Saturday, 20 June 2026
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सरकारी स्कूलों ने तोड़ी निजी स्कूलों की वर्षों पुरानी धारणा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष घोषित 12वीं बोर्ड परीक्षा परिणामों ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। लंबे समय तक निजी स्कूलों के मुकाबले कमजोर माने जाने वाले सरकारी स्कूलों ने इस बार ऐसा प्रदर्शन किया जिसने सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर वर्षों से बनी धारणा को भी चुनौती दे दी है। टॉप-100 मेरिट सूची में 50 से अधिक विद्यार्थी सरकारी स्कूलों से होना केवल एक परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा नीति और सरकारी स्कूलों की बदलती तस्वीर का संकेत माना जा रहा है।
सरकार का दावा है कि शिक्षा क्षेत्रा में किए गए सुधारों जैसे अलग शिक्षा निदेशालय, क्लस्टर प्रणाली, तकनीकी सुधार, स्मार्ट यूनिफॉर्म और शिक्षकों व विद्यार्थियों के एक्सपोजर विजिट का असर अब दिखाई देने लगा है। सरकारी स्कूलों का पास प्रतिशत 92 प्रतिशत से अधिक पहुंचना भी इन दावों को मजबूत करता है।
लेकिन इस सफलता के पीछे केवल सरकारी नीतियां ही नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों और शिक्षकों की मेहनत भी सबसे बड़ा कारण मानी जा रही है। सीमित संसाधनों के बावजूद सरकारी स्कूलों के बच्चों ने यह साबित किया है कि अवसर और सही मार्गदर्शन मिलने पर वे किसी भी निजी स्कूल से पीछे नहीं हैं।
हालांकि विपक्ष इस उपलब्धि को लेकर सरकार पर सवाल भी उठा रहा है। भाजपा का कहना है कि केवल बोर्ड परिणामों के आधार पर शिक्षा व्यवस्था में क्रांति का दावा करना जल्दबाजी होगी। विपक्ष का आरोप है कि कई स्कूलों में अब भी शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं का अभाव और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों की समस्या बनी हुई है।
सार्वजनिक स्तर पर इस परिणाम को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अभिभावकों में सरकारी स्कूलों के प्रति भरोसा बढ़ा है और यह धारणा कमजोर हुई है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल निजी संस्थानों में ही संभव है। खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह परिणाम उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सफलता एक स्थायी बदलाव की शुरुआत है या केवल एक वर्ष का बेहतर परिणाम। आने वाले वर्षों में परीक्षा परिणामों से आगे बढ़कर शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। केवल अंक और मेरिट सूची ही शिक्षा का अंतिम पैमाना नहीं हो सकते। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदर्शन और व्यावहारिक कौशल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि हिमाचल में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदल रही है। यदि यह सुधार लगातार जारी रहते हैं, तो यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। आज जब देशभर में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, ऐसे समय में हिमाचल का यह परिणाम यह दिखाता है कि सही नीतियों, जवाबदेही और निरंतर प्रयासों से सरकारी स्कूलों को फिर से मजबूत बनाया जा सकता है।

नगर निगम चुनाव विकास, सत्ता और सियासी अस्तित्व की लड़ाई

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में होने जा रहे नगर निगम चुनाव अब केवल स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं रह गए हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह चुनाव राजनीतिक प्रतिष्ठा, संगठनात्मक ताकत और जनता के मूड की परीक्षा बन चुके हैं। धर्मशाला, सोलन, मंडी और पालमपुर इन चारों नगर निगमों में मुकाबला जितना स्थानीय मुद्दों पर है, उतना ही राज्य की सत्ता और भविष्य की राजनीति पर भी केंद्रित होता जा रहा है।
