आबादी के नीचे सुरंग निर्माण पर हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

Created on Wednesday, 04 November 2026 09:41
Written by Shail Samachar

शिमला/शैल। शिमला बाईपास परियोजना में एनएचएआई की कार्यप्रणाली पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। पहले बाईपास सड़क बनाने के लिए जमीन अधिग्रहित की गई। इसके लिए करीब 600 करोड़ रुपये मुआवजे के रूप में बांटे गए और 88 परिवारों के मकान गिराकर उन्हें विस्थापित कर दिया गया। लेकिन बाद में एनएचएआई ने सड़क बनाने की योजना छोड़कर संजौली के चलौठी से भट्टाकुफर तक पहाड़ी के नीचे ट्विन टनल बनाने का फैसला कर लिया। अब इस सुरंग के ऊपर बने मकानों में दरारें आने और कुछ मकानों के असुरक्षित घोषित होने का मामला अदालत पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने एनएचएआई से पूछा है कि आखिर पहले से तय योजना क्यों बदली गई और जनता के 600 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद इसकी जवाबदेही किसकी है?
हाईकोर्ट ने 29 अक्तूबर को विनीत शर्मा और अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनएचएआई से इन सवालों का जवाब मांगा। अदालत के सामने बताया गया कि पहले छकरैल, भट्टाकुफर और ढली के रास्ते सतही सड़क बनाने की योजना थी। इसके लिए जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई थी और प्रभावित लोगों को करीब 600 करोड़ रुपये मुआवजा दिया गया था। इस प्रक्रिया में 88 परिवारों के मकान गिराए गए। इसके बाद इस योजना को छोड़कर आबादी वाले पहाड़ के नीचे सुरंग बनाने का फैसला लिया गया। अदालत ने एनएचएआई से पूछा है कि जब जमीन अधिग्रहित करने और मुआवजा देने पर इतनी बड़ी रकम खर्च हो चुकी थी, तो फिर सड़क की योजना बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? इस खर्च से सरकारी खजाने को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि सुरंग बनाने के दौरान सुरक्षा का पूरा ध्यान नहीं रखा गया। इसके कारण ऊपर पहाड़ी पर बने कई मकानों में दरारें आ गई हैं और कुछ मकानों को रहने के लिए असुरक्षित घोषित किया गया है। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ जगहों पर सुरंग और ऊपर बने मकानों के बीच केवल 14 मीटर की दूरी है। कब्रिस्तान और विशाल मेगा मार्ट के आसपास यह स्थिति सामने आई है। सुरंग के दोनों ओर से पानी निकलने की समस्या भी बताई गई है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि जीएसआई ने पहले ही इस पहाड़ी के नीचे सुरंग बनाने को लेकर चेतावनी दी थी, क्योंकि यहां सैकड़ों मकान बने हुए हैं।
स्थानीय लोगों की शिकायतों के बाद उपायुक्त शिमला और एनएचएआई के अधिकारियों ने मौके का दौरा किया था और ब्लास्टिंग रोकने के निर्देश दिए थे। इसके बाद एक अक्तूबर को आईआईटी रुड़की की टीम ने भी मौके का निरीक्षण किया और सुरक्षा व्यवस्था पर चिंता जताई। टीम ने सुरंग निर्माण से जुड़े दस्तावेज भी मांगे हैं। सुनवाई के दौरान एनएचएआई ने अदालत को बताया कि सुरक्षा को लेकर उठी चिंताओं के कारण 18 सितंबर से निर्माण कार्य बंद है। आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट आने और मकानों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने तक काम दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने एनएचएआई के इस भरोसे को रिकॉर्ड पर लिया है। अदालत ने फिलहाल निर्माण पर अलग से रोक लगाने का आदेश नहीं दिया, लेकिन उम्मीद जताई कि अगली सुनवाई तक सुरंग निर्माण का कोई काम नहीं होगा। एनएचएआई को दो सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की गई है।
इस मामले में अब दो बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। पहला, जब बाईपास सड़क के लिए जमीन अधिग्रहित कर 600 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे, तो योजना बदलने का फैसला क्यों लिया गया? दूसरा, सुरंग के ऊपर रहने वाले लोगों के मकानों को नुकसान पहुंचने की स्थिति में उनकी सुरक्षा और मुआवजे की जिम्मेदारी कौन लेगा? हाईकोर्ट के सवालों ने एनएचएआई के सामने परियोजना के फैसलों और सरकारी धन के इस्तेमाल का पूरा हिसाब देने की चुनौती खड़ी कर दी है।