कैग की रिपोर्ट में वित्तीय निगरानी पर भी उठे सवाल
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Created on Wednesday, 09 September 2026 13:12
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में सरकारी पैसे के इस्तेमाल को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। कैग की 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक सरकार से मिली 3,324.53 करोड़ रुपये की राशि के कुल 2,521 उपयोग प्रमाणपत्र (Utilisation Certificate) लंबित है।
सरल शब्दों में कहें तो सरकार ने अलग-अलग संस्थाओं और विभागों को काम के लिए पैसा दिया, लेकिन उसका कितना पैसा और किस काम पर खर्च हुआ, इसका प्रमाण समय पर सरकार को नहीं दिया गया। उपयोगिता प्रमाणपत्र यह बताता है कि सरकार से मिला पैसा जिस काम के लिये दिया गया था, उसी काम पर खर्च हुआ या नहीं। इसलिए इतने बड़े स्तर पर यूसी लंबित होना सरकारी धन की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
हिमाचल प्रदेश वित्तीय नियम-2009 के Rule 157 के अनुसार अनुदान मिलने के बाद उसे तीन महीने के भीतर खर्च करना होता है। पैसा खर्च होने के बाद उसका ऑडिट किया हुआ उपयोग प्रमाणपत्र छह महीने के भीतर सरकार को देना होता है। साथ ही अगली किस्त जारी होने से पहले भी पिछली राशि का यूसी देना जरूरी है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में यूसी वर्षों से लंबित हैं। CAG ने चेताया है कि यूसी जमा नहीं होने पर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सरकारी पैसा वास्तव में सही जगह और तय काम पर खर्च हुआ या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में 19,522 यूसी 5,092.21 करोड़ रुपये की राशि के लिए जमा होने थे। इसके अलावा वर्ष की शुरुआत में 2,990 यूसी 2,795.23 करोड़ रुपये के पहले से लंबित थे। साल के दौरान 19,991 यूसी का निपटारा किया गया, लेकिन इसके बाद भी 2,521 यूसी 3,324.53 करोड़ रुपये के लंबित रह गये। सबसे ज्यादा लंबित यूसी पांच विभागों से जुड़े हैं। शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, आयुष और श्रम एवं रोजगार विभागों में कुल 2,915.63 करोड़ रुपये के यूसी लंबित हैं। यह कुल लंबित राशि का करीब 88 प्रतिशत है। कई मामलों में एक से अधिक वित्तीय वर्षों से उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित हैं।
शहरी विकास विभाग की स्थिति सबसे खराब है। यहां 254 यूसी से जुड़े 1,227.03 करोड़ रुपये का हिसाब लंबित है। इसका मतलब है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद संबंधित विभागों या संस्थाओं की ओर से यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए किया गया है। कैग ने ऐसी स्थिति को वित्तीय नियंत्रण के लिहाज से गंभीर माना है। कैग ने कहा है कि विभागों को सरकारी पैसे के इस्तेमाल की निगरानी मजबूत करनी होगी और समय पर यूसी लेना सुनिश्चित करना होगा। जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करने की जरूरत है। वित्त विभाग ने भी इस समस्या को गंभीर माना है और लंबित यूसी जल्द लेने के लिए कदम उठाने की बात कही है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि हिमाचल प्रदेश पहले ही वित्तीय दबाव से गुजर रहा है। राज्य का राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा बढ़ा हुआ है तथा राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे खर्चों में चला जाता है। ऐसे में सरकार के पास उपलब्ध प्रत्येक रुपये के इस्तेमाल और उसके हिसाब की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार ने दिसंबर 2024 में उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा करने की व्यवस्था में बदलाव भी किया था। नई व्यवस्था के तहत अनुदान प्राप्त करने वाले संस्थानों को राशि के इस्तेमाल के छह महीने के भीतर ऑडिटेड यूसी देना है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पुराने प्रमाणपत्र लंबित रहना व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2,521 लंबित यूसी से जुड़े 3,324 करोड़ रुपये का पूरा हिसाब कब सामने आएगा। किन योजनाओं में पैसा खर्च हुआ, किस एजेंसी ने खर्च किया और उसका प्रमाण क्यों लंबित रहा है इन सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।
कैग की रिपोर्ट का संदेश साफ है कि केवल बजट जारी करना और पैसा खर्च दिखाना पर्याप्त नहीं है। सरकारी धन का सही इस्तेमाल और उसका समय पर प्रमाणित होना भी उतना ही जरूरी है। हिमाचल जैसे वित्तीय दबाव वाले राज्य में हजारों करोड़ रुपये से जुड़े यूसी लंबित रहना सरकार की वित्तीय निगरानी व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।