया की जांच में जिसका नाम सामने आयेगा उसे एफ.आई.आर. में जोड़ दिया जायेगा।
इस प्रकरण में जिस तरह का आचरण सरकार का सामने आया है उससे तो यही प्रश्न उठता है कि यदि एफ.आई.आर. में देशराज का नाम हो सकता है तो उसी आधार पर मीणा का क्यों नहीं? कॉरपोरेशन के मुखिया मीणा है देशराज नहीं। परिजनों और निगम कर्मियों ने तो सबसे अधिक जिम्मेदार मीणा को ठहराया है। इस मामले की प्रशासनिक जांच अतिरिक्त मुख्य सचिव ओंकार शर्मा को सौंप गयी है। यह प्रशासनिक जांच और पुलिस की एफ.आई.आर. की जांच दोनों एक ही समय में चलेगी। पुलिस तंत्र की निष्पक्षता पर इसी दौरान सोशल मीडिया पर आयी भूपेंद्र नेगी की पोस्ट ने कई गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा दिये हैं। पावर कॉरपोरेशन के प्रबंधन और सरकार पर अविश्वास क्यों किया जा रहा है? यह सवाल अपने में ही बहुत महत्वपूर्ण और गंभीर है। क्योंकि पावर कॉरपोरेशन द्वारा जिन परियोजनाओं का निष्पादन किया जा रहा है वहां पर हुये भ्रष्टाचार को लेकर इस सरकार के आने के बाद से ही सवाल उठने लग पड़े थे।
स्मरणीय है कि इस सरकार के कार्यकाल में पावर कॉरपोरेशन के भ्रष्टाचार को लेकर एक पत्र प्रधान मंत्री के नाम लिखा गया था। इस पत्र में पावर कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक और एक अन्य आई.ए.एस. अधिकारी के खिलाफ शोंग टोंग जल विद्युत परियोजना को लेकर करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। इन आरोपों की जांच करवाये जाने की बजाये पावर कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक मीणा ने कुछ पत्रकारों के खिलाफ ही एक एफ.आई.आर. दर्ज करवा दी थी। इसकी जांच में भाजपा विधायक जनक राज तक का नाम उछला था। उस समय भी पत्र में दर्ज आरोपों की जांच सी.बी.आई. से करवाने की बातें हुई थी। परन्तु आज तक कोई परिणाम सामने नहीं आया है। जबकि मार्च 2023 में जब मुख्यमंत्री ने इस परियोजना को जुलाई 2025 तक पूरा करने के निर्देश एक समीक्षा बैठक में दिये थे तब मुख्यमंत्री ने इसमें आ रही बाधाओं को एक माह में पूरा करने के निर्देश दिये थे। इसके बाद परियोजना के डिजाइन में 600 प्रतिशत के बदलाव आने की चर्चा उठी थी। यह भी चर्चा में आया था कॉरपोरेशन 150 दिनों तक इस मामले में निष्क्रिय होकर बैठी रही है। 2024 में कॉरपोरेशन पर पेखूबेला सौर ऊर्जा परियोजना के निर्माण में भ्रष्टाचार होने के आरोप लगे थे। यह सवाल उठा था कि यदि गुजरात में 35 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजना 144 करोड़ में बन सकती है तो पेखूबेला की 32 मेगावाट की सौर परियोजना 220 करोड़ में क्यों। लेकिन इन सवालों के जवाब आज तक नहीं आये हैं। स्वभाविक है कि जिस कॉरपोरेशन की कार्य प्रणाली पर इस तरह के सवाल उठे हों और सरकार द्वारा उन्हें टाल दिया गया हो वहां पर ईमानदार अधिकारी किस तरह के मानसिक तनाव में काम कर रहे होंगे इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। जब भी सरकार ऐसे भ्रष्टाचार को संरक्षण देगी तब ईमानदार अधिकारियों का अंजाम यही होगा यह तय है। सरकार को अपनी विश्वसनीयता बहाल करने के लिये यह मामला सी.बी.आई. को सौंप देना चाहिये।

सुखविंदर सिंह बनाम निशु ठाकुर एवं अन्य मानहानि मामले को प्रवीण कुमार ने दी उच्च न्यायालय में चुनौती