नगर निगम चुनावों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां जनता सीधे अपने रोजमर्रा के मुद्दों के आधार पर फैसला करती है। सड़क, पार्किंग, पेयजल, सफाई, ट्रैफिक, स्ट्रीट लाइट, पर्यटन और रोजगार जैसे मुद्दे लोगों के जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। लेकिन इस बार इन चुनावों में राज्य सरकार की कार्यशैली विपक्ष के लिये राजनीतिक मुद्दा बन गई है।
सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के लिये ये चुनाव आसान नहीं माने जा रहे। सत्ता में होने का लाभ कांग्रेस को जरूर मिल सकता है, लेकिन जनता की अपेक्षाएं भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं। कांग्रेस पिछले ढाई वर्षों से ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का नारा दे रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक सुधार और भ्रष्टाचार विरोधी छवि को सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।
लेकिन दूसरी ओर विपक्ष लगातार कांग्रेस सरकार को अधूरी गारंटियों, आर्थिक संकट और धीमी विकास गति के मुद्दे पर घेर रहा है। कर्मचारियों, युवाओं और व्यापारियों के बीच कुछ नाराजगी भी दिखाई दे रही है। बेरोजगार युवा सरकारी भर्तियों की धीमी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि व्यापारी वर्ग बढ़ते खर्च और कमजोर शहरी प्रबंधन से परेशान दिखाई देता है।
शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहां मतदाता भावनात्मक नारों से ज्यादा परिणामों पर वोट करता है। यदि शहरों में ट्रैफिक, पार्किंग, सफाई और अव्यवस्थित निर्माण जैसे मुद्दे बने रहते हैं, तो कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि कांग्रेस सरकार अब विकास कार्यों और प्रशासनिक सुधारों को तेजी से जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है।
दूसरी ओर भाजपा इन चुनावों को कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजीव बिंदल लगातार आक्रामक अभियान चला रहे हैं। पार्टी चारों नगर निगमों के लिए अलग-अलग ‘संकल्प पत्र’ लाकर स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखने की कोशिश कर रही है। भाजपा का दावा है कि उसके पास स्पष्ट विजन, मजबूत नेतृत्व और विकास की नीयत है, जबकि कांग्रेस केवल घोषणाओं तक सीमित है।
भाजपा लगातार राज्य की आर्थिक स्थिति को बड़ा मुद्दा बना रही है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस सरकार वित्तीय संकट से जूझ रही है और विकास कार्यों की गति प्रभावित हुई है। भाजपा ट्रैफिक, पार्किंग, पेयजल संकट, कूड़ा प्रबंधन और व्यापारिक समस्याओं को कांग्रेस सरकार की प्रशासनिक विफलता के रूप में पेश कर रही है।
हालांकि भाजपा के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पार्टी 2022 विधानसभा चुनाव हार चुकी है और कई जगह संगठन के भीतर गुटबाजी की चर्चा अब भी बनी हुई है। कुछ क्षेत्रों में पुराने नेताओं और नए चेहरों के बीच तालमेल की कमी भी दिखाई देती है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि वह केवल कांग्रेस विरोध की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि उसके पास शहरी विकास का ठोस मॉडल भी है।
धर्मशाला नगर निगम चुनाव सबसे अधिक चर्चाओं में है। यहां कांग्रेस और भाजपा दोनों ने बड़े नेताओं को मैदान में उतारा है। सुधीर शर्मा भाजपा के लिए बड़ा चेहरा बने हुए हैं, जबकि कांग्रेस अपनी सरकार की उपलब्धियों के आधार पर वोट मांग रही है। स्मार्ट सिटी परियोजना, पर्यटन, ट्रैफिक और शहरी अव्यवस्था यहां प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।
