Saturday, 20 June 2026
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रामदेव प्रकरण में वीरभद्र का यू टर्न क्यों?

शिमला/बलदेव शर्मा
वीरभद्र सिंह ने शासनकाल के अन्तिम वर्ष में योग गुरू रामदेव के भूमि प्रकरण में यू-ट्रन लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कांे में एक चर्चा को जन्म दिया है जिसका प्रभाव दूरगामी होगा। क्योंकि 2012 के चुनावों से पूर्व जब वीरभद्र ने प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला था उस समय धमूल शासन के खिलाफ एक ही बड़ा आरोप ‘हिमाचल आॅन सेल’ का लगाया गया था। आरोप था कि हिमाचल गैर हिमाचलीयों को बेचा जा रहा है क्योंकि प्रदेश के भू- सुधार अधिनियम 1972 की धारा 118 के तहत गैर हिमाचली और गैर कृषक प्रदेश में सरकार की पूर्व अनुमति के बिना जमीन नहीं खरीद सकते। इस अधिनियम के तहत बने नियम 38 -। के मुताबिक गैर कृषक और गैर हिमाचली सरकार की अुनमति के साथ भी आवास के लिये 500 वर्ग मीटर और दूकान/उद्योग आदि के लिये 300 वर्ग मीटर से अधिक की, खरीद नही कर सकते। इस अधिनियम में 1988 और 1994 में हुए संशोधन में भी नियम 38-। में कोई बदलाव नही लाया गया था। इससे अधिक जमीन केवल जनहित में ही खरीदी जा सकती है अन्यथा नही। धूमल शासन में बाबा रामदेव के ट्रस्ट पतंाजलि योगपीठ के नाम पर सोलन के कल्होग में 96.2 बीघा जमीन खरीद की अनुमति दी गयी थी। लेकिन इस अनुमति के तहत 17,81,214 रूपये मंे जो 96.2 बीघा जमीन खरीदी गयी वह राजस्व दस्तावेजों के अनुसार आचार्य बाल कृष्ण के नाम है न कि पतंाजलि योगपीठ के।क्योंकि इसमें बालकृष्ण खरीददार हैं और उनका पता पतंाजलि योगपीठ है यदि खरीददार पतांजलि योगपीठ होता तो उसमें बालकृष्ण का नाम पतांजलि योगपीठ द्वारा बालकृष्ण आना चाहिये था जो कि ऐसा है नही। शैल ने 6 जून 2011 के अंक में दस्तावेजों सहित यह प्रकरण पाठकों के सामने रखा था।
वीरभद्र सरकार ने इसी आधार पर 2013 में इस खरीद को रद्द किया और फिर संबधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला तक दर्ज किया गया जो कि अभी तक लंबित है। पतांजलि योगपीठ ने सरकार द्वारा इस खरीद को रद्द किये जाने को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। यह मामला भी उच्च न्यायालय में लंबित है यह पूरा मामला इसी स्थिति में बना हुआ है। ऐसे में अचानक वीरभद्र द्वारा इस मामले में यू टर्न लेना स्वाभाविक रूप से सवाल खडे़ करेगा ही। इस मामले में सरकार के दो मन्त्रिायों ने भी यू टर्न लिये जाने का विरोध किया है। क्योंकि इस यू टर्न से यह स्थापित होता है कि वीरभद्र सरकार ने धूमल शासन में घटे जिन भी मामलों में कारवाई की है वह सब राजनीति से प्रेरित रही हैं। वीरभद्र सरकार बदले की भावना से कार्य करती रही है। वीरभद्र सरकार हिमाचल आॅन सेल के एक भी आरोप को अब तक प्रमाणित नही कर पायी है ऐसे में शासन काल के इस अन्तिम वर्ष में इस तरह का यू टर्न लेना आने वाले चुनावों में कांग्रेस की सेहत के लिये किसी भी गणित से लाभदायक सिद्ध नहीं हो सकता है। यह तय है। क्योंकि वीरभद्र सरकार जब यह जमीन रामदेव को वापिस देने के लिये तैयार हो गई है उसने मन्त्रिमण्डल की बैठक में इस आश्य का फैसला ले लिया है तो इसका अर्थ होता है कि धूमल शासन ने इसमें कुछ भी गलत नही किया था। क्यांेकि हर्बल गार्डन की स्थापना को जनहित करार दिया जा सकता है। फिर जिन अधिकारियों के खिलाफ इस संद्धर्भ में मामला दर्ज किया गया है अब वह सरकार के खिलाफ प्रताड़ना और उत्पीड़न का मामला दर्ज कर सकते हैं। जिन अधिकारियों ने इस खरीद को रद्द करने की संस्तुति की है उनके खिलाफ भी ट्रस्ट के उत्पीड़न का मामला बनता है। वीरभद्र के इस यू-टर्न से यह सारे पक्ष जुड़े हुए हैं।
