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भारद्वाज के पत्र से वीरभद्र से लेकर मोदी तक की सरकार सवालों में

शिमला/शैल।भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक शिमला के विधायक पूर्व सांसद एवम् पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुरेश भारद्वाज ने केन्द्रिय गृह मन्त्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखकर प्रियंका गांधी बाड्रा के छराबड़ा में बन रहे भवन की निमार्ण अनुमति को तुरन्त प्रभाव से वापिस लेकर इस निर्माण को रोकने का आग्रह किया है। भारद्वाज ने तर्क दिया कि यह निमार्ण राष्ट्रपति आवास स्ट्रीट और कल्यानी हैली पैड के दायरे में आता है। यह दोनों ही स्थान अतिविशिष्ट लोगों के लिये है और इस कारण सह निर्माण उनकी सुरक्षा के लिये खतरा हो सकता है। खतरे के लिये तर्क देते हुए भारद्वाज ने लिखा है कि This reason is ridiculous. There is no guarantee that an SPG protectee cannot indulge in unlawful or terrorist activities. Shri P.V. Narsumha Rao, an SPG protectee was convicted in JMM Bribery case. His son Shri P.V. Prabhakar Rao another SPG Protectee was involved in Rs. 133 Crore Urea Scam. Being an SPG Protectee is not a parmanent status. it is only for one year after a Prime Minister demist office (SPG Act of 2003 (Amended) Shri Robert Vadra,husband of Smt Priyanka Gandhi Vadra is already under cloud for various fraudulent land deals. जहां प्रियंका का घर बन रहा है वहां पर 2002 में धूमल शासन के दौरान नौ सेना अधिकारी देवेन्द्र जीत सिंह ने 16 विस्वे जमीन खरीद कर वहां काॅटेज बनाने की अनुमति मांगी थी। देवेन्द्रजीत का अनुमति आग्रह आने पर प्रदेश के प्रधान सचिव गृह ने 24.08.2002 को पत्र भेजकर कहा कि वह एडीजीपी सी.आई.डी. से विचार विर्मश करके इस पर अपनी राय दें। इसमें राष्ट्रपति सचिवालय से भी राय लेने के लिये कहा गया था। इस पर 12.06.03 को वीरभद्र शासन में डीजीपी ने गृह विभाग को सूचित किया कि सुरक्षा कारणों से ऐसी अनुमति नही दी जा सकती और सरकार की इस राय से 1.7.2003 को देवेन्द्रजीत सिंह को भी सूचित कर दिया गया। इस पर देवेन्द्र जीत ने 17.8.04 को फिर सरकार को प्रतिवेदन भेजा जिसे 12.10.04 को राष्ट्रपति के सचिव को भी भेज दिया गया। इस पर 11.11.04 को राष्ट्रपति सचिवालय से यह जवाब आया "With reference to your No. Home (A) -E-(3) 42/2003 -II dated 12.10.2004, I am directed to state that the responsibility for of India when the President is at the Retreat /Shimla is that of the State Government and the state Government should give a considered opinion in the matter. However , in terms of the long -term perspective and consequences that may follow in granting such a permission and after taking due consideration some embargo may have to be placed by notifying certain area surrounding the Retreat as ' No Construction Zone , Otherwise , the possibility of other such demand snowballing on the strength of the present precedent cannot be ruled out."