सोलन में भाजपा ने सबसे आक्रामक रणनीति अपनाई है। राजीव बिंदल का लगातार दौरा यह संकेत देता है कि भाजपा इस चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई मान रही है। यहां ट्रैफिक, पार्किंग और अनियोजित शहरी विस्तार सबसे बड़े मुद्दे हैं। व्यापारी वर्ग और मध्यम वर्ग का वोट यहां निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
मंडी में भाजपा को पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की मौजूदगी का लाभ मिलने की उम्मीद है। मंडी लंबे समय से भाजपा का मजबूत क्षेत्र माना जाता रहा है। वहीं पालमपुर में मुकाबला शांत दिखाई देता है, लेकिन यहां शिक्षित और जागरूक मतदाता स्थानीय विकास और प्रशासनिक पारदर्शिता को सबसे अधिक महत्व देता है।
जनता का मूड अभी पूरी तरह किसी एक दल के पक्ष में स्पष्ट दिखाई नहीं देता। कांग्रेस सरकार को लेकर लोगों में उम्मीद भी है और नाराजगी भी। वहीं भाजपा को मजबूत विपक्ष माना जा रहा है, लेकिन उसे जनता के सामने स्पष्ट वैकल्पिक विजन पेश करना अभी बाकी है।
इन चुनावों की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि शहरी मतदाता अब केवल राजनीतिक भाषणों से प्रभावित नहीं होता। वह रोजमर्रा की सुविधाओं, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर निर्णय लेता है। यही कारण है कि इस बार नगर निगम चुनावों में स्थानीय मुद्दे किसी भी बड़े राजनीतिक नारे से ज्यादा प्रभाव डाल सकते हैं।
हिमाचल के ये नगर निगम चुनाव केवल मेयर और पार्षद चुनने तक सीमित नहीं हैं। यह चुनाव इस बात की परीक्षा भी हैं कि जनता ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के दावों पर कितना भरोसा करती है और भाजपा विपक्ष में रहते हुए खुद को कितनी प्रभावी ताकत के रूप में स्थापित कर पाती है। इन चुनावों के परिणाम आने वाले समय की हिमाचली राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं। क्योंकि हिमाचल की राजनीति में छोटे चुनाव अक्सर बड़े संकेत दे जाते हैं।

एचपीयू के शोध केंद्रों पर उठते सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में 22 जुलाई 2025 को स्थापना दिवस के अवसर पर शुरू किए गए पांच नए शोध केंद्रों को उस समय बड़े बदलाव की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कुलपति प्रोफेसर महावीर सिंह ने दावा किया था कि ये केंद्र ‘‘कैंपस टू कम्युनिटी’’ के विज़न को आगे बढ़ाएंगे और विश्वविद्यालय को शोध व नवाचार के नये दौर में ले जाएंगे। उद्घाटन के दौरान मंत्री अनिरुद्ध सिंह की मौजूदगी ने इस पहल को और महत्व दिया था।
हालांकि, लगभग एक साल बाद इन केंद्रों की वास्तविक स्थिति उम्मीदों के अनुरूप नहीं दिख रही है। जिन केंद्रों से ठोस शोध और सामाजिक प्रभाव की उम्मीद थी, वे फिलहाल सीमित गतिविधियों तक सिमटे नजर आते हैं। सेमिनार, वर्कशॉप और एमओयू तक ही इनकी सक्रियता दिखाई देती है। ग्रीन एनर्जी और नैनोटेक्नोलॉजी से जुड़े कुछ प्रयासों को छोड़ दें, तो बाकी केंद्रों की जमीनी उपस्थिति स्पष्ट नहीं है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या इन केंद्रों की स्थापना केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
इस स्थिति का असर विश्वविद्यालय के पारंपरिक विभागों पर भी पड़ा है। सोशल वर्क, सोशियोलॉजी, एनवायरनमेंटल साइंस, फॉरेंसिक स्टडीज और डिफेंस स्टडीज जैसे विभाग पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि इन विभागों की जरूरतों को नजरअंदाज कर नए केंद्रों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे शैक्षणिक असंतुलन पैदा हो रहा है। हाल के विरोध प्रदर्शन इसी असंतोष को दर्शाते हैं।