अब यह सवाल उठता है कि जब इस फैसले से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ मामला बन सकता है और कांग्रेस को भी चुनावों में इससे कोई लाभ नही मिलेगा तो फिर वीरभद्र ने इन सारे तथ्यों को नजर अन्दाज करके ऐसा फैसला क्यों लिया जिसमें कुछ मन्त्री भी सहमत नही रहे हांे। क्या इसमें सबसे हटकर वीरभद्र का कोई और बड़ा हित छिपा है। सचिवालय के गलियारों में फैली चर्चा के अनुसार इस यू ट्रन के लिये वीरभद्र के खिलाफ चल रहे सीबीआई, ईडी और आयकर के मामलों को आधार बनाया गया है। चर्चा है कि पिछले दिनों प्रदेश के पुलिस प्रमुख को बदलने और उनके स्थान पर नये व्यक्ति को लाने का जो ताना बाना बुना गया था उसमें यह परोसा गया था कि नया व्यक्ति बाबा रामदेव के निकट है और उसकी निकटता का लाभ उठाकर उसके माध्यम से प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी तक पहुंचा जा सकता है। चर्चा है कि इसमें ऐसे पत्राकारों ने भी भूमिका अदा की है जो कि राजभवन के भी निकट हैं। संयोगवश जब पुलिस प्रमुख को बदलने की चर्चा उठी उसी दौरान बाबा रामदेव के प्रसंग मंे भी कारवाई शुरू हुई जो कि मन्त्रिमण्डल के फैसले तक पहुंच गयी। अब रामदेव के मामले में तो सरकार अन्तिम बिन्दु तक पहुंच गयी है। यदि अब सरकार इससे पीछे हटना चाहे तो भी नहीं हट पायेगी। क्योंकि सरकार के फैसले का रामदेव को अदालत में लाभ मिल जायेगा। लेकिन क्या इस सारी यू टर्न से वीरभद्र का नरेन्द्र मोदी से मिलना संभव हो पायेगा? जिस स्टेज पर वीरभद्र के मामले पहुंच चुके हंै वहां क्या इन मामलों को अब खत्म किया जा सकेगा।

वीरभद्र और विक्रमादित्य ने क्यों बदला स्टैण्ड

शिमला/बलदेव शर्मा
वीरभद्र सिंह ने शिमला ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को अपने सरकारी आवास ओकओवर में संबोधित करते हुए घोषणा की थी कि अगले चुनाव में शिमला ग्रामीण से उनके स्थान पर उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह प्रत्याशी होंगे। उन्होने कार्यकर्ताओं से अपने बेटे के लिये पूरा सक्रिय समर्थन मांगा और साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि शिमला ग्रामीण के लोगों को उनका सहयोग भी बराबर मिलता रहेगा। वीरभद्र ने शिमला ग्रामीण से अपने बेटे की उम्मीदवारी की घोषणा करके दूसरे लोगों को यह सोचने पर लगा दिया कि ऐसे में वीरभद्र स्वयं कहां से चुनाव लडेंगे। क्योंकि जब उनको सातवी बार मुख्यमन्त्री बनाने की घोषणा विद्या स्टोक्स जैसी वरिष्ठ मन्त्री कर चुकी है तो स्वाभाविक है कि वो कहीं से तो चुनाव लडेंगे ही। इसी के परिणामस्वरूप पार्टी के अन्दर उनकी घोषणा को लेकर प्रति क्रियाएं भी उभरी। लेकिन इस घोषणा के तीसरे ही दिन विक्रमादित्य का ब्यान आ गया कि उनके चुनाव क्षेत्र के बारे में हाईकमान ही फैसला लेगी। विक्रमादित्य सिंह के बाद स्वयं वीरभद्र सिंह ने यह ब्यान दे दिया कि उन्होने यह सब हल्के लहजे में कहा था और अभी इस बारे में कोई फैसला नही हुआ है।