राष्ट्रपति सचिवालय केे जवाब के बाद आईजीसी आई डी ने 5.11.04 को प्रधान सचिव गृह को पत्र भेजकर रीट्रीट के खसरा न0 264 से 269 तक निर्माण पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिये। इसके बाद 14.3.08 को फिर धूमल शासन में सरकार स पूछा गया कि यहां पर एक मंजिला निमार्ण की अनुमति दी जा सकती है या नही। प्रदेश सरकार ने फिर 4.4.08 को यह पत्र राष्ट्रपति के सचिव को भेज दिया जंहा से 16.5.08 को आये पत्रा के मुताबिक निमार्ण की अनुमति नही दी गयी। लेकिन सभी जानते है कि इस भवन का निमार्ण धूमल शासन मंें ही शुरू हो गया था और अब वीरभद्र शासन में वाहय निमार्ण पूरा होने के बाद आन्तरिक काम भी लगभग पूरा होने वाला है। यदि इसके डिजायन में दो बार परिवर्तन न किये जाते तो शायद धूमल शासन में ही पूरा हो जाता।
लेकिन अब सुरेश भारद्वाज के पत्रा से जो सवाल उभरे हैं उनमें यह सभी मानेगे की जिस तरह से पूर्व प्रधानमन्त्री नरसिंह राव को जे एम एम प्रकरण पर बने अपराधिक मामलें में सजा हुई है और उसके बाद उनके बेटे प्रभाकर राव को 133 करोड के यूरिया स्कैम में सजा हुई है। उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी अतिविशिष्ट व्यक्ति किसी भी अपराधिक मामलें में संलिप्त हो सकता है और यह संभावना तो हर के बारे में एक बराबर बनी रहेगी चाहे वह पूर्व में रहे शासक हों या आज के शासक हों। भारद्वाज की यह चिन्ता और आंशका सब पर एक बराबर लागू होती है।
इसी संद्धर्भ में दूसरा सवाल उठता है कि जब 5.11.04 को आई जी सी आई डी ने खसरा नम्बर 264 से 269 तक के क्षेत्र को No Construction Zone घोषित करने का आग्रह किया था तो उस पर वीरभद्र और धूमल दोनों ही सरकारों ने कोई कारवाई क्यांे नही की? दोनों ही सरकारों ने यहां पर जमीन खरीद की अनुमतियां क्यों दी। बल्कि धूमल शासन में तो पहले देवेन्द्र सिंह और बाद में प्रियंका गंाधी को अनुमति दी गयी। वीरभद्र शासन में भी यही हुआ। फिर इस अतिविशिष्ट क्षेत्र में किस तरह की निमार्ण गतिविधियां चल रही है। क्या इस बारे में केन्द्र सरकार को कभी कोई जानकारी ही नही मिल पायी? मोदी सरकार को भी सत्ता में आये दो वर्ष हो गये हैं इसलिये आज सुरेश भारद्वाज के पत्र से वीरभद्र से लेेकर मोदी तक की सरकार सवालों के घेरे में आ खडी होती है।

नेतृत्व परिवर्तन की संभानाए फिर चर्चा में

शिमला/शैल। प्रदेश में एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन की संभानाओं पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। इस बार इन चर्चाओं को परिवहन मन्त्री जी एस बाली को केन्द्रिय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के भाजपा में शामिल होने के लिये आये खुले निमन्त्रण ने जन्म दिया है। मजे की बात यह है कि इस निमन्त्रण पर बाली ने भी कोई प्रतिक्रिया नही दी है। कुछ दिनों से बाली और वीरभद्र के रिश्तों को लेेकर भी काफी चर्चाएं हैं। इन्ही चर्चाओं के बीच स्वास्थ्य मन्त्री ठाकुर कौल सिंह के विक्रमादित्य के प्रति आये बदलाव ने भी कई हल्कों में कई अटकलों को जन्म दे दिया है। यह संयोग है कि इन अटकलों के संकेत उभरने के बाद ही सीबीआई ने वीरभद्र सिंह से पूछताछ का दौर शुरू किया है। माना जा रहा है कि इस पूछताछ के दौर के शुरू होने के बाद शीघ्र ही इस संद्धर्भ में चालान अदालत में दायर होने की संभावना भी बढ़ जायेगी। जून के अन्त तक सीबीआई और ईडी की जांच प्रक्रिया भी पूरी हो जाने की उम्मीद है।