विवाद को और बढ़ाने वाला मुद्दा वर्ष 2026 के विश्वविद्यालय कैलेंडर से जुड़ा है। आरोप है कि इसमें इस्तेमाल की गई तस्वीरें वास्तविक नहीं बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार की गई हैं। यदि यह सही है, तो यह केवल प्रस्तुति का मामला नहीं बल्कि पारदर्शिता और विश्वसनीयता का भी सवाल है। एक शैक्षणिक संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी उपलब्धियों को वास्तविक तथ्यों के आधार पर ही प्रस्तुत करे। अन्यथा बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे संस्थान की साख को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शोध केंद्र को सफल बनाने के लिए पर्याप्त फंडिंग, योग्य फैकल्टी, स्पष्ट कार्ययोजना और निरंतर निगरानी जरूरी होती है। इन आधारभूत चीजों के बिना कोई भी केंद्र केवल कागजों तक सीमित रह सकता है।
अब 22 जुलाई 2026 को इन केंद्रों को एक साल पूरा होगा, जो विश्वविद्यालय के लिए एक अहम परीक्षा जैसा होगा। इस दौरान यह साफ हो जाएगा कि ये केंद्र अपने उद्देश्यों को कितना पूरा कर पाये हैं। यह मुद्दा केवल पांच शोध केंद्रों का नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता और प्राथमिकताओं से जुड़ा है। यदि प्रशासन समय रहते सुधार करता है, तो स्थिति बेहतर हो सकती है, अन्यथा इसका असर छात्रों और शोधार्थियों के भरोसे पर पड़ सकता है।

वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी और महिलाओं की अनदेखी पंचायत चुनावों में बड़ा मुद्दा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस इन दिनों जिस दौर से गुजर रही है, वह केवल सामान्य अंदरूनी असंतोष नहीं बल्कि एक गहरे संगठनात्मक संकट की ओर इशारा करता है। पंचायत चुनावों से ठीक पहले पार्टी के भीतर उठ रही बगावत की आवाजें अब खुलकर सामने आ रही हैं और इस बार इनका सीधा निशाना प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल पर साधा गया है। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा विप्लव ठाकुर ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि निर्णय प्रक्रिया शिमला तक सीमित बैठकों में सिमट गई है और जमीनी हकीकत से दूरी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि फैसले केवल सीमित दायरे और कुछ चुनिंदा लोगों की राय के आधार पर लिये जाएंगे, तो संगठन की मजबूती और विस्तार पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। यह ब्यान किसी एक व्यक्ति पर हमला भर नहीं, बल्कि उस कार्यप्रणाली की आलोचना है जिसे लेकर पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था।
इस असंतोष को सबसे ज्यादा हवा हाल ही में घोषित 71 ब्लॉक अध्यक्षों की सूची ने दी है, जिसने संगठन के भीतर विवाद को खुला रूप दे दिया। इस सूची में एक भी महिला को स्थान नहीं मिलना अपने आप में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है, खासकर तब जब हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की आबादी लगभग आधी है और पंचायत स्तर पर उनकी भागीदारी 52 प्रतिशत से भी अधिक है। यह तथ्य न केवल महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में संगठनात्मक ढांचे में उनकी पूरी तरह अनदेखी पार्टी की रणनीतिक सोच पर सवाल खड़े करती है। विप्लव ठाकुर ने इसे जल्दबाजी और सिफारिश आधारित नियुक्तियां बताते हुए कहा है कि इससे न केवल जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई है बल्कि सामाजिक संतुलन भी बिगड़ा है, जो आने वाले चुनावों में नुकसानदायक साबित हो सकता है।