वीरभद्र और विक्रमादित्य सिंह को जानने वालों के लिये इनका स्टैण्ड बदलना एक गंभीर राजनीतिक कदम है। क्योंकि वीरभद्र ने हर बार अपने लिये कुर्सी का प्रबन्ध हाईकमान से लड़कर ही किया है। अब विक्रमादित्य को विधानसभा में देखने के लिये वीरभद्र सिंह को उसके लिये एक सुरक्षित चुनाव क्षेत्र का प्रबन्ध तो करना ही पड़ेगा। फिर अपने चुनाव क्षेत्र से ज्यादा सुरक्षित स्थान और कौन सा हो सकता है। शिमला ग्रामीण में वीरभद्र सैंकड़ो करोड़ के विकास कार्यो की घोषणा पहले ही कर चुके है। महत्वपूर्ण कांग्रेस कार्यकर्ताओं/नेताओं की रोजी रोटी का भी अच्छा जुगाड़ किया जा चुका है। ऐसे में यह तय है कि विक्रमादित्य शिमला ग्रामीण से ही उम्मीदवार होंगे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वीरभद्र ने अपना स्टैण्ड क्यों बदला? क्या हाईकमान के स्तर पर वीरभद्र घोषणा को गंभीर से लिया गया है। क्योंकि पिछले दिनों जब राहूल गांधी धर्मशाला आये थे उस समय परिवहन मन्त्री जी एस बाली को जिस ढंग से मंच पर जगह नही दी गयी थी उसको लेकर जो तनाव उभरा था वह अब तक बरकरार है। उसके बाद ही बाली को उत्तराखण्ड में जिम्मेदारी मिली। जिसका राजनीतिक हल्कों में यह सन्देश गया था कि अब बाली वीरभद्र पर भारी पडते जा रहें है।
इसके अतिरिक्त वीरभद्र सिंह ने सुक्खु से प्रदेश अध्यक्ष छीनने के लिये सब कुछ दाव पर लगा दिया है। हर्षमहाजन और आशा कुमारी वीरभद्र सिंह की अध्यक्ष पद के लिये पहली पंसद है। इनके बाद सुधीर शर्मा है। लेकिन वीरभद्र सिंह अभी तक अपनी इस गेम में सफल नही हो पा रहे है। सूत्रों की माने तो अब जब वीरभद्र ने विक्रमादित्य की उम्मीदवारी घोषित की तो उनके विरोधियों ने इसकी जानकारी तुरन्त हाईकमान तक पहुंचा दी और हाईकमान ने इस पर अप्रसन्नता जाहिर की है। हाईकमान की अप्रसन्नता के कारण ही वीरभद्र ने अपना स्टैण्ड बदला है। माना जा रहा है कि हाईकमान ने एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट देने के फैसले पर कडाई से अमल करने का मन बना लिया है। अभी जो विधानसभा चुनाव हो रहे है उनमे भी इस सिद्धान्त पर अमल किया गया है। इस बार यदि पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हो जाती है और उत्तर प्रदेश में भी उसकी परफारमैन्स बेहतर रहती है। तो निश्चित रूप से कांग्रेस हाईकमान को इससे ताकत मिलेगी। इससे कांग्रेस की पूरी बागडोर राहूल गांधी के नियन्त्रण में आ जायेगी। माना जा रहा है कि वीरभद्र कमजोर हाईकमान को आंखे दिखाकर अपनी ईच्छानुसार प्रदेश में अपनी सुविधा के मुताबिक फैंसले ले लेते है लेकिन इस बार राहूल गांधी के साथ भी ऐसा कर पायेंगेे इसको लेकर जो सन्देह माना जा रहा है। फिर यूपी चुनावों में राम मन्दिर को लेकर जो ब्यान दिया है वह एकदम कांग्रेस की अब तक की घोषित लाईन से एकदम विपरीत रहा है। इसी तरह का एक ब्यान वीरभद्र आरक्षण को लेकर भी दे चुके है। यह दोनोें ब्यान आरएसएस और भाजपा की लाईन के समर्थन की गन्ध देतेे है वीरभद्र जैसा वरिष्ठ नेता इन मुद्दोें पर पार्टी लाईन से हटकर क्यों स्टैण्ड ले रहा है? क्या हाईकमामन ऐसेे स्टैण्ड को स्वीकार कर पायेगी? माना जा रहा कि वीरभद्र के इन ब्यानों को भी हाईकमान ने गंभीरता से लिया है? संभवतः इसी के कारण वीरभद्र को अपना स्टैण्ड बदलना पड़ा हैै।