सीबीआई और ईडी की जांच में अब तक जो कुछ सामनें आ चुका है। उसके बाद यह तय है कि इन जांचोें के अन्तिम परिणाम स्वरूप जो चालान अदालत में जायेंगे उनपर चार्ज लगने की संभावनाएं पक्की हैं। चार्ज लगने के बाद कांगे्रस हाईकमान और स्वयं वीरभद्र पर भी नेतृत्व में बदलाव के लिये दवाब बढ़ जायेगा। यह वह स्थिति होगी जिसमें कांगे्रस विधायक दल के अन्दर भी हर रोज समीकरण बनने और बदलने शुरू हो जायेगे। वीरभद्र इस स्थिति में यदि विधानसभा भंग करवाकर समय से पहले ही चुनाव करवाने का प्रस्ताव रखेंगे तो शायद उनके प्रस्ताव को पूरा समर्थन नहीं मिल पायेगा। क्योंकि वीरभद्र के पास अब ऐसी ऐज और स्टेज नही बची है जिसमें एक बार फिर उनसे नेतृत्व की उम्मीद की जा सके। राजनीतिक विश्लेषक और सीबीआई तथा ईडी में चल रहे मामलों पर पैनी नजर रखने वाले आश्वस्त हैं कि अब इस प्रकरण में वीरभद्र और उनके सलाहकार जिस तरह की गल्तीयां कर चूके हैं उनको सामने रखते हुए उनके बच निकलने के रास्ते लगभग बन्द हो चुके हंै। जानकार मानते हैं ईडी मामलें में पूरे परिवार के साथ कुछ अन्य संबधियों के लिये भी कठिनाई खड़ी हो सकती है।
विश्लेषकों का मानना है किइस बार वीरभद्र की विजिलैन्स उनको वांच्छित परिणाम नहीं दे पायी है क्योंकि जिस स्तर पर धूमल के खिलाफ कारवाई शुरू की गयी थी उसके इस संद्धर्भ में अब तक ठोस परिणाम सामने आ जाने चाहिए थे। लेकिन इन मामलों में करोडों रूपये वकीलों को फीस देने के बाद भी परिणाम का शून्य रहना पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खडे़ करता है। इसमें भी सबसे हैरत वाली बात तो यह है कि वीरभद्र इन मामलों पर जितने ब्यान और दावे दागते रहे हैं उस अनुपात में उनकी नाक के नीचे जो कुछ पकता रहा उसे वह समझना तो दूर सूंघ भी नही पाये। जब सीबीआई और ईडी ने उनके खिलाफ मामले बनाये थे उन्हें तभी ही मुख्यमन्त्री की कुर्सी छोड़कर पार्टी की बागडोर अपने हाथ में ले लेनी चाहिए थी। क्योंकि इन मामलों में कहां क्या चूक हो चुकी है। इसके बारे में उनसे ज्यादा और कोई नही समझ सकता था। बल्कि इस मामले में जिस तरह से परिवार के सदस्यों की भूमिका सामने आ रही है उसे देखते हुए यह लगता है कि इन लोगों में भी राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी रही है। क्योंकि सलाहकारों के तो अपने अपने स्वार्थ थे जो कि वीरभद्र के सत्ता में रहने से ही पूरे होने थे। यदि उस समय मुख्यमन्त्री पद को छोड़कर पार्टी की अध्यक्षता संभाली होती तो उस समय राज्यसभा में जाने से भी कोई रोक नही पाता । राज्यसभा में छः वर्ष का कार्यकाल मिल जाता और इस अवधि में परिवार को भी प्रदेश की राजनीति में स्थापित कर पाते। लेकिन आज वीरभद्र के हाथ से यह सारे विकल्प निकल चुके हैं। अब केवल यह देखना वाकी है कि वह बदली परिस्थितियों में किस तरह का कदम उठाते हैं।
लेकिन यह तय माना जा रहा है कि अब नेतृत्व परिवर्तन के सवाल को ज्यादा समय तक टाला नही जा सकेगा।

धूमल हुए आक्रामक अधिकारियों को दी चेतावनी

शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमन्त्री एवम् वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल ने एक वक्तव्य में उन अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करने की बात कही है जिन्होंने भाजपा नेताओं के खिलाफ झूठे मामले बनाकर उन्हे परेशान करने का प्रयास किया है। धूमल ने यह प्रतिक्रिया अनुराग ठाकुर एवम् अन्य के खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने को लेकर बनाये गये मामले में आये प्रदेश उच्च न्यायालय के फैंसले पर दी है। धूमल की यह प्रतिक्रिया बिल्कुल सही समय पर आयी है। क्योंकि अब चुनाव का समय आ गया है। वीरभद्र के इस कार्यकाल में जिस तरह से