पिछले कुछ महीनों में सामने आये बयानों को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि असंतोष किसी एक फैसले तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई स्तरों पर जमा हो रही नाराजगी का परिणाम है। वरिष्ठ नेता कौल सिंह ठाकुर ने लगातार सरकार और संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाये हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया और जिन अधिकारियों को वे पास रखना चाहते थे, उन्हें दूर भेज दिया गया। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा अपने मं़ित्रयों को फ्री हैंड नहीं दिया जा रहा, जबकि मंत्री सक्षम हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलना चाहिए। हाल ही में उनका यह बयान कि यदि मंडी की जनता उन्हें जिताती तो वे मुख्यमंत्री होते, पार्टी के भीतर चल रही नेतृत्व संबंधी खींचतान को सार्वजनिक रूप से उजागर करता है। इसी तरह नीरज भारती भी कई मौकों पर अपनी नाराजगी जता चुके हैं, जिससे यह साफ हो जाता है कि यह असंतोष अलग-अलग गुटों में फैल चुका है और अब इसे दबा पाना आसान नहीं रह गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में सरकार और संगठन के बीच तालमेल की कमी एक बड़ा कारण है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कार्यशैली को लेकर भी पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं। आरोप यह है कि निर्णय प्रक्रिया में केंद्रीकरण बढ़ा है और जमीनी स्तर से मिलने वाले फीडबैक को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। इससे कार्यकर्ताओं में यह भावना पैदा हो रही है कि उनकी भूमिका सीमित हो गई है और यही निराशा अब बगावत के रूप में सामने आ रही है।
पंचायत चुनावों के संदर्भ में यह बगावत और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि स्थानीय चुनावों में व्यक्तिगत छवि और सामाजिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2021 के पंचायत चुनावों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि बागी उम्मीदवारों का असर कितना गहरा हो सकता है। उस चुनाव में लगभग 20 से 25 प्रतिशत सीटों पर बागी उम्मीदवार मैदान में थे और करीब 10 से 15 प्रतिशत मामलों में उन्होंने जीत दर्ज की थी। कई जगहों पर वोटों के विभाजन ने आधिकारिक समर्थित उम्मीदवारों को सीधे नुकसान पहुंचाया, जिसका फायदा विपक्षी उम्मीदवारों को मिला। इस बार भी यदि यही स्थिति बनी रहती है तो कांग्रेस के लिए चुनौती और बढ़ सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं का रुझान भी इस समीकरण को प्रभावित करता है। पंचायत चुनावों में अकसर पार्टी की बजाये उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, उसका सामाजिक जुड़ाव और स्थानीय स्तर पर उसकी सक्रियता अधिक मायने रखती है। ऐसे में यदि बागी उम्मीदवार अपने क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं तो वे आसानी से पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को चुनौती दे सकते हैं। महिलाओं की अनदेखी जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बन सकते हैं, जो कांग्रेस के खिलाफ माहौल तैयार कर सकते हैं।
कुल मिलाकर हिमाचल कांग्रेस में उभरती यह बगावत केवल असंतोष का प्रदर्शन नहीं बल्कि एक बड़े संगठनात्मक असंतुलन का संकेत है, जिसमें ‘नारी शक्ति’ का सवाल अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक फैक्टर बनकर उभर रहा है। यदि नेतृत्व समय रहते इस असंतोष को दूर करने और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने में विफल रहता है, तो पंचायत चुनावों में इसका सीधा नुकसान देखने को मिल सकता है। वहीं यदि पार्टी इस स्थिति को सुधारने के अवसर के रूप में लेती है और संगठनात्मक ढांचे में संतुलन स्थापित करती है, तो यही मुद्दा उसके पक्ष में भी जा सकता है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि हिमाचल की राजनीति में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और पंचायत चुनाव इस बगावत और ‘नारी शक्ति’ के सवाल का पहला बड़ा इम्तिहान साबित होंगे, जहां यह तय होगा कि यह असंतोष केवल आवाज बनकर रह जाएगा या फिर राजनीतिक समीकरणों को बदलने वाली ताकत में तब्दील होगा।