उच्च न्यायालय के निर्देशों को फिर अंगूठा दिखाने की तैयारी में वीरभद्र सरकार


शिमला/बलदेव शर्मा
प्रदेश में अवैध भवन निमार्ण और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे दो ऐसे मसले है जिन पर उच्च न्यायालय भी अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए इन मामलों के लिये दोषी प्रशासनिक तन्त्र के खिलाफ कड़ी कारवाई करने के निर्देश दे चुका है। लेकिन न्यायालय का सम्मान करने की दुहाई देने वाली वीरभद्र सरकार ने इन मामलों में आये अदालती निर्देशों को अंगूठा दिखाते हुए अवैधताओं को नियमित करने का रास्ता अपना लिया है। स्मरणीय है कि शिमला और प्रदेश के अन्य भागों में हजारों की संख्या में अवैध भवन निर्माण है जबकि प्रदेश में टीसीपी एक्ट लागू है। लेकिन इस एक्ट के खिलाफ जाकर सरकार अवैध निर्माणो को नियमित करने के लिये नौ बार नियमों में ढील देकर रिटेन्शन पालिसियां ला चुकी है। हर बार लायी गयी पाॅलिसि के साथ यही कहा जाता रहा है कि यह अन्तिम बार है। लेकिन यह अन्तिम बार कभी नही आयी। इस बार तो प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसका कडा संज्ञान लेते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने के निर्देश जारी किये थे। लेकिन इसका सरकार पर यह असर हुआ कि निर्देशों को अंगूठा दिखाते हुए विधान सभा में टीसीपी एक्ट में ही संशोधन का प्रस्ताव लेकर आ गयी जो कि ध्वनि मत से सदन में पारित हो गया।
विधानसभा से पारित होकर यह संशोधित विधेयक राजभवन पहुंचा। राज्यपाल ने भी उच्च न्यायालय की चिन्ता को स्वीकारते हुए इसको अपनी स्वीकृति देकर राजभवन में रोक लिया लेकिन राज्यपाल को भी अन्त में राजनीतिक दबाव के आगे झुकना पड़ा। क्योंकि सबसे पहले भाजपा ने ही राजभवन पहंुच कर इस संशोधित विधेयक को स्वीकृति देने के लिये राज्यपाल पर दबाव डाला भाजपा के बाद कांग्रेस ने राजभवन में दस्तक दी और इसे स्वीकार करने का आग्रह किया। राजभवन ने वाकायदा पत्र लिखकर सरकार से पूछा कि उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दोषी अधिकारियों के खिलाफ सरकार क्या कारवाई करने जा रही है और राजभवन के इस सवाल का मुख्यमन्त्री ने सार्वजनिक ब्यान देकर जबाव दिया कि सरकार की कारवाई करने की कोई मंशा नही है। मुख्यमन्त्री के इस ब्यान के बाद राजभवन ने इस संशोधन पर अपनी मोहर लगा दी है और अवैधता को नियमित करने का यह एक्ट लागू हो गया है।
इसी तर्ज पर अब वीरभद्र सरकार अवैध जमीन कब्जों को नियमित करने के लिये उच्च न्यायालय के समक्ष एक पालिसी रखने जा रही है। स्मरणीय है कि प्रदेश में सरकारी भूमि पर लाखों की संख्या में अवैध कब्जे है। प्रदेश उच्च न्यायालय इन अवैध कब्जोें का कड़ा संज्ञान लेकर इनको हटाने के कई आदेश पारित कर चुका है। अपने आदेशों पर अमल सुनिश्चित करने के लिये उच्च न्यायालय संबद्ध शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारी भी लगा चुका है। इन आदेशों पर आंशिक रूप से अमल भी हुआ है। लेकिन उच्च न्यायालय की गयी कारवाई की रफतार से संतुष्ट नही था। इस लिये अपने अन्तिम