एच पी सी ए के खिलाफ मामले बनाये गये थे यदि यह मामले सफल हो जाते तो निश्चित तौर पर ध्ूमल परिवार को राजनीति से बाहर होने की स्थिति बन सकती थी। लेकिन यह धूमल का प्रबन्धन और सौभाग्य था कि संयोगवश वीरभद्र के विश्वस्तों की टीम के हर सदस्य का एच पी सी ए में अच्छा खासा योगदान रहा है। इसी का परिणाम है कि अब तक चार मामलों में वीरभद्र और उसकी सरकार को ऐसा झटका लग चुका है जिसका फल चुनावों में देखने को मिलेगा। क्योंकि यदि एक भी मामला आगे बढ़ जाता है तो पार्टी के भीतर बगावत के स्वर इतने उंचे हो जाते जिन्हे रोकना संभव न होता।
इस समय प्रदेश भाजपा में धूमल के नेतृत्व को कोई प्रत्यक्ष चुनौति नही रह गई है। क्योंकि जे पी नड्डा को जानने वाले यह मानते हैं कि नड्डा भी शान्ता की तरह प्रत्यक्ष लड़ाई लड़ने का साहस नहीं रखते हैं। शान्ता कुमार ने धूमल को घरने के लिए जिस तरह से धूमल के दानों कार्यकालों में अपनी टीम को आगे किया था आज उस टीम का हर सदस्य शान्ता को छोड़ चुका है क्योंकि शान्ता ने कभी भी विरोध और विद्रोह का नेतृत्व आगे आकर नहीं किया है। बल्कि शान्ता के कारण ही उनके हर साथी का राजनीतिक नुकसान हुआ है। आज शान्ता के समर्थकों को अपना आका तलाशने का संकट है। इसलिए शान्ता के बाद नड्डा भी लगभग इसी स्थिति में माने जा रहे हैं। क्योंकि होटल यामीनि और विवेकानन्द ट्रस्ट के स्वार्थों ने शान्ता को वीरभद्र के आगे इतना कमजोर कर दिया है कि वीरभद्र की प्रशंसा उनकी बाध्यता बन चुकी है। इसी तरह जब भाजपा शासन में नड्डा के पिता को शिक्षा बोर्ड धर्मशाला का अध्यक्ष पद मिला था और बीच में ही भाजपा सरकार चली गई थी। तब उसके बाद आयी वारभद्र सरकार ने उनको हटाने की बजाये कार्यकाल पूरा करने दिया था। वीरभद्र का रस्मी पैंतरा इतना सफल रहा कि आज तक नड्डा वीरभद्र का रस्मी विरोध करने से आगे नही बढ़ पाये हैं। वीरभद्र के खिलाफ सी बी आई और ई डी में चल रहे मामलों में नड्डा का योगदान रस्म अदायगी तक ही सीमित रहा है।
दूसरी और धूमल ने अपने दोनांे शासन कालों में वीरभद्र को ऐसा घेरे रखा है कि उसकी पीड़ा से वीरभद्र आज भी हर समय कराहते मिल जाते हैं। फिर अब तो धूमल के बेटे अनुराग के बी सी सी आई का अध्यक्ष बनने के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। इस बदले परिदृश्य में अनुराग ने भी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया है यह आम चर्चा है कि अब अनुराग को मोदी सरकार में खेल राज्य मन्त्राी का पद आॅफर किया था। अनुराग ने बड़ी कृतज्ञता के साथ इसके लिए आभार व्यक्त करते हुए इस आॅफर को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि उन्हे अपने लिए मन्त्राी पद के बजाये प्रेम कुमार धूमल को प्रदेश का अगला मुख्यमन्त्राी घोषित किया जाये। आज पार्टी के अन्दर अनुराग का कद इतना बड़ा हो गया कि मोदी भी उनके इस आग्रह को अस्वीकार नहीं करेंगे।
इस वस्तुस्थिति में अब धूमल को केवल यही सुनिश्चित करना है कि वह वीरभद्र के खिलाफ चल रहे मामलों को शीघ्रातिशीघ्र निर्णायक अंजाम तक पंहुचाने में पूरा दम लगा दें। क्योंकि धूमल के खिलाफ वीरभद्र के हर मामले के असफल होने के राजनीतिक परिणामों को सामने रखते हुए वीरभद्र एक बार फिर प्रयास करेंगे कि धूमल के खिालाफ कोई पुख्ता मामला खड़ा किया जा सके जिसके चलते भाजपा के अन्दर धूमल कि खिलाफ विरोध के स्वर उभारने की जमीन तैयार हो जाये। क्योंकि यह तय है कि धूमल के सत्ता में आने से वीरभद्र परिवार को आगे राजनीति में बने रहना आसान नहीं होगा।

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