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 2017 में जब वह नादौन से विधायक थे तब निशु ठाकुर, ईशा ठाकुर, प्रवीण कुमार पत्रकार अमर उजाला और कपिल बस्सी पत्रकार दैनिक सवेरा के खिलाफ आपराधिक एवं सिविल मानहानि के मामले शिमला तथा हमीरपुर में दायर किये थे। लेकिन इन मामलों का निपटारा अब तक नहीं हो सका है। हमीरपुर में दायर हुआ सिविल मामला अब शायद लोक अदालत में पहुंच गया है। शिमला में दायर हुये आपराधिक मामले में प्रतिवादियों को शायद अभी तक वांछित दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं हो पाये हैं। यह मामले इतना लम्बा क्यों हो रहे हैं। इस पर अब अमर उजाला के पत्रकार प्रवीण कुमार ने हिमाचल उच्च न्यायालय में दस्तक देकर इस मामले को बन्द किये जाने की गुहार लगाई है। यह मामले जब दायर हुये थे तब सुखविंदर सिंह सुक्खू नादौन से विधायक और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे परन्तु अब तो वह दो वर्षों से भी अधिक समय से प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में यह मामले तो अब तक निपट जाने चाहिये थे। परन्तु ऐसा हो नहीं पाया है। इसलिये इन मामलों की पृष्ठभूमि में जाना आवश्यक हो जाता है। स्मरणीय है की मानहानि के यह मामले ईशा ठाकुर और निशु ठाकुर द्वारा 2016 में हमीरपुर में आयोजित एक पत्रकार वार्ता पर आधारित हैं। इस पत्रकार वार्ता में इन भाई बहन ने नादौन के जडोत गांव में मान खड्ड पर कार्यरत एक स्टोन क्रेशर और हॉट मिक्सिंग प्लांट में हो रही अवैधताओं पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था। यह आरोप लगाया था कि क्रेशर के साथ लगती उनकी 27 कनाल जमीन पर यह क्रेशर लगाया गया है। यह मामला उच्च न्यायालय ने भी स्वतः संज्ञान में लिया था। एनजीटी के आदेश से यह स्टोन क्रेशर वहां से हटाया गया है। ऐसे में स्टोन क्रेशर को लेकर उठाये गये एतराज स्वतः ही अधारहीन हो जाते हैं। इन्हीं पत्रकार वार्ताें में एक आरोप यह भी था कि सुक्खू ने 769 कनाल जमीन अपने भाई के नाम खरीदी है। जिसे बाद में अपने नाम करवा लिया गया। यह पत्रकार वार्ताएं शायद 2016 में हुई। परन्तु इसका संज्ञान 2017 में लेकर मानहानि के मामले दायर किये गये। यहीं पर यह उल्लेखनीय हो जाता है कि सुक्खू ने 2017 में नादौन में विधानसभा चुनाव लड़ा और वह जीत गये। चुनाव परिणाम के कुछ समय बाद इन्हीं भाई बहन के पिता बसन्त सिंह ठाकुर ने सुक्खू के चुनाव को यह कहकर उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी की सुक्खू ने चुनाव शपथ पत्र में संपत्ति को लेकर तथ्यों को छुपाया है। उच्च न्यायालय ने इस पर चुनाव याचिका तो स्वीकार नहीं की क्योंकि समय अवधि निकल गयी। परन्तु आरोपों को सक्ष्म आथॉरिटी के पास उठाने को कहा और अथॉरिटी को निर्देश दिये की इस पर शीघ्र कारवाई हो। उच्च न्यायालय के निर्देशों पर यह मामला एस.पी. हमीरपुर के कार्यालय में जांच के लिये आ गया। यहां ए.एस.पी. ने इस मामले की जांच की और तथ्य छुपाने के आरोपों को सही पाया। ए.एस.पी की जांच रिपोर्ट के बाद धारा 156;3द्ध के तहत यह मामला ए.सी.जे.एम. की अदालत में नादौन में दायर हो गया। यहां अदालत ने फिर जांच करवाई और तथ्यों को सही पाया। परन्तु अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि इससे किसी को व्यक्तिगत लाभ हानि नहीं हुई है इसलिये चालान को रद्द कर दिया जाये और इस सिफारिश पर चालान रद्द हो गया और सुक्खू को राहत मिल गयी।
नादौन अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय मे चुनौति दी गयी। इस पर जस्टिस राकेश कैंथला की एकल पीठ ने इस याचिका को तो अस्वीकार कर दिया लेकिन साथ यह भी कह दिया कि इसका मामले के गुण दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इससे स्पष्ट हो जाता है की संपत्ति संबंधी तथ्यों को छुपाने के आरोप को अलग से चुनौती दी जा सकती है। क्योंकि खरीदी गई जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है कि इसमें ताबे हुकुक बर्तनदारान है और साथ ही 316 कनाल से अधिक की खरीद लैण्ड सीलिंग एक्ट के प्रावधानों में भी आती है। इस परिदृश्य में अमर उजाला के पत्रकार द्वारा मानहानि के मामले का उच्च न्यायालय में चुनौती दिया जाना रोचक और गंभीर हो जाता है। क्योंकि इस तरह के राजस्व इन्द्रराज वाली जमीन विलेज् कामन लैण्ड हो जाती है। जिसे न खरीदा जा सकता है न बेचा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में 2011 में राज्यों के मुख्य सचिवों को कड़े निर्देश जारी किये हुये हैं।

 

 

 

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