अंदरूनी नाराजगी बन सकती है हिमाचल में कांग्रेस के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती
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Created on Tuesday, 25 August 2026 05:04
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर शुरू हुई अंदरूनी नाराजगी अब सार्वजनिक ब्यानबाजी और एक-दूसरे पर राजनीतिक हमलों के दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है। पिछले कुछ दिनों में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी, वन विकास निगम के उपाध्यक्ष केहर सिंह खाची, लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के बयानों ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को एक बार फिर सामने ला दिया है। स्थिति यह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अब सार्वजनिक मंचों से संगठन में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, बाहरी लोगों को महत्व देने और पार्टी के भीतर ही विरोधी ताकतों के सक्रिय होने जैसे गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
इस विवाद की सबसे तीखी शुरुआत राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी के बयान से हुई। कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में नेगी ने पार्टी के भीतर बैठे लोगों पर ही निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर ऐसे लोगों को संगठन में पद दिए जा रहे हैं जिन्हें उन्होंने ‘जयचंद’ और भाजपा के ‘स्लीपर सेल’ तक बताया। उन्होंने यहां तक कहा कि जब तक पार्टी अपने भीतर के दुश्मन को खत्म नहीं करेगी, तब तक भाजपा और आरएसएस से प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।
नेगी का यह बयान सामान्य राजनीतिक आलोचना से आगे इसलिए माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने सवाल सीधे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नियुक्तियों पर उठाया है। इसका अर्थ यह निकाला जा रहा है कि सरकार और संगठन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। खासकर उन नियुक्तियों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है, जिनमें पुराने और सक्रिय कार्यकर्ताओं की जगह अपेक्षाकृत नए चेहरों को जिम्मेदारी मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
इसी बीच 15 अगस्त को केहर सिंह खाची की ओर से दिए गए बयान ने विवाद को और हवा दी। खाची ने पार्टी और संगठन में अपनी भूमिका तथा मौजूदा राजनीतिक स्थिति को लेकर जिस अंदाज में बात रखी, उसे पार्टी के भीतर कुछ नेताओं ने पसंद नहीं किया। उनके बयान के बाद संगठन में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा चल पडी कि जिन लोगों की सक्रिय राजनीतिक पहचान चुनावों से पहले बहुत सीमित थी, वे आज पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर कैसे पहुंच गए।
खाची के बयान पर विवाद बढ़ने के बाद उन्हें अपने बयान पर स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस जारी किया जाना भी इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बनाता है। किसी पदाधिकारी को सार्वजनिक बयान के लिए जवाब देना पड़े, यह संकेत देता है कि पार्टी नेतृत्व अब खुले तौर पर होने वाली बयानबाजी को लेकर असहज है। इससे यह सवाल भी उठता है कि पार्टी में नेताओं और पदाधिकारियों को सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने की सीमा आखिर तय कौन कर रहा है।
विवाद के बीच लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह की सक्रियता ने भी राजनीतिक चर्चा को तेज किया। उन्होंने खाची से जुड़े विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसी दौरान भाजपा सांसद कंगना रनौत को लेकर भी तीखी राजनीतिक टिप्पणी की। इससे कांग्रेस और भाजपा के बीच चलने वाली बयानबाजी के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर की राजनीति भी चर्चा में आ गई। इससे पहले कंगना रनौत द्वारा युवाओं को लेकर दिए गए विवादित बयान पर भी विक्रमादित्य सिंह ने तीखा पलटवार किया था और सवाल उठाया था कि युवाओं को देश का भविष्य माना जाए या उन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाए। लेकिन कंगना रनौत पर बाबा रामदेव द्वारा दिये गये ब्यान पर उन्होने कंगना रनौत का पक्ष लेते हुये कहा कि वह अपने शब्द वापिस ले और सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।
दूसरी ओर पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह का बयान इस पूरे विवाद को पार्टी के भीतर के पुराने असंतोष से जोड़ता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि महत्वपूर्ण नियुक्तियों में सरकार और संगठन के बीच विचार-विमर्श होना चाहिए। उन्होंने ऐसे लोगों को पद दिए जाने पर भी सवाल उठाया, जिनका पार्टी को मजबूत करने या चुनाव जिताने में अपेक्षित योगदान नहीं रहा है।
यही बिंदु इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है। कांग्रेस में एक तरफ वे नेता हैं जो लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं को महत्व देने की मांग कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ संगठन में नए चेहरों को जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया चल रही है। समस्या नए चेहरों को जिम्मेदारी देने से नहीं, बल्कि पुराने नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता और योगदान की अनदेखी के आरोपों से पैदा हो रही है।
जगत सिंह नेगी का ‘जयचंद’ और ‘भाजपा के स्लीपर सेल’ वाला हमला, खाची का विवादित बयान, उसके बाद नोटिस, प्रतिभा सिंह की नाराजगी ये घटनाएं अलग-अलग दिखाई दे सकती हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा राजनीतिक धागा नजर आता है। वह है संगठन में अधिकार, नियुक्तियों में हिस्सेदारी और पुराने बनाम नए नेताओं की लड़ाई।
कांग्रेस के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि पार्टी सत्ता में है और उसे अगले चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की जरूरत है। यदि वरिष्ठ नेता ही सार्वजनिक मंचों पर संगठनात्मक फैसलों पर सवाल उठाने लगें और पार्टी के भीतर ‘जयचंद’ तथा ‘भाजपा एजेंट’ जैसे शब्द इस्तेमाल होने लगें, तो इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा।
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस अंदरूनी असंतोष को सार्वजनिक विवाद बनने से रोकने की है। यदि समय रहते वरिष्ठ नेताओं, सरकार और संगठन के बीच संवाद स्थापित नहीं हुआ तो आज की बयानबाजी आने वाले समय में बड़े राजनीतिक गुटों की लड़ाई में बदल सकती है। हिमाचल कांग्रेस के लिए असली सवाल अब यह नहीं है कि किस नेता ने किस पर हमला किया, बल्कि यह है कि क्या पार्टी अपने भीतर बढ़ रही नाराजगी को चुनावी चुनौती बनने से पहले नियंत्रित कर पाएगी?