निर्देशों में उच्च न्यायालय ने राज्य प्रशासन के साथ ही भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को भी निर्देश जारी किये थे कि अवैध कब्जों के मामलों में ईडी मनीलाॅंडरिग प्रावधानों के तहत कारवाई करे। राज्य के वन विभाग को भी निर्देश दिये थे कि वह इन मामलों से जुड़ा सारा रिकार्ड तुरन्त प्रभाव से ईडी को भेजे। अदालत के इन निर्देशांे पर सचिव वन की ओर से विभाग को दो बार पत्र भेज कर यह कहा गया था कि उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार इन मामलों से जुडे रिकार्ड को भेजा जाये। सचिव वन के पत्र के बाद विभाग ने भी इस पर अपली कारवाई डालते हुए नीचे जिला स्तर पर पत्र भेज दिया है। लेकिन इस पर व्यवहारिक रूप से क्या कारवाई हुई है। इसपर विभाग पूरी तरह खामोश है।
स्मरणीय है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों को नियमित करने के लिये वर्ष 2002 में तत्कालीन धूमल सरकार ने एक योजना बनाई थी। इस पर तत्कालीन राजस्व मन्त्री ने योजना बनाकर प्रदेश के लोगों से आग्रह किया था कि वह स्वेच्छा से शपथपत्र देकर अपने-अपनेे अवैध कब्जों की सरकार को जानकरी दे। सरकार के इस आग्रह पर करीब पौने दो लाख लोगों ने सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे स्वीकारे थे। लेकिन उसी दौरान इस योजना को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। इस पर उच्च न्यायालय ने इन मामलों में सरकार के स्तर पर अन्तिम फैसला लेने से अदालत का फैसला आने तक रोक लगा दी। तब से यह मामला अदालत में लंबित चल रहा है। लेकिन इसी बीच अवैध कटान और अवैध कब्जों को लेकर कई और मामले अदालत के सामने आ गये। इन अदालत ने सरकार से वन भूमि और दूसरी सरकारी भूमि पर हुए अवैध कब्जो की अलग-अलग जानकारी मंागी। इस पर जो जानकरी अदालत में आयी है उसमें वन भूमि पर ही हजारों में अवैध कब्जे सामने आये है। इसके बाद दस बीघे या इससे अधिक की भूमि पर कब्जों की सूची मांगी गयी। इसमें भी हजारों की संख्या सामने आयी है। वनभूमि पर सबसे अधिक अवैध कब्जे शिमला के रोहडू में सामने आये है। प्रदेश के राजस्व की जानकारी रखने वालों के मुताबिक यहां पर अधिकांश में खाली जमीन पर वन भूमि का इन्दराज है। लगभग 90प्रतिशत  खाली जमीन पर फाॅरेस्ट का इन्दराज है। इसी कारण विकास भूमि के हर कार्य के लिये केन्द्र सरकार के वन मन्त्रालय से पूर्व स्वीकृति लेने की आवश्यकता रहती है और आज सैंकडो ऐसे मामले केन्द्र के पास लंबित पडे़ है।
अदालत के निर्देशानुसार अब इन अवैध को लेकर देर-सवेर कारवाई करनी ही पड़ेगी की स्थिति बन गयी है। वन भूमि पर कोई भी फैसला लेने का अधिकार राज्य सरकार को नही और अधिकांश अवैध कब्जे वनभूमि पर है। वीरभद्र सरकार को लेकर आम आदमी में यह धारणा बन चुकी है कि यह सरकार हर अवैधता को नियमित करने के लिये हर समय तैयार रहती है। इसी धारणा के तहत राजस्व मन्त्री कौल सिंह की अध्यक्षता में अवैध कब्जों को लेकर नीति बनाने के लिये कमेटी गठित की गयी है। लेकिन अब यह मामला उच्च न्यायालय के भी संज्ञान में है और वनभूमि को लेकर केन्द्र सरकार भी बीच में आयेगी। ऐसे में क्या वीरभद्र सरकार इस अवैधता को भी नियमित करने का जोखिम उठा पायेगी?

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