हिमाचल का 54,928 करोड़ रूपये का बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026-27 का 54,928 करोड़ रुपये का बजट राज्य की आर्थिक दिशा, सामाजिक प्राथमिकताओं और विकास की रणनीति का व्यापक दस्तावेज है। यह बजट ऐसे समय में आया है जब राज्य को राजस्व घाटे, सीमित संसाधनों और बढ़ती विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना है। इसके बावजूद सरकार ने 8.3 प्रतिशत की अनुमानित आर्थिक वृद्धि दर, 2,83,626 रुपये की प्रतिव्यक्ति आय और 2.54 लाख करोड़ रुपये के सकल घरेलू उत्पाद का लक्ष्य निर्धारित कर यह संकेत दिया है कि विकास की गति बनाए रखने की ठोस कोशिश की जा रही है।
इस बजट का सबसे बड़ा फोकस ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका सुदृढ़ीकरण पर है। डेयरी क्षेत्र में सहकारी समितियों की संख्या को दोगुना कर 2,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। दूध उत्पादकों को मिलने वाला प्रोत्साहन 3 रुपये से बढ़ाकर 6 रुपये प्रति लीटर किया गया है, जिससे सीधे हजारों किसानों को लाभ मिलेगा। पशुपालक समुदायों गद्दी, गुज्जर, किन्नौरा आदि के 40,000 से अधिक परिवारों के लिए 300 करोड़ रुपये की विशेष योजना शुरू की जाएगी। ऊन के लिए 100 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया है, जो पशुपालकों की आय बढ़ाने में सहायक होगा।
कृषि क्षेत्र में भी सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं। गेहूं का समर्थन मूल्य 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम किया गया है, जबकि मक्का 40 से 50 रुपये, जौ 60 से 80 रुपये और हल्दी 90 से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम की गई है। पहली बार अदरक को 30 रुपये प्रति किलोग्राम के एमएसपी में शामिल करना किसानों के लिए बड़ी राहत है। ‘बीज गांव’ योजना के तहत किसानों को प्रति बीघा 5,000 रुपये की सब्सिडी और प्रत्येक गांव को 2 लाख रुपये का अनुदान मिलेगा, जिससे पारंपरिक बीजों का संरक्षण और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
बागवानी और वन क्षेत्र में सरकार ने 8,000 हेक्टेयर में पौधरोपण और 4,000 हेक्टेयर में सामुदायिक वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा है। 1,100 सामुदायिक समूहों को वित्तीय सहायता दी जाएगी। ‘मिशन 32 प्रतिशत’ के तहत वर्ष 2030 तक वन क्षेत्र को 32 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अलावा, 50 नए ईको-टूरिज्म स्थलों का विकास और 50 वन विश्राम गृहों की ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती देगी।
सामाजिक कल्याण और महिला-बाल विकास के क्षेत्र में इस बजट में कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। दिव्यांगजनों की सामाजिक सुरक्षा पेंशन को 1,700 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रति माह किया गया है। ‘शुभ विवाह योजना’ के तहत पात्र महिलाओं को 51,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी। महिला सशक्तिकरण योजना के अंतर्गत 3 लाख रुपये तक का सब्सिडीयुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इसके अलावा, बालिकाओं और महिलाओं के पुनर्वास के लिए नई योजनाओं की शुरुआत की जाएगी।
शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता सुधार और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। 150 स्कूलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा, जबकि 150 अन्य स्कूलों को भी समान स्तर पर उन्नत किया जाएगा। राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूलों के लिए 99 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। बच्चों के पोषण के लिए 17 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। उच्च शिक्षा में 389 सहायक प्राध्यापकों की भर्ती और नए व्यावसायिक पाठयक्रम शुरू किए जाएंगे।
