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तीन माह से स्टाइपेंड नहीं, दंत महाविद्यालय की व्यवस्था पर उठे सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रमुख सरकारी दंत चिकित्सा शिक्षण संस्थानों में शामिल राजकीय दंत महाविद्यालय एवं अस्पताल, शिमला में व्यवस्थाओं को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहां MDS (मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी) की पढ़ाई कर रहे जूनियर रेजिडेंट डॉक्टरों को पिछले तीन महीनों से स्टाइपेंड नहीं मिला है। अगस्त, सितंबर और अक्तूबर का भुगतान लंबित होने से नाराज डॉक्टरों ने अब सामूहिक रूप से सरकार और संबंधित विभागों से हस्तक्षेप की मांग की है। डॉक्टरों का कहना है कि वे नियमित रूप से मरीजों का उपचार करने के साथ अपनी शैक्षणिक और क्लिनिकल जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन इसके बदले मिलने वाला स्टाइपेंड भी समय पर जारी नहीं किया जा रहा।
रेजिडेंट डॉक्टरों के अनुसार, इस मामले को कई बार महाविद्यालय प्रशासन के सामने उठाया गया, लेकिन अभी तक भुगतान की समस्या का समाधान नहीं हुआ है। उनका कहना है कि करीब 50 हजार रुपये प्रतिमाह मिलने वाला स्टाइपेंड भी दूसरे सरकारी मेडिकल और डेंटल संस्थानों में मिलने वाली राशि की तुलना में कम है। उन्होंने लंबित भुगतान तत्काल जारी करने के साथ स्टाइपेंड की राशि में संशोधन करने की मांग की है।
डॉक्टरों ने संस्थान में डेंटल उपकरणों, उपचार में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और दूसरी जरूरी क्लिनिकल सप्लाई की कमी का मुद्दा भी उठाया है। MDS की पढ़ाई केवल कक्षाओं और परीक्षाओं तक सीमित नहीं होती। इसमें मरीजों का उपचार करना, जटिल दंत रोगों का अध्ययन और व्यावहारिक प्रशिक्षण लेना भी शामिल है। इसके लिए आधुनिक उपकरणों और पर्याप्त चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता जरूरी है।
डॉक्टरों का कहना है कि आवश्यक सामग्री और उपकरणों की कमी से उनके क्लिनिकल कार्य और प्रशिक्षण में परेशानी आती है। इसका असर मरीजों को उपलब्ध कराई जाने वाली दंत चिकित्सा सेवाओं पर भी पड़ता है। ऐसे में संस्थान में जरूरी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
रेजिडेंट डॉक्टरों ने संस्थान में अपने लिए हॉस्टल की सुविधा नहीं होने पर भी सवाल उठाए हैं। इसके अलावा पर्याप्त शैक्षणिक संसाधनों की कमी और प्रशासनिक कामकाज में देरी की शिकायत की है। उनका कहना है कि उपस्थिति सत्यापन और जरूरी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने जैसे सामान्य प्रशासनिक कार्यों में भी अनावश्यक देरी होती है।
डॉक्टरों ने शिकायत निवारण व्यवस्था को भी कमजोर बताया है। उनका आरोप है कि समस्याएं उठाने पर प्रभावी समाधान नहीं मिलता और कई बार प्रशासनिक स्तर पर उचित व्यवहार भी नहीं किया जाता। इससे प्रशिक्षण के माहौल और कामकाज पर असर पड़ता है।
रेजिडेंट डॉक्टरों ने राष्ट्रीय दंत आयोग (NDC) के नियमों और स्नातकोत्तर दंत शिक्षा से जुड़े निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि किसी भी सरकारी दंत महाविद्यालय में विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने के लिए बेहतर शिक्षण व्यवस्था, प्रशिक्षित शिक्षक, जरूरी क्लिनिकल सुविधाएं, आधुनिक उपकरण और पर्याप्त शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध होना आवश्यक है।
डॉक्टरों ने सामूहिक ज्ञापन के माध्यम से सरकार से लंबित तीन महीने का स्टाइपेंड तत्काल जारी करने, मासिक स्टाइपेंड में संशोधन, जरूरी डेंटल उपकरणों और क्लिनिकल सामग्री की उपलब्धता तथा हॉस्टल सुविधा सुनिश्चित करने की मांग की है। इसके साथ प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग भी रखी गई है।
इस मामले में चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशक, हिमाचल प्रदेश, स्वास्थ्य सचिव, राज्यपाल और राष्ट्रीय दंत आयोग को भी ज्ञापन की प्रतियां भेजी गई हैं। रेजिडेंट डॉक्टरों ने संबंधित अधिकारियों से 15 दिनों के भीतर लिखित जवाब और उचित कारवाई की मांग की है।
डॉक्टरों का कहना है कि उनकी मांगों का उद्देश्य प्रशासन से टकराव करना नहीं है। वे अपने वित्तीय अधिकारों, सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों और बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे मरीजों के उपचार और शैक्षणिक जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, लेकिन संस्थान को भी उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
सरकारी दंत महाविद्यालय में उठे ये सवाल केवल रेजिडेंट डॉक्टरों के स्टाइपेंड तक सीमित नहीं हैं। मामला इस बात से भी जुड़ा है कि प्रदेश में भविष्य के विशेषज्ञ दंत चिकित्सकों को किस तरह की प्रशिक्षण सुविधाएं मिल रही हैं। यदि समय पर भुगतान, जरूरी उपकरण, क्लिनिकल सामग्री और रहने की बुनियादी सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं होंगी, तो चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों को मिलने वाली सेवाओं पर भी सवाल उठेंगे। अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग और महाविद्यालय प्रशासन 15 दिनों की समयसीमा में इन शिकायतों पर क्या कारवाई करते हैं।

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