शिमला/शैल। इन लोकसभा चुनावों में यह पहली बार हुआ है जब प्रदेश के किसी नेता को बदजुबानी के लिये चुनाव आयोग ने उसके प्रचार करने पर प्रतिबन्ध लगाया हो। प्रदेश में यह सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती के साथ हुआ है। उन्हें बदजुबानी के लिये चुनाव आयोग एक बार 48 घन्टे का प्रतिबन्ध लगा चुका है। एक बार सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। लेकिन अब तीसरी बार फिर उनके खिलाफ चुनाव आयोग को शिकायत गयी है। इस बार आरोप है कि मण्डी की एक जनसभा में अपने विरोधीयों को सार्वजनिक मंच से यह धमकी दे डाली कि जो उनके नेतृत्व के खिलाफ अंगूली उठायेगा
बदले में उसका बाजू काट दिया जायेगा। सत्ती का यह ब्यान चुनाव आयोग की एक बार कारवाई और दूसरी बार चेतावनी के बाद आया है। सत्ती के इस ब्यान की पार्टी के शीर्ष नेताओं शान्ता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और मुख्यमन्त्री जयराम में से किसी ने भी निन्दा नही की है। बल्कि मुख्यमन्त्री ने तो एक तरह से इस ब्यान का समर्थन किया है। मुख्यमन्त्री के समर्थन से यह गाली देना एक रणनीति बन जाती है। क्योंकि पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमन्त्री से बड़ा कोई पद नही होता है। इनसे ऊपर केवल जनता ही होती है। ऐसे में गाली की इस रणनीति का राजनीतिक संद्धर्भों में आकलन करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि राजनीति में अपने से बड़े को ही गाली दी जाती है अपने बराबर वाले और छोटे को गाली की बजाये उससे सवाल पूछे जाते हैं।
इस समय केन्द्र और राज्य में दोनों जगह भाजपा की ही सरकारे हैं। इसलिये स्वभाविक है कि इन्ही से सवाल पूछे जायेंगे। 2014 के चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने देश की जनता से कुछ वायदे किये थे। इन वायदों पर भरोसा करके जनता ने इन्हे सत्ता सौंपी थी। आज यह वायदे कितने पूरे हुए हैं यह तो इन्ही से सवाल करके पूछा जायेगा और यह सवाल पूछने पर यदि गाली और धमकी मिलेगी तो यह निश्चित है कि इन वायदों की दिशा में कुछ नही हुआ है। इसके लिये सवाल पूछने वाले को ध्मकी और गाली से चुप करवाया जा रहा है। प्रदेश विधानसभा के चुनावों में भी कुछ वायदे किये गये थे। इन वायदों के लिये तो मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर और प्रदेश अध्यक्ष सत्ती से ही सवाल पूछे जायेंगे। विधानसभा चुनावों के दौरान मण्डी की एक जनसभा में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने तब के मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह से 72000 करोड़ का हिसाब मांगा था। इस हिसाब मांगने के माध्यम से प्रधानमन्त्री ने प्रदेश की जनता को यह बताया था कि उनकी सरकार ने प्रदेश को 72000 करोड़ की सहायता दी है जिसे सरकार ने गलत तरीके से खर्च किया है। लेकिन मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने नौ मार्च 2018 को अपने बजट भाषण में यह आंकड़ा 46793 करोड़ बताया है जिसका अर्थ है कि करीब 26000 करोड़ की गलत ब्यानी की गयी थी इसी तरह प्रदेश को 69 राष्ट्रीय राजमार्ग देने का आंकड़ा परोसा गया। इसके लिये बाकायदा नितिन गडकरी का जेपी नड्डा के नाम लिखा पत्र खूब भुनाया गया। लेकिन इसका आजका सच यही है कि यह सबकुछ सिद्धान्त रूप में ही है व्यवहार मे कुछ नही। ऐसे दर्जनो आंकड़े हैं जो सरकार की गलत ब्यानी को उजागर करते हैं सरकार ने लोक सेवा आयोग में तो दो पद सदस्यों के सृजित करके एक को भर भी दिया। लेकिन प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के खाली पड़े पद आज तक नही भरे गये जहां से कर्मचारियों को राहत मिल सकती थी।
आज राष्ट्रीय स्तर पर जो सवाल पूछे जा रहे हैं क्या उनका जवाब गाली के रूप में ही दिया जायेगा यह सवाल उछलने लगा है। 2014 के चुनावों में यह नही कहा गया था कि यह वायदे पूरे करने के लिये 60 महीने नही 60 वर्ष लगेंगे। क्योंकि आज हर असफलता के लिये कांग्रेस के पिछले कार्यकालों को कोसा जा रहा है। लेकिन आज भाजपा के इस कार्यकाल के बाद स्वभाविक रूप से इसका कांग्रेस के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया जायेगा। आज जो सवाल चर्चा में चल रहे हैं वह पाठकों के सामने रखे जा रहे हैं क्योंकि आज जनहित में इन सवालों को एक मंच दिया जाना सरोकारी पत्राकारिता का कर्तव्य बन जाता है।
यह हैं कुछ बड़े सवाल
कहां है 10 करोड़ रोजगार?
कहां है 15-15 लाख?
कहां है 100 स्मार्ट सिटी?
क्या हुआ गोद लिये 282 गांव का?
कहां है 40 के निचे पेट्रोल डीजल?
कहां है 40 के निचे डाॅलर?
कहां है राम मन्दिर?
क्यों नही हटाई 370 धारा?
क्यों घटाया देश का रक्षा बजट?
क्यों घटाया शिक्षा का बजट?
क्यों देश की जीडीपी 2% तक गिरी?
क्यों 1.5 करोड़ लोगों की नौकरी गयी?
क्यों 177% आतंकी घटनायें बढ़ी?
कहां है कालाधन? 100दिनों में बोला था।
क्यों 93% ज्यादा हमारे सैनिकों की शहादत को रही है?
क्यों नोटबंदी से छोटे बिजनस की कमर तोड़ी?
क्यों देश में नारी सुरक्षित नहीं है?
क्यों गंगा मैया साफ नही हुई?
कहां किसानों की आमदनी बढ़ी?
क्यों महंगाई कम नही हुई?
देश की आज़ादी के बाद पहली बार सराफा बाजार 43 दिनों तक बन्द क्यों रहा?
मोदी की विदेश यात्रा पर खर्च 2000 करोड़, पटेल की मूर्ती पर खर्च 3500 करोड़, बीजेपी के नए राष्ट्रीय मुख्यालय पर खर्च करीब 1500 करोड़, इस तरह कुल 7000 करोड़ का खर्च क्यों?
अपने पूंजीपति मित्रों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए 11 लाख वन रक्षक आदिवासियों को उनकी जमीनों औऱ उनके घरों से बेदखल करके उन्हें हथियार उठाने को मजबूर होना पड़ा क्यों?
ललित मोदी 5000 करोड़, विजय माल्या 9000 करोड़, मेहुल चैकसी 11600 करोड़, नीरव मोदी 11 हजार करोड़, इस प्रकार 36600 करोड़ की लूट कैसे हो गई?
विपक्ष मे रहकर FDI , आधार, GST का विरोध करते थे लेकिन सत्ता में आकर यू टर्न क्यों?
देश के पैसों से विज्ञापनों द्वारा (करीब 5 हजार करोड़) का निवेश किस मीडिया पर?
मौजूदा RBI गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल में अपनी राजनितिक हितों की पूर्ति के लिए 28 हजार करोड़ का ऋण क्यों?
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने 960 मैगावाट की जंगी थोपन पवारी जल विद्युत परियोजना के लिये वर्ष 2006 में निविदायें आमन्त्रित की थी। यह निविदायें आने के बाद यह परियोजना नीदरलैण्ड की कंपनी एनवी ब्रेकल को आबंटित कर दी गयी थी। लेकिन ब्रेकल इसमें तय समय के भीतर 280 करोड़ के अपफ्रंट प्रिमियम की रकम अदा नही कर पायी। इसके लिये कई बार समय की मोहलत लेने के बावजूद भी जब यह रकम जमा नही करवायी गयी तब इस पर रिलाॅन्यस इन्फ्रा ने ऐतराज उठाया क्योंकि वह निविदा में दूसरे स्थान पर था। इसको लेकर उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक मामला जा चुका है। जब ब्रेकल यह रकम जमा नही करवा पाया था तब उसके खिलाफ आपराधिक मामला तक दर्ज हुआ था। इस मामले की जांच में यह सामने आया कि इसमें ब्रेकल ने गलत ब्यानी की है। जिसे अधिकारियों/नेताओं ने नजरअन्दाज कर दिया हैं। इस नजरअन्दाज़गी के लिये संबंधित लोगों को जेल तक भेजा जा सकता था लेकिन ऐसा हुआ नही उल्टा ब्रेकल की ओर से यह 280 करोड़ अदानी पावर ने जमा करवा दिये। जबकि सरकार ब्रेकल को यह आबंटन रद्द करने का नोटिस तक दे चुकी थी।
अदानी पावर के माध्यम से ब्रेकल द्वारा यह 280 करोड़ जमा करवाने को लेकर रिलाॅयंस ने फिर अदालत में दस्तक दे दी। इस पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्टैण्ड लिया कि उसने अदानी पावर से पैसा नही लिया है। यह ब्रेकल और अदानी के बीच व्यक्तिगत मामला है। सरकार का इससे कोई लेना देना नही है। रिलायंस की याचिका पर सरकार के स्टैण्ड को सामने रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस परियोजना के आबंटन को रद्द करके इसके लिये नये सिरे से प्रक्रिया शुरू करने को कहा था। यहीं पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार यह भी कह चुकी है कि इस परियोजना में हुई देरी के कारण सरकार को अबतक 2713 करोड़ का नुकसान हो चुका है।
इस तरह यह परियोजना अबतक लटकी हुई है। सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद इसका आवंटन नही कर पायी है। एसजेवीएनएल को यह परियोजना देने का फैसला भी अभी सिद्धान्तरूप में सहमति से आगे नही बढ़ा है। इसमें प्रदेश का लगातार नुकसान हो रहा है।
जहां इस परियोजना को लेकर एक ओर से प्रदेश का लगातार नुकसान हो रहा है वहीं सरकार अदानी के माध्यम से ब्रेकल से आये 280 करोड़ को अब तक जब्त नही कर पायी है। बल्कि उल्टे अदानी को यह रकम वापिस करने पर सहमत हो गयी है। 2015 में सरकार ने यह रकम लौटाने का फैसला ले लिया और अक्तूबर 2017 में अदानी को यह सूचित भी कर दिया कि सरकार इस फैसले को लागू करना चाहती है। अदानी ने यह सूचना मिलने पर सरकार का धन्यावाद भी कर दिया। लेकिन फिर दिसम्बर 2017 में यह फैसला लागू करने में असमर्थता भी जाहिर कर दी। अब 2019 में अदानी ने इस रकम को वापिस लेने के लिये प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी है। 19 मार्च को इसमें उच्च न्यायालय ने सरकार को जवाब दायर करके यह भी बताने के निर्देश दिये थे कि इस परियोजना के आवंटन पर क्या फैसला लिया गया है। ताकि जो रकम वापिस देने का फैसला लिया गया था उसके अनुसार यह रकम वापिस दी जा सके। अब 26 अप्रैल को इसमें सरकार ने जवाब देने के लिये और समय मांगा है ताकि इस पर मन्त्रिमण्डल फिर से विचार करके निर्णय ले सके। मंत्रीमण्डल चुनाव आचार सहिंता समाप्त होने के बाद इस पर फैसला लेगा।
वीरभद्र सरकार ने 280 करोड़ वापिस करने का फैसला लिया और अदानी को सूचित भी कर दिया। फिर अन्तिम दिनों में खुद ही यह फैसला बदल भी दिया। अब जयराम सरकार के सामने पैसा वापिस न करने का फैसला रिकार्ड पर मौजूद है लेकिन इसके बावजूद सरकार अभी तक उच्च न्यायालय में अपना जवाब नही दे पायी है। वह इस मामले को फिर मंत्रीमण्डल में ले जाना चाहती है। सरकार के इस रूख से स्पष्ट इंगित हो रहा है कि उसपर अदानी का पैसा वापिस करने का दबाव है। अदानी और प्रधानमन्त्री मोदी के अच्छे संबंध जगजाहिर हैं।

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती द्वारा नालागढ़ के रामशहर में एक कार्यकर्ता सम्मलेन को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए की चेयर पर्सन सोनिया गांधी के खिलाफ कहे गये अपशब्दों का कडा संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने सत्ती के चुनाव प्रचार पर 48 घण्टे के लिये रोक लगा दी है। लेकिन यह रोक लगने से पहले ही सत्ती के खिलाफ एक और शिकायत चुनाव आयोग के पास पहुंच गयी है। सत्ती ने नालागढ़ के रामशहर के बाद ऊना के अम्ब में भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया है।
सत्ती द्वारा की गयी अभद्रता पर मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर से लेकर उनके मन्त्रीयों तक ने कोई खेद व्यक्त करने की बजाये उनका परोक्ष/अपरोक्ष में यह कहकर समर्थन किया है कि यह अभद्रता कांग्रेस द्वारा प्रधानमन्त्री के खिलाफ प्रयोग की जा रही भाषा पर कार्यकर्ताओं की सहज प्रतिक्रिया का प्रतिफल है। भाजपा के प्रदेश चुनावी प्रभारी तीर्थ सिंह रावत ने भी इसी लहजे में सत्ती का बचाव किया है। सत्ती ने चुनाव आयोग को भेेजे जवाब मेे भी यही तर्क दिया है लेकिन आयोग ने इस तर्क को खारिज करते हुए अपना आदेश सुनाया है। इस तरह इस पूरे मामले से यह सामने आता है कि इस अभद्रता का प्रयोग एक पूरी सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि ऐसा किया क्यों जा रहा है।
इस ‘‘क्यों’’ का जवाब खोजते हुए जो सामने आता है उसके मुताबिक आज जो सवाल राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक भाजपा और मोदी सरकार से पूछे जा रहे हैं उनका जवाब नही आ रहा है। क्योंकि आज मोदी सरकार सत्ता मे है तो सवाल तो उन्ही से पूछे जाने हैं क्योंकि 2014 के चुनावों मे जो वायदे भाजपा और मोदी ने देश/प्रदेश की जनता से किये थे वह पूरे तो हुए नही है। इन पर सवाल आते ही यह कह दिया जाता है कि कांग्रेस ने क्या किया है इतने समय तक। यह तर्क है कि जब कांग्रेस ने नहीं किया तो हम भी क्यों करे। हमारे से हिसाब क्यों पूछा जाये। हिसाब तो कांग्रेस से मांगा जा रहा है। इस तरह की वस्तुस्थिति में यह स्वभाविक है कि जब कोई तर्क पूर्ण जवाब नही रह जाता है तब सवाल की प्रतिक्रिया में अभद्रता का सहारा लिया जाता है। क्योंकि जब जनता को यह परोसा जाता है कि जो राहुल गांधी अभी तक बहू नही ला सके हैं वह देश को क्या संभालेंगे, कैसे प्रधानमन्त्री बनेंगे। यह एक ऐसा कमजोर तर्क है जिसका चुनाव जैसे गंभीर विषय के साथ कोई भी संबंध ही नही बनता है। लेकिन जनता जब ऐसे कथनों पर ताली बजाते हुए अपनी प्रतिक्रिया देती है तो नेता को लगता है कि जनता ने उसकी बात को समझ लिया है और उसका समर्थन कर रही है। लेकिन तब नेता यह भूल जाता है कि गाली को मिलाकर समर्थन वहीं तक रहता है यह स्थायी नही होता, क्योंकि गाली समझदारी की नही बल्कि अज्ञानता और हल्केपन की परिचायक होती है। आज शायद इसी हल्केपन को समर्थन मानने की भूल की जा रही है।