स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट का आकार और दृष्टिकोण दोनों व्यापक हैं। नाहन मेडिकल कॉलेज के निर्माण के लिए 500 करोड़ रुपये, चंबा मेडिकल कॉलेज के विस्तार के लिए 194 करोड़ रुपये और हमीरपुर में नए डेंटल कॉलेज के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। टांडा, हमीरपुर और शिमला में आधुनिक कैंसर उपचार केंद्र स्थापित किए जाएंगे। 18 डे-केयर कैंसर सेंटर और 4 टर्शियरी केयर सेंटर स्थापित किए जाएंगे। इसके अलावा, 150 स्टाफ नर्स, 500 रोगी मित्र, 40 फार्मेसी अधिकारी और 30 रेडियोग्राफर सहित 1,000 से अधिक पद भरे जाएंगे।
ऊर्जा क्षेत्र में 450 करोड़ रुपये की लागत से बिजली व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा। 5 से 11 मेगावाट क्षमता की छः सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी। पांवटा साहिब में 124 करोड़ रुपये और कांगड़ा में 221 करोड़ रुपये की लागत से नए उपकेंद्र बनाए जाएंगे। पंचायत स्तर पर सोलर परियोजनाओं से होने वाली आय का 30 प्रतिशत पंचायत और 20 प्रतिशत कमजोर वर्गों के कल्याण पर खर्च किया जाएगा।
पर्यटन क्षेत्र में 345 करोड़ रुपये से अधिक की राशि विकास कार्यों पर खर्च की जाएगी। कांगड़ा एयरपोर्ट के विस्तार के लिए 3,349 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही, कई नए हेलीपोर्ट्स का निर्माण और हवाई सेवाओं का विस्तार किया जाएगा, जिससे राज्य की कनेक्टिविटी में सुधार होगा।
जल आपूर्ति और स्वच्छता के क्षेत्र में लगभग 2,000 करोड़ रुपये की व्यापक योजना तैयार की गई है। 500 जल योजनाओं में शोधन संयंत्र लगाए जाएंगे और 200 किलोमीटर पुरानी पाइपलाइन बदली जाएगी। शिमला में 10,000 घरों को 24ग7 जल आपूर्ति देने का लक्ष्य रखा गया है।
सड़क और परिवहन क्षेत्र में 500 किलोमीटर नई सड़कों का निर्माण, 950 किलोमीटर सड़कों की टारिंग, 1,500 किलोमीटर सड़कों का नवीनीकरण और 47 पुलों का निर्माण प्रस्तावित है। प्रधानमंत्राी ग्राम सड़क योजना के तहत 2,244 करोड़ रुपये की लागत से 1,538 किलोमीटर सड़कों को स्वीकृति दी गई है।
ग्रामीण विकास के तहत 1 लाख गरीब परिवारों को ‘मुख्यमंत्री अपना सुखी परिवार योजना’ के अंतर्गत 300 यूनिट मुफ्त बिजली और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। महिलाओं को 1,500 रुपये प्रतिमाह की सहायता भी दी जाएगी।
आईटी और नवाचार क्षेत्रा में स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, डिजिटल सेवाओं को मजबूत करने और ई-गवर्नेंस को लागू करने पर जोर दिया गया है। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता और दक्षता में सुधार होगा।
कर्मचारी कल्याण के तहत एनएचएम कर्मचारियों को औसतन 14,000 रुपये की वेतन वृद्धि दी जाएगी। डॉक्टरों का वेतन 33,660 रुपये से बढ़ाकर 40,000 रुपये किया गया है। दैनिक वेतनभोगियों का वेतन 450 रुपये प्रतिदिन और आउटसोर्स कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 13,750 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्राी के वेतन में 50 प्रतिशत, मंत्रियों के वेतन में 30 प्रतिशत और विधायकों के वेतन में 20 प्रतिशत की अस्थायी कटौती की गई है। यह कदम दर्शाता है कि सरकार आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए सख्त निर्णय लेने को तैयार है।
कुल मिलाकर यह बजट आंकड़ों के माध्यम से स्पष्ट करता है कि सरकार ने ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यटन और अवसंरचना पर व्यापक निवेश की योजना बनाई है। हालांकि, इन योजनाओं की वास्तविक सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। यदि सरकार इन घोषणाओं को धरातल पर उतारने में सफल रहती है, तो यह बजट हिमाचल प्रदेश के लिए दीर्घकालिक और समावेशी विकास की मजबूत नींव साबित हो सकता है।

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