सत्ती भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और इस नाते उनकी जिम्मेदारी एक तरह से मुख्यमन्त्री से भी बढ़ जाती है। क्योंकि उनसे यह पूछा जा सकता है कि उनकी सरकार क्या कर रही है। सरकार के लिये कार्य एजैण्डा पार्टी तय करती है और उस ऐजैण्डा को अमली शक्ल मुख्यमन्त्री देता है। मुख्यमन्त्री से सरकार की कारगुजारी पर तो सवाल पूछा जा सकता है लेकिन पार्टी की कारगुजारी पर नहीं। आज जयराम सरकार भ्रष्टाचार के एजैण्डे पर पूरी तरह असफल है क्योंकि बतौर विपक्ष भाजपा ने भ्रष्टाचार के जो आरोप पत्र तब की कांग्रेस सरकार के खिलाफ सौंपे थे उन पर एक वर्ष में कारवाई के नाम पर कुछ भी सामने नही आया है। उल्टे आज जयराम के एक मंत्री का करीब पांच करोड़ का कांगड़ा के पालमपुर में किया गया निवेश चर्चा का विषय बना हुआ है। अभी चुनावों की घोषणा के बाद सिमैन्ट के दाम बढ़ाये जाने पर जनता सवाल पूछ रही है। इस एक वर्ष के कार्यकाल में ही मन्त्री और अन्य लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर सार्वजनिक रूप से पत्र छप जायें तो इन पर जनता पार्टी अध्यक्ष से लेकर मुख्यमन्त्री तक सबसे सवाल तो पूछेगी ही। सत्ती के जिले में ही किसानों को दिये गये दो-दो हजार रूपये उनके खातों से बैंकों ने बिना कारण बताये सरकार को वापिस कर दिये। लेकिन सरकार और संगठन में से किसी ने भी इस पर जवाब नही दिया है। जिन किसानों के साथ यह घटा है क्या वह आज सवाल नही पूछेंगे। आज स्कूलों में अध्यापकों और अस्पतालों में डाक्टरों की भारी कमी चल रही है। अभी चुनाव डयूटी के कारण कई स्कूलों में तो कोई अध्यापक ही नही रहा है। प्रशासन की सबसे बड़ी लाचारता और क्या हो सकती है। प्राईवेट स्कूलों की लूट को लेकर छात्र अभिभावक मंच कई दिनों से आन्दोलन पर है। सरकार उच्च न्यायालय और अपने ही आदेशों की अनुपालना नही करवा पा रही है। जिससे स्पष्ट झलकता है कि इस लूट को सरकार का समर्थन हासिल है। इस तरह दर्जनों ऐसे गंभीर सवाल हैं जिनका सरकार और संगठन के पास कोई सन्तोषजनक उत्तर नही है और भाजपा इन सवालों से कांग्रेस और राहुल गांधी को गाली देकर बचने का प्रयास कर रही है।
इस परिदृश्य में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि जब सरकार मंहगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे अहम क्षेत्रों में व्यवहारिक रूप से पूरी तरह असफल हो गयी है तो वह चुनावी मोर्चे पर महज गाली देकर सफल हो पायेगी। इसी के साथ कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि प्रदेश भाजपा के अन्दर आज जो खेमेबाजी की झलक चल रही है सत्ती का इस तरह गाली देना कहीं न कहीं उस खेमेबाजी की झलक भी देता है। क्योंकि सत्ती ने राहुल, सोनिया और प्रियंका के साथ-साथ राधा स्वामी संतसंग ब्यास को लेकर भी प्रतिकूल टिप्पणी की है। इस टिप्पणी से पूरा राधा स्वामी समाज नाराज हुआ है। जबकि कांगड़ा और हमीरपुर के संसदीय क्षेत्रों में राधा स्वामी समाज का बहुत प्रभाव है इस समाज की नाराज़गी इन सीटों पर भारी पड़ सकती है। राहुल गांधी परिवार के खिलाफ की गयी टिप्पणी को यदि राजनीतिक कारणों से जोड़ते हुए नजर अन्दाज कर भी दिया जाये तो उसी तर्क से राधा स्वामी समाज के खिलाफ आयी टिप्पणी को लेकर ऐसा नही किया जा सकता। हालांकि सत्ती ने इस पर खेद भी जता दिया है लेकिन इस खेद से यह और स्पष्ट हो जाता है कि इस टिप्पणी का एक अलग ही मंतव